सारांश:
- यह विस्तृत विश्लेषणात्मक लेख वैश्विक इस्लामिक कट्टरवाद, पाकिस्तान के ‘आतंकवादी कारखाने’ और भारत में दशकों से जारी तुष्टिकरण की राजनीति के घिनौने सच को उजागर करता है।
- सन् २००० में अमेरिकी पत्रकार बिल रेडकर के पेशावर मदरसे के अनुभव से शुरू होकर, यह आलेख पुलवामा हमले जैसी दुखद घटनाओं के पीछे काम करने वाली हिंसक मानसिकता और उसके आंतरिक पैरोकारों की पड़ताल करता है।
- लेख में इस बात का विस्तार से विश्लेषण किया गया है कि कैसे कांग्रेस और उसके सहयोगी गठबंधनों ने सात दशकों तक मुस्लिम वोटबैंक के लिए राष्ट्रवादियों को हाशिए पर धकेल कर देश की सुरक्षा और संप्रभुता से खिलवाड़ किया।
- अंत में, यह भारत के आम नागरिकों और मतदाताओं द्वारा राष्ट्रवादी नेतृत्व को दिए जा रहे अपार समर्थन तथा देशविरोधी तत्वों के पूर्ण सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक बहिष्कार के राष्ट्रीय आह्वान को प्रस्तुत करता है।
७० वर्षों का तुष्टिकरण और भारत का राष्ट्रवादी पुनर्जागरण
१. प्रस्तावना: वैचारिक कट्टरता और बचपन का अपहरण
इतिहास साक्षी है कि किसी भी हिंसक विचारधारा को जीवित रखने के लिए उसके समर्थकों को सबसे पहले भावी पीढ़ियों का मस्तिष्क प्रक्षालन (Brainwashing) करना पड़ता है। जब शिक्षा का मूल उद्देश्य ज्ञान, विज्ञान और सहअस्तित्व न होकर हिंसा और घृणा बन जाए, तो समाज विनाश की ओर अग्रसर होता है।
- पेशावर के मदरसे का कड़वा सच: सन् २००० में अमेरिकी न्यूज़ चैनल ‘एबीसी न्यूज़’ (ABC News) के वरिष्ठ पत्रकार बिल रेडकर ने पाकिस्तान के पेशावर शहर के पास एक मदरसे का दौरा किया।
- बच्चों का चयन: वहाँ एक कमरे में १० वर्ष से कम आयु के लगभग ६० से ७० बच्चे मौजूद थे।
- सपनों पर घृणा की विजय: जब रेडकर ने पूछा कि उनमें से कितने डॉक्टर या इंजीनियर बनना चाहते हैं, तो केवल दो बच्चों ने हाथ उठाए।
- जिहाद का उन्माद: लेकिन जब पूछा गया कि गैर-मुस्लिमों (काफ़िरों) के खिलाफ़ जिहाद लड़ने कौन जाएगा, तो सभी बच्चों के हाथ एक साथ हवा में लहरा उठे।
- मासूमियत का कत्ल: जिस उम्र में बच्चों को कलम, किताबें और खिलौने मिलने चाहिए थे, उस उम्र में उनके अवचेतन मन में ‘काफ़िरों के संहार’ और हिंसक धर्मांधता का ज़हर बो दिया गया था।
२. पाकिस्तान: एक देश नहीं, बल्कि आतंकवाद का कारख़ाना
पेशावर की घटना कोई अपवाद नहीं थी, बल्कि यह पाकिस्तान की राज्य-पोषित शिक्षा और सामरिक नीति का मूलभूत आधार है।
- द्वि-राष्ट्र सिद्धांत की विषैली फसल: भारत से अलग होकर बने इस देश ने अपनी पहचान राष्ट्र-निर्माण से अधिक ‘भारत-विरोध’ और ‘सनातन-विरोध’ पर टिकाई।
- मदरसा संस्कृति और असंतुलित शिक्षा: पाकिस्तान में हजारों अनियंत्रित मदरसे संचालित हैं, जहाँ बुनियादी शिक्षा की जगह केवल धार्मिक कट्टरता, काफ़िरों से नफ़रत और जिहाद का पाठ पढ़ाया जाता है।
- आतंक का निर्यात: पाकिस्तान ने अपनी नियमित सेना के स्थान पर इन प्रशिक्षित और ब्रेनवाश किए गए जिहादियों को भारत के खिलाफ़ छद्म युद्ध (Asymmetric Warfare) के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया।
- वैश्विक सिरदर्द: आज न केवल भारत, बल्कि पूरा विश्व पाकिस्तान को एक जिम्मेदार देश के बजाय अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद का मुख्य केंद्र मानता है।
३. पुलवामा हमला: ‘भटका हुआ युवा’ या प्रशिक्षित जिहादी?
१४ फ़रवरी २०१९ को पुलवामा में सीआरपीएफ (CRPF) के काफ़िले पर हुआ आत्मघाती आतंकी हमला इसी ज़हरीली शिक्षा व्यवस्था और जिहादी तंत्र का सीधा परिणाम था।
- आदिल अहमद डार का सच: ४० भारतीय जवानों को शहीद करने वाला आत्मघाती हमलावर आदिल अहमद डार कोई भटका हुआ निर्दोष व्यक्ति नहीं था।
- एक वर्ष का गहन प्रशिक्षण: उसने पाकिस्तान के आतंकी संगठनों और उनके मदरसों में एक वर्ष तक हथियारों, विस्फोटक पदार्थों और जिहादी विचारधारा का गहन प्रशिक्षण प्राप्त किया था।
- हूरों और जन्नत का भ्रम: उसे सिखाया गया था कि मूर्तिपूजकों और काफ़िरों को मारकर जान देना ही ईश्वर की सेवा है और इसके बदले उसे ‘जन्नत में ७२ हूरें’ मिलेंगी।
- गंभीर सुरक्षा चुनौती: यह घटना इस बात का स्पष्ट प्रमाण थी कि धार्मिक कट्टरता जब सीमा पार के आतंकी ढांचे से मिलती है, तो वह कितनी भयावह तबाही ला सकती है।
४. छद्म-धर्मनिरपेक्षता और देशघाती बयानबाज़ी
पुलवामा हमले के बाद भारत के भीतर बैठे कुछ प्रमुख राजनीतिक चेहरों और तथाकथित ‘धर्मनिरपेक्ष’ ताकतों का रवैया अत्यंत शर्मनाक और चिंताजनक रहा।
- महबूबा मुफ़्ती का पक्षपात: जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने एक पाकिस्तानी समाचार चैनल पर जाकर ४० जवानों के कातिल को “२०-२२ साल का बच्चा” बताकर उसका बचाव करने का प्रयास किया।
- दिग्विजय सिंह की तुच्छता: कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने इतने बड़े आत्मघाती आतंकी हमले को महज़ एक “साधारण दुर्घटना” करार दिया।
- आतंकियों का मानवीयकरण: जब-जब सेना किसी आतंकी को ढेर करती है, तब-तब यही वर्ग उसके मानवाधिकारों का रोना रोने लगता है और उसके सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन के मनगढ़ंत बहाने बनाता है।
- सुरक्षा बलों का मनोबल गिराना: इस प्रकार के बयानों से न केवल आतंकवादियों और उनके आकाओं के हौसले बुलंद होते हैं, बल्कि रात-दिन देश की रक्षा में तैनात भारतीय सैनिकों के मनोबल पर भी चोट पहुँचती है।
५. ७० वर्षों का कांग्रेस व ‘ठगबंधन’ का तुष्टिकरण का काला इतिहास
स्वतंत्रता के बाद से सात दशकों तक कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने सत्ता में बने रहने के लिए राष्ट्रीय हितों की बलि चढ़ाकर घटिया वोटबैंक की राजनीति की।
- मुस्लिम वोटबैंक का तुष्टिकरण: चरमपंथियों, कट्टरपंथियों और अलगाववादी तत्वों को खुश करने के लिए सरकारें राष्ट्र विरोधी गतिविधियों पर आँखें मूँद लेती थीं।
- राष्ट्रवादियों को हाशिए पर ढकेलना: देश के सच्चे देशभक्तों, सेना के जवानों और सनातन संस्कृति का सम्मान करने वाले नागरिकों को ‘सांप्रदायिक’ या ‘पिछड़ा’ कहकर उनका अपमान किया गया।
- कानून-व्यवस्था से खिलवाड़: सिमी (SIMI) जैसे उग्रवादी संगठनों पर नरमी बरती गई और आतंकवाद विरोधी कड़े कानूनों (जैसे POTA) को राजनीतिक लाभ के लिए रद्द कर दिया गया।
- संप्रभुता से समझौता: कश्मीर में धारा ३७० की आड़ में अलगाववादियों को सरकारी सुरक्षा और सुविधाएं दी गईं, जबकि पीड़ित कश्मीरी हिंदुओं के दर्द को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया गया।
- विफल राष्ट्र बनाने की साज़िश: यदि यह नीतियाँ जारी रहतीं, तो भारत भी अपने पड़ोसी देशों—पाकिस्तान और बांग्लादेश—की तरह एक असफल, अराजक और कट्टरपंथी देश बनने की राह पर अग्रसर हो जाता।
६. जनता का जागरण और राष्ट्रवादी क्रांति
पिछले कुछ वर्षों में भारत का राजनीतिक परिदृश्य और आम नागरिक की सोच पूरी तरह बदल चुकी है। देश का मतदाता अब तुष्टिकरण के इस जाल को समझ चुका है।
- विपक्ष का पूर्ण बहिष्कार: भारत की जागरूक जनता ने चुनाव-दर-चुनाव कांग्रेस और उसके ‘ठगबंधन’ को केंद्र और राज्यों की सत्ता से बेदखल कर इतिहास के पन्नों में समेटना शुरू कर दिया है।
- राष्ट्रवादी सरकार का पूर्ण समर्थन: सीमाओं की सुरक्षा, मजबूत विदेश नीति और आतंकवाद पर ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ (Zero Tolerance) की नीति अपनाने वाली राष्ट्रवादी सरकार को जनता का अपार जनसमर्थन मिल रहा है।
- वैश्विक महाशक्ति बनने का मार्ग: आज भारत पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे कंगाली की कगार पर खड़े पड़ोसियों के विपरीत एक आर्थिक, सैन्य और सांस्कृतिक महाशक्ति (Superpower) के रूप में उभर रहा है।
- दृढ़ प्रशासनिक इच्छाशक्ति: सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट एयरस्ट्राइक और धारा ३७० का निरसन इस बात का प्रमाण हैं कि जब राष्ट्रहित सर्वोपरि होता है, तो नीतियाँ कैसे बदली जाती हैं।
७. देशभक्तों के लिए भावी दिशा और संकल्प
केवल सरकार बदल देना ही पर्याप्त नहीं है; देश की अखंडता और सुरक्षा को स्थायी बनाने के लिए समाज को भी वैचारिक और व्यावहारिक स्तर पर कठोर कदम उठाने होंगे।
- सामाजिक बहिष्कार (Social Boycott): जो लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आतंकवादियों, जिहादियों और अलगाववादियों की पैरोकारी करते हैं, उनका समाज में कोई सम्मानजनक स्थान नहीं होना चाहिए।
- राजनीतिक अलगाव: देश की सुरक्षा से समझौता करने वाले नेताओं और दलों को चुनाव के माध्यम से पूरी तरह बेअसर और अप्रासंगिक बनाया जाए।
- आर्थिक बहिष्कार (Economic Boycott): देशविरोधी एजेंडा चलाने वाले संस्थानों, मीडिया घरानों और व्यावसायिक समूहों की पहचान कर उनका पूर्ण आर्थिक बहिष्कार किया जाए।
- सांस्कृतिक चेतना: युवाओं को अपने इतिहास, सनातन मूल्यों और राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति जागरूक किया जाए ताकि कोई भी बाहरी या आंतरिक शक्ति उन्हें भटका न सके।
- भारत की भूमि सनातन काल से ज्ञान, शांति और मानवता की प्रतीक रही है, लेकिन शांति की रक्षा के लिए शक्ति और सजगता अनिवार्य है।
- पेशावर के मदरसे से लेकर पुलवामा के हमले तक का सफर यह सिखाता है कि कट्टरता से कभी समझौता नहीं किया जा सकता।
- साठ-सत्तर वर्षों तक जिस तुष्टिकरण ने देश को अंदर से खोखला किया, अब उसे उखाड़ फेंकने का समय आ चुका है।
- भारत का भविष्य किसी विफल जिहादी राज्य की छाया में नहीं, बल्कि एक शक्तिशाली, आत्मनिर्भर और अखंड भारत के रूप में सुरक्षित है।
“राष्ट्रहित सर्वोपरि, सुरक्षा सर्वोच्च priority!”
🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳
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