सारांश
- यह विस्तृत विश्लेषण भारतीय चुनाव प्रणाली की कमियों और उसके कारण जन्मी जातिगत-अल्पसंख्यक राजनीति के इतिहास को रेखांकित करता है। यह स्पष्ट करता है कि कैसे क्षेत्रीय और वंशवादी दलों ने एक विशिष्ट ‘इकोसिस्टम’ के संरक्षण में दशकों तक सत्ता का उपभोग किया।
- साथ ही, यह लेख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा द्वारा किए गए रणनीतिक बदलावों—जैसे वोट शेयर को 40% के पार ले जाना, महिलाओं को एक नया राजनीतिक वर्ग बनाना और ‘जातिगत गणना’ के विभाजनकारी एजेंडे के सामने ‘जातिगत गौरव’ को स्थापित करना—का गहरा विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
- अंत में, यह विपक्ष के वर्तमान वैचारिक संकट और उनकी रणनीतिक भूलों को भी उजागर करता है।
जातिगत तुष्टिकरण से राष्ट्रव्यापी सोशल इंजीनियरिंग तक
I. फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट (FPTP) प्रणाली और राजनीतिक आलस्य की शुरुआत
भारतीय चुनावी लोकतंत्र का बुनियादी ढांचा इस नियम पर काम करता है कि विजयी होने के लिए किसी उम्मीदवार को कुल मतों का 50% या उससे अधिक प्राप्त करने की कोई बाध्यता नहीं है। जिसे भी शेष उम्मीदवारों से एक भी वोट अधिक मिला, वह विजेता घोषित हो जाता है। इसी संवैधानिक व्यवस्था के मर्म को समझकर विपक्षी दलों ने एक शॉर्टकट राजनीति की शुरुआत की।
- सीमित जनादेश का खेल: राजनीतिक दलों को समझ आ गया कि देश के 100% समाज के लिए काम करने की कोई आवश्यकता नहीं है। यदि वे अल्पसंख्यकों और कुछ विशेष जाति समूहों को एक साथ जोड़ लें, तो 25 से 30% का एक ऐसा ‘कोर वोट बैंक’ तैयार हो जाता है जो उन्हें सत्ता तक पहुँचाने के लिए पर्याप्त है।
- अल्पसंख्यक वीटो का जन्म: इस प्रणाली के कारण ‘अल्पसंख्यक समाज’ का वोट सत्ता की चाबी बन गया, क्योंकि वे चुनावी रूप से एकमुश्त (En bloc) मतदान करते थे। इसके परिणामस्वरूप बहुसंख्यक समाज की आकांक्षाओं, उनकी समस्याओं और उनकी अस्मिता को पूरी तरह हाशिए पर धकेल दिया गया।
- कृत्रिम समीकरणों का निर्माण: इसी राजनीतिक आलस्य से MY (मुस्लिम-यादव), AJGAR (अहीर, जाट, गुर्जर और राजपूत) और MAJGAR जैसे खोखले अल्पसंख्यक-जातिगत समीकरणों का जन्म हुआ। आज भी समाजवादी पार्टी और राजद जैसे दल इसी पुराने ढर्रे के भरोसे जीवित रहने की कोशिश कर रहे हैं।
- ‘जय भीम-जय मीम’ का पाखंड: यह नारा उसी विभाजनकारी नीति का चरम रूप है, जहाँ दलितों और अल्पसंख्यकों के बीच एक अप्राकृतिक और तात्कालिक गठबंधन बनाने का प्रयास किया जाता है, जिसका उद्देश्य केवल चुनावी लाभ लेना होता है, न कि समाज का वास्तविक उत्थान।
II. मंडल की राजनीति और ‘सवर्ण बुद्धिजीवियों’ का परोक्ष संरक्षण
भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास यह रहा है कि जिस जातिगत और विभाजनकारी राजनीति ने समाज को टुकड़ों में तोड़ा, उसे वैचारिक और नैतिक संरक्षण समाज के उस वर्ग से मिला जिसे खुद को ‘बुद्धिजीवी’ कहने का शौक था।
- वी.पी. सिंह का मंडल कार्ड: पूर्व प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह ने चौधरी देवीलाल के राजनीतिक प्रभाव को बेअसर करने के लिए ‘पिछड़ा वर्ग’ (मंडल आयोग) की राजनीति को मुख्यधारा में ला दिया। इस कार्ड ने भारतीय समाज को एक ऐसी अंतहीन जातिगत खाई में धकेला जिसका खामियाजा देश आज भी भुगत रहा है।
- क्षेत्रीय क्षत्रपों का उदय: वी.पी. सिंह की इस राजनीतिक बिसात का असली फायदा मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव जैसे नेताओं ने उठाया। इन्होंने पिछड़ों के हक के नाम पर अपनी पारिवारिक सल्तनत खड़ी की और लगभग दो दशकों तक उत्तर भारत की राजनीति पर अपना पूर्ण प्रभुत्व बनाए रखा।
- केजरीवाल का प्रतीकात्मक पाखंड: बाद के वर्षों में अरविंद केजरीवाल ने भी इसी तर्ज पर काम किया। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से जन्म लेने के बाद उन्होंने तुरंत उसी पुराने अल्पसंख्यक और विशिष्ट जातिगत खांचे को अपनाया। उनके कार्यालयों और पोस्टरों में विशेष महापुरुषों की तस्वीरों का पीछे लगाया जाना कोई आदर नहीं, बल्कि उसी जातिगत और क्षेत्रीय वोट बैंक को साधने की एक सोची-समझी प्रतीकात्मकता (Symbolism) है।
- लुटियंस इकोसिस्टम का कवर: इस पूरी जातिगत गोलबंदी को तथाकथित सवर्ण वकीलों, सवर्ण राजनेताओं, वामपंथी प्रोफेसरों और दिल्ली के लुटियंस पत्रकारों ने हमेशा ‘सामाजिक न्याय’ का आकर्षक नाम देकर उसका बचाव किया। उन्होंने कभी इस सच को उजागर नहीं होने दिया कि यह ‘न्याय’ केवल कुछ विशिष्ट राजनीतिक परिवारों के घरों तक ही सीमित होकर रह गया था।
III. भाजपा का ‘वोट शेयर’ ट्रांसफॉर्मेशन: 25% के बैरियर को तोड़ना
अटल-अडवाणी युग की भाजपा और वर्तमान मोदी युग की भाजपा के बीच सबसे बड़ा और बुनियादी अंतर कुल ‘वोट शेयर’ (Vote Share) का है। इसी अंतर ने भाजपा को एक ‘गठबंधन पर निर्भर पार्टी’ से हटाकर ‘एकमात्र डोमिनेटिंग शक्ति’ के रूप में स्थापित किया है।
- अटल-अडवाणी युग की सीमाएं: उस दौर में भाजपा को मुख्य रूप से एक शहरी और सवर्ण केंद्रित पार्टी के रूप में देखा जाता था। पार्टी का राष्ट्रीय वोट शेयर 25% के आसपास या उससे भी कम पर सिमटा हुआ था। यही कारण था कि 2008 के मुंबई आतंकी हमले के बाद भी, प्रचंड जन-आक्रोश के बावजूद, लालकृष्ण अडवाणी जी 2009 के आम चुनाव में भाजपा को जीत नहीं दिला सके और कांग्रेस 28% वोट शेयर के साथ दोबारा सत्ता में आ गई।
- मोदी युग का उदय और 40% का लक्ष्य: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस राजनीतिक सीमा को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के वोट शेयर को 37-38% और उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में 42-45% से अधिक पहुँचा दिया। उन्होंने भाजपा को ‘गरीबों, वंचितों और आदिवासियों’ की पहली पसंद बना दिया।
- 2024 के चुनाव की बड़ी सीख: उत्तर प्रदेश के 2024 के लोकसभा चुनाव ने यह साबित कर दिया कि राज्यों में अब 40% वोट शेयर भी पूर्ण जीत की गारंटी नहीं है। उस चुनाव में समाजवादी पार्टी (43.52%) और भाजपा (43.69%) का वोट शेयर लगभग बराबर था, जिससे भाजपा को सीटों का भारी नुकसान हुआ। चूंकि ‘अल्पसंख्यक’ समाज का वोट पूरी तरह भाजपा के खिलाफ एकजुट रहता है, इसलिए पार्टी को समझ आ गया कि उसे चुनावी जीत सुनिश्चित करने के लिए अन्य सभी वर्गों का शत-प्रतिशत जुड़ाव हासिल करना होगा।
IV. विपक्ष के हथियारों का अपहरण और भाजपा की नई सोशल इंजीनियरिंग
जब विपक्ष ने भाजपा को घेरने के लिए ‘जाति जनगणना’ और मंडल-2 की पिच तैयार की, तब भाजपा ने विपक्ष की उस पारंपरिक पिच पर खेलने के बजाय खेल के नियम ही बदल दिए।
- पश्चिम बंगाल का ऐतिहासिक मॉडल: पश्चिम बंगाल के हालिया विधानसभा और लोकसभा चुनावों में यह स्पष्ट देखने को मिला, जहाँ भाजपा ने लगभग 46% का विशाल वोट शेयर हासिल करके तृणमूल कांग्रेस (41%) के अभेद्य माने जाने वाले किले को ढहा दिया। इसके लिए भाजपा ने उन वर्गों पर ध्यान केंद्रित किया जिन्हें वामपंथ और टीएमसी ने हमेशा अनदेखा किया—जैसे कि ‘वनवासी’ (Tribal) और ‘मटुआ’ (Matua) समुदाय।
- नया और मौन वोट बैंक—’महिलाएं’: भाजपा ने जातिगत विभाजनों को बेअसर करने के लिए ‘महिला’ वर्ग को एक अलग, संगठित और जागरूक वोट बैंक के रूप में विकसित किया है। उज्ज्वला, पीएम आवास योजना, मुफ्त राशन और ‘लाडली बहना’ जैसी योजनाओं ने महिलाओं को पुरुषों के पारंपरिक जातिगत प्रभाव से मुक्त कर सीधे प्रधानमंत्री मोदी के ब्रांड से जोड़ दिया है।
- जातिगत गणना बनाम जातिगत गौरव: विपक्ष समाज को बांटने के लिए जातियों की गिनती करना चाहता है, जबकि भाजपा हर जाति वर्ग के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्वाभिमान को जगाकर उन्हें एक सूत्र में पिरो रही है।
- सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का समावेश: आज यदि भगवान बिरसा मुंडा (वनवासी गौरव), राजा सुहेलदेव (पासी और राजभर गौरव), संत शिरोमणि रैदास (दलित गौरव), सिख गुरुओं के बलिदान, महाराणा प्रताप और छत्रपति शिवाजी महाराज का कीर्तिगान सरकारी स्तर पर किया जा रहा है, तो यह केवल इतिहास का स्मरण नहीं है। यह हर उस जाति को यह संदेश है कि उनका गौरव केवल राष्ट्रवाद के साथ सुरक्षित है, विपक्ष के तुष्टिकरण में नहीं।
V. विपक्ष का वैचारिक संकट और रणनीतिक आत्मघात
आज राहुल गांधी, अखिलेश यादव, लालू प्रसाद और ममता बनर्जी का सबसे बड़ा संकट यह है कि उनका वैचारिक और रणनीतिक ढांचा 1990 के दशक की राजनीति पर ही अटका हुआ है। वे समय के साथ बदल चुके भारत को भांपने में पूरी तरह विफल रहे हैं।
- जमीनी संपर्क का अभाव और प्रोपेगंडा: मतदाताओं के नए और अलग वर्गों को अपनी नीतियों या जमीनी संपर्क के माध्यम से अपनी ओर आकर्षित करने के बजाय, विपक्ष केवल शॉर्टकट अपना रहा है। वे प्रधानमंत्री मोदी की व्यक्तिगत छवि पर कीचड़ उछाल रहे हैं, चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहे हैं और सोशल मीडिया पर एक आक्रामक व भ्रामक प्रोपेगंडा के सहारे चुनाव जीतने का सपना देख रहे हैं।
- भाजपा की बिछाई पिच पर आत्मघात: विपक्ष लगातार उन्हीं मुद्दों को हवा देता है जहाँ भाजपा वैचारिक और रणनीतिक रूप से सबसे मजबूत स्थिति में खड़ी है।
- अनावश्यक बयानबाजी: वीर सावरकर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और राम मंदिर जैसे विषयों पर विपक्ष को राजनीतिक रूप से चुप रहना चाहिए या एक संतुलित रुख अपनाना चाहिए। परंतु, वे समय-समय पर इन पर प्रहार करते हैं। वीर सावरकर या RSS पर की गई अमर्यादित टिप्पणी अंततः बहुसंख्यक समाज को एकजुट कर देती है, जिसका सीधा लाभ भाजपा को मिलता है।
- सांप्रदायिकता का पुराना नैरेटिव: विपक्ष आज भी भाजपा को ‘सांप्रदायिक’ या ‘दलित विरोधी’ साबित करने की अपनी पुरानी रट में फंसा हुआ है। वे यह समझने में असमर्थ हैं कि जब एक आम दलित या पिछड़ा वर्ग का नागरिक केंद्र सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का सीधा लाभ उठाता है, तो विपक्ष का यह ‘डर का नैरेटिव’ पूरी तरह अप्रासंगिक हो जाता है।
- भारतीय राजनीति अब उस मोड़ पर पहुँच चुकी है जहाँ केवल एक या दो जातियों और अल्पसंख्यकों के गठजोड़ से सत्ता के शिखर तक नहीं पहुँचा जा सकता।
- भाजपा ने विपक्ष के जातिगत विभाजन के हथियार को ‘सांस्कृतिक गौरव’ से और उनके अल्पसंख्यक वोट बैंक के वीटो को ‘विशाल बहुसंख्यक ध्रुवीकरण’ व ‘महिला सशक्तिकरण’ से पूरी तरह कुंद कर दिया है।
- जब तक विपक्ष अपनी नकारात्मक राजनीति, ईवीएम (EVM) पर रोना और विदेशी आख्यानों के सहारे देश को बांटने का प्रयास बंद नहीं करता, तब तक वह भाजपा की तैयार की हुई इस आधुनिक रणनीतिक पिच पर लगातार परास्त होता रहेगा।
🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳
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