सारांश
- यह आलेख भारतीय राजनीति में चुनाव आते ही नेताओं द्वारा अपनाए जाने वाले ‘छद्म सनातनी’ और ‘अल्पकालिक रामभक्त’ के मुखौटों का एक तीखा, तथ्यात्मक और तार्किक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
- आलेख में समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव, डिंपल यादव, कांग्रेस नेता राहुल गांधी तथा आम आदमी पार्टी (AAP) के शीर्ष नेतृत्व द्वारा समय-समय पर हिंदू धर्म, भगवा वस्त्र, साधु-संतों, दीपोत्सव और राम मंदिर जैसे पवित्र पर्वों व आस्था के केंद्रों पर दिए गए विवादित बयानों को प्रामाणिक संदर्भों के साथ रेखांकित किया गया है।
- यह आलेख स्पष्ट करता है कि कैसे जो नेता कुछ समय पहले तक सनातन प्रतीकों को लांछित कर रहे थे, वे उत्तर प्रदेश के आगामी 2027 के विधानसभा चुनावों को देखते हुए अचानक हिंदू नाम की माला जपने लगे हैं।
- अंत में, यह आलेख जनता जनार्दन को आगाह करता है कि यह पूरी कवायद केवल वोट बैंक को हथियाने और समाज को बांटने का एक अस्थाई राजनीतिक नाटक है।
2027 के चुनावी चक्रव्यूह में हिंदू वोट बैंक का खेल
१. समाजवादी पार्टी का ट्रैक रिकॉर्ड: मंदिरों से लेकर साधु-संतों का निरंतर अपमान
समाजवादी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का सनातन धर्म, उसके पवित्र मठों और आस्था के प्रति क्या दृष्टिकोण रहा है, यह उनके कालक्रमानुसार दिए गए सार्वजनिक बयानों से पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है:
- मंदिरों की पवित्रता पर आपत्तिजनक टिप्पणी (2022): ज्ञानवापी परिसर के सर्वेक्षण के दौरान जब बाबा विश्वनाथ के प्रकट होने पर पूरा सनातनी समाज आह्लादित था, तब अखिलेश यादव ने बहुसंख्यक समाज की भावनाओं को आहत करते हुए बयान दिया था कि “हिंदू धर्म में कहीं भी पत्थर रख दो, एक लाल झंडा लगा दो तो मंदिर बन जाता है।” आस्था का ऐसा सरलीकरण और अपमान करने वाले इस बयान के बाद काशी, मथुरा और अयोध्या के संतों में भारी आक्रोश देखने को मिला था।
- साधु-संतों और मठाधीशों की ‘माफिया‘ से तुलना (2024): उत्तर प्रदेश की एक बड़ी जनसभा को संबोधित करते हुए अखिलेश यादव ने राजनीतिक लाभ और एक विशेष वर्ग को साधने के लिए उत्तर प्रदेश के मठाधीशों और साधुओं की तुलना कथित तौर पर ‘माफिया’ से कर दी थी। भारत की उस पावन परंपरा, जहां संतों को राष्ट्र का मार्गदर्शक माना जाता है, उनके पूजनीय भगवाधारियों को इस प्रकार लांछित करना उनकी वास्तविक वैचारिक सोच को दर्शाता है।
- अयोध्या दीपोत्सव पर ‘क्रिसमस‘ का पश्चिमी ज्ञान (2025): प्रभु श्री राम की नगरी अयोध्या में प्रतिवर्ष होने वाले भव्य और विश्वप्रसिद्ध दीपोत्सव पर सवाल उठाते हुए अखिलेश यादव ने इसे सरकारी धन की बर्बादी बताया। उन्होंने सनातनी परंपरा को नीचा दिखाने के लिए ज्ञान दिया कि यदि सरकार को सजावट करनी ही है, तो पश्चिम की तर्ज पर ‘क्रिसमस लाइट’ जैसी आधुनिक लाइट्स का इस्तेमाल करे, जो ज्यादा सुंदर दिखेंगी। मिट्टी के दीयों से जुड़े करोड़ों गरीब कुम्हारों के रोजगार और त्रेतायुग की परंपरा का ऐसा मखौल उड़ाना इनकी प्राथमिकताओं को उजागर करता है।
- भगवा वस्त्र को ‘जंग लगा लोहा‘ बताना: कौशाम्बी की सिराथू रैली के दौरान सपा की सांसद डिंपल यादव ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के भगवा वस्त्रों पर सीधे कटाक्ष करते हुए कहा था कि “जब लोहे में जंग लग जाती है तो उसका रंग कौन सा होता है? मुझे लगता है कि हमारे मौजूदा मुख्यमंत्री जिस रंग के कपड़े पहनते हैं, वही रंग लोहे में लगी जंग का होता है।” त्याग, वैराग्य, राष्ट्रभक्ति और सूर्य की किरणों के प्रतीक ‘भगवा’ को जंग का सूचक बताना सनातनी प्रतीकों के प्रति उनकी गहरी दुर्भावना को सिद्ध करता है।
२. कांग्रेस और राहुल गांधी: ‘हिंदू’ बनाम ‘हिंदुत्व’ का विभाजनकारी खेल
कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेता राहुल गांधी ने भी संसद के भीतर और बाहर सनातनी समाज को कटघरे में खड़ा करने और उन्हें हिंसक साबित करने का कोई अवसर नहीं गंवाया है:
- संसद में हिंदुओं को हिंसक बताने का दुस्साहस: देश के लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर, लोकसभा में विपक्ष के नेता के रूप में भाषण देते हुए राहुल गांधी ने देश के बहुसंख्यक समाज पर सीधा निशाना साधा और कहा था कि “जो लोग अपने आप को हिंदू कहते हैं, वे 24 घंटे हिंसा, हिंसा और नफरत फैलाते हैं।” वैश्विक स्तर पर सबसे सहिष्णु और शांतिप्रिय माने जाने वाले हिंदू समाज पर वैश्विक पटल पर ऐसा लांछन लगाना सनातन का घोर अपमान था।
- ‘हिंदू बनाम हिंदुत्व‘ का कृत्रिम विभाजन: राहुल गांधी और उनकी पूरी विचारमग्न मंडली का निरंतर यह तर्क रहा है कि हिंदू धर्म अलग है और ‘हिंदुत्व’ अलग है। वे अपनी रैलियों में कहते हैं कि “हमें इन हिंदुत्ववादियों को देश से बाहर निकालना है।” यह कृत्रिम विभाजन केवल इसलिए गढ़ा गया है ताकि सनातनी समाज को जातियों और विचारधाराओं में बांटकर कमजोर किया जा सके और उनके गौरवबोध को नष्ट किया जा सके।
- ‘शक्ति‘ के खिलाफ विनाशकारी लड़ाई का उद्घोष: मुंबई की एक बड़ी चुनावी रैली में हिंदू धर्म के सबसे पवित्र और पूजनीय शब्द ‘शक्ति’ का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा था कि वे एक ‘गलत शक्ति’ के खिलाफ लड़ रहे हैं। सनातन परंपरा में जो ‘शक्ति’ मां दुर्गा, मां काली और लोक-कल्याण का सर्वोच्च प्रतीक है, उसे अपनी संकीर्ण और हताशा से भरी राजनीति के लिए नकारात्मक रूप में प्रस्तुत करना इनकी फितरत बन चुका है।
३. आम आदमी पार्टी (AAP): नानी की काल्पनिक कहानी और यूनिवर्सिटी का एजेंडा
इस होड़ में तीसरी श्रेणी उन नेताओं की है जो गिरगिट की तरह रंग बदलने की कला में सबसे आगे रहे हैं और चुनाव आते ही हनुमान चालीसा का पाठ करने लगते हैं:
- राम मंदिर जाने का तीखा विरोध: आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेता अरविंद केजरीवाल ने राम मंदिर आंदोलन के समय और उसके बाद भी कई बार विवादास्पद बयान दिए। उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपनी ‘नानी’ का हवाला देते हुए हिंदुओं को भ्रमित करने का प्रयास किया था कि “मेरी नानी कहती थीं कि राम मंदिर भूलकर भी मत जाना, क्योंकि राम कभी ऐसे मंदिर में नहीं रह सकते जो किसी मस्जिद को तोड़कर बनी हो।”
- मंदिर की जगह यूनिवर्सिटी बनाने का कुतर्क: इसी पार्टी के मनीष सिसोदिया ने राम मंदिर निर्माण की वैधानिकता पर चोट करते हुए कहा था कि अयोध्या में राम मंदिर नहीं बनना चाहिए, बल्कि उसकी जगह एक बड़ी यूनिवर्सिटी (विश्वविद्यालय) बनाई जानी चाहिए। आज यही दल और इसके नेता राजनीतिक लाभ के लिए खुद को बड़ा रामभक्त दिखाने का ढोंग रचते हैं।
४. अप्रैल 2027 तक का नाटक: चुनाव खत्म, श्रद्धा खत्म
वर्तमान में इन तीनों श्रेणियों के दलों द्वारा हिंदू आस्था, राम मंदिर और सनातन के प्रति जो अचानक ‘अगाध प्रेम’ उमड़ा है, उसका कारण कोई हृदय परिवर्तन या सनातनी विचारधारा के प्रति अचानक जागी निष्ठा नहीं है। इसके पीछे शुद्ध रूप से उत्तर प्रदेश के अप्रैल 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव की राजनीतिक लालसा है।
- वोट बैंक के लिए कांवड़ और व्रत का ढोंग: जैसे-जैसे उत्तर प्रदेश के 2027 के चुनाव नजदीक आएंगे, आश्चर्य नहीं होगा जब अखिलेश यादव भगवा वस्त्र धारण करके कांवड़ यात्रा में शामिल होते दिखेंगे, डिंपल यादव श्रावण के हर सोमवार का व्रत रखकर मंदिरों से तस्वीरें साझा करेंगी और राहुल गांधी राम मंदिर का दौरा कर माथा टेकते नजर आएंगे। यह सब केवल सनातनी वोटों को आपस में बांटने (एक से दो, दो से चार और चार से आठ करने) की एक सुनियोजित और विभाजनकारी चाल है।
- चुनाव बाद पुनः पुराना तुष्टिकरण रूप: इतिहास गवाह है कि जैसे ही अप्रैल 2027 के चुनाव संपन्न होंगे, यह सारा सनातनी चोला उतार कर फेंक दिया जाएगा। चुनाव खत्म होते ही इनमें से कोई मजारों पर चादर चढ़ाने में व्यस्त हो जाएगा, कोई मदरसों की छत डलवाने के लिए सरकारी खजाना खोल देगा, तो कोई पुनः हिंदुओं को हिंसक, असहिष्णु और असभ्य बताकर गालियां देता हुआ नजर आएगा।
चुनावी पाखंड: “मुंह में राम, बगल में छूरी — चुनावी मौसम में सनातन का चोला ओढ़ने वाले इन राजनीतिक चेहरों की असलियत उनके अतीत के बयानों में दर्ज है।”
जनता जनार्दन सब जानती है
- सनातनी समाज और देश की जनता जनार्दन हमेशा से समझदार थी, समझदार है और आगे भी समझदार रहेगी।
- जिन लोगों ने कभी राम मंदिर के संकल्प का समर्थन नहीं किया, जिन्होंने कारसेवकों पर गोलियां चलवाईं, जिन्होंने राम को काल्पनिक बताया और जो दिवाली के पावन दीयों में भी फिजूलखर्ची ढूंढते हैं—उनकी इस छद्म और तात्कालिक रामभक्ति को समाज भली-भांति समझता है।
- वोट बैंक के स्वार्थ के लिए सनातन संस्कृति को खिलौना समझने वाले इन नेताओं के पाखंड का अंत निश्चित है।
🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳
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