Summary
- यह विश्लेषणात्मक आलेख इस प्रचलित नैरेटिव का ऐतिहासिक मूल्यांकन करता है कि भारत में हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण या अलगाववाद की शुरुआत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) या भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने की है।
- 1888 के सर सैयद अहमद खान के ऐतिहासिक भाषण से लेकर 1947 के विभाजन और स्वातंत्र्योत्तर भारत की नीतियों तक का कालानुक्रमिक विश्लेषण करते हुए, यह आलेख स्पष्ट करता है कि द्वि-राष्ट्र सिद्धांत, पृथक निर्वाचन क्षेत्र, खिलाफत आंदोलन, मोपला नरसंहार और डायरेक्ट एक्शन डे जैसी घटनाओं का जन्म अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ नीति, मुस्लिम लीग के उग्र अलगाववाद और कांग्रेस के राजनीतिक तुष्टिकरण के कारण हुआ—ऐसे समय में जब न तो BJP का अस्तित्व था और न ही RSS का कोई प्रभाव था।
RSS-BJP की वास्तविकता
I. द्वि-राष्ट्र सिद्धांत का बीजारोपण: सर सैयद अहमद खान (1888)
भारत में सांप्रदायिक आधार पर दो अलग राष्ट्रों की अवधारणा किसी आधुनिक राजनीतिक दल की उपज नहीं है, बल्कि इसका सार्वजनिक और औपचारिक दस्तावेजीकरण 19वीं सदी के उत्तरार्ध में ही हो चुका था।
- मेरठ का ऐतिहासिक भाषण: 14 मार्च 1888 को मेरठ में एक विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के संस्थापक सर सैयद अहमद खान ने स्पष्ट शब्दों में घोषणा की थी कि हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग कौम हैं। उन्होंने तर्क दिया था कि अंग्रेजों के जाने के बाद दोनों समुदायों का एक साथ समानता के साथ एक तख्त पर बैठना संभव नहीं होगा।
- प्रभुत्व की राजनीति: उन्होंने कहा था कि सत्ता का संतुलन किसी एक पक्ष द्वारा दूसरे पर प्रभुत्व स्थापित करने से ही संभव होगा। इतिहासकार इस भाषण को आधुनिक भारत में ‘द्वि-राष्ट्र सिद्धांत’ (Two-Nation Theory) का पहला सार्वजनिक दस्तावेज मानते हैं।
- ऐतिहासिक सत्य: इस ऐतिहासिक मोड़ पर न तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (स्थापना: 1925) का अस्तित्व था और न ही भारतीय जनता पार्टी (स्थापना: 1980) के विचार का जन्म हुआ था।
II. प्रशासनिक मुहर और संगठनात्मक सांप्रदायिकता (1905–1909)
ब्रिटिश साम्राज्य ने भारतीय राष्ट्रीय चेतना को तोड़ने के लिए प्रशासनिक फैसलों और कानूनों का सहारा लेकर धार्मिक विभाजन को संस्थागत रूप दिया।
- बंगाल का विभाजन (1905): अंग्रेजों ने प्रशासनिक सुगमता का बहाना बनाकर बंगाल को पूर्वी (मुस्लिम बहुल) और पश्चिमी (हिंदू बहुल) हिस्सों में विभाजित किया। इसका मुख्य उद्देश्य उभरती हुई भारतीय राष्ट्रीय एकता को धार्मिक आधार पर खंडित करना था।
- शिमला डेलिगेशन (1906): आगा खान के नेतृत्व में मुसलमानों के एक शिष्टमंडल ने लॉर्ड मिंटो से मुलाकात की और मुसलमानों के लिए अलग राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग रखी।
- मुस्लिम लीग का गठन (1906): 30 दिसंबर 1906 को ढाका में ऑल इंडिया मुस्लिम लीग की स्थापना हुई। इसका प्राथमिक उद्देश्य केवल मुसलमानों के राजनीतिक अधिकारों की पैरवी करना और ब्रिटिश सरकार के प्रति मुस्लिम निष्ठा बनाए रखना था। यह संगठन RSS की स्थापना से लगभग दो दशक पहले अस्तित्व में आ चुका था।
- मार्ले-मिंटो सुधार (1909): अंग्रेजों ने ‘पृथक निर्वाचन क्षेत्र’ (Separate Electorates) का कानूनी प्रावधान लागू करके प्रशासनिक और वैधानिक स्तर पर यह मुहर लगा दी कि हिंदू और मुस्लिम दो अलग राजनीतिक वर्ग हैं।
III. कांग्रेस का तुष्टिकरण और खिलाफत का हिंसक मोड़ (1916–1921)
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान रणनीतिक भूलों और धार्मिक मुद्दों के राजनीतिकरण ने अलगाववादी ताकतों को और अधिक मजबूती प्रदान की।
- लखनऊ समझौता (1916): कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के साथ समझौता करके ‘पृथक निर्वाचन’ की मांग को औपचारिक स्वीकृति दे दी। इतिहासकार इसे कांग्रेस द्वारा की गई सांप्रदायिक तुष्टिकरण की पहली बड़ी ऐतिहासिक भूल मानते हैं, जिसने आगे चलकर विभाजन का मार्ग प्रशस्त किया।
- खिलाफत आंदोलन (1919–1920): प्रथम विश्वयुद्ध के बाद तुर्की के खलीफा के पद की बहाली जैसे विशुद्ध विदेशी और धार्मिक मुद्दे को भारत के राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ा गया।
- मोपला नरसंहार (1921): खिलाफत आंदोलन के विफल होने पर केरल के मालाबार (मोपला) में उग्र मुस्लिम कट्टरपंथियों ने हिंसा शुरू कर दी। इस दौरान स्थानीय हिंदुओं को निशाना बनाया गया, जिसके परिणामस्वरूप 10,000 से अधिक हिंदुओं की हत्याएं हुईं और व्यापक धर्म परिवर्तन कराया गया।
- ऐतिहासिक वास्तविकता: इन सभी दूरगामी घटनाओं के दौरान संघ या भाजपा जैसी किसी संस्था का जन्म भी नहीं हुआ था।
IV. पाकिस्तान की रूपरेखा से डायरेक्ट एक्शन डे तक (1930–1946)
1930 के दशक से शुरू हुआ पृथकतावादी आंदोलन अगले डेढ़ दशक में खूनी हिंसा और औपचारिक विभाजन की मांग में बदल गया।
- इलाहाबाद अधिवेशन (1930): कुख्यात शायर मोहम्मद इकबाल ने मुस्लिम लीग के मंच से एक अलग मुस्लिम राष्ट्र की पहली स्पष्ट वैचारिक रूपरेखा प्रस्तुत की।
- लाहौर प्रस्ताव (1940): मुस्लिम लीग ने आधिकारिक तौर पर ‘पाकिस्तान’ के निर्माण का प्रस्ताव पारित किया। इस समय तक कांग्रेस की स्थापना को 50 से अधिक वर्ष हो चुके थे और महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू व वल्लभभाई पटेल स्थापित नेता थे, जबकि RSS मात्र 15 वर्ष पुराना एक सीमित प्रभाव वाला संगठन था।
- डायरेक्ट एक्शन डे (16 अगस्त 1946): मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान की मांग मनवाने के लिए ‘प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस’ का आह्वान किया। इसके परिणामस्वरूप कलकत्ता में भयानक सांप्रदायिक हिंसा हुई, जिसे ‘ग्रेट कलकत्ता किलिंग्स’ के नाम से जाना जाता है। इस हिंसा में लाखों निर्दोष नागरिकों का कत्लेआम हुआ, जबकि महात्मा गांधी का ‘पाकिस्तान मेरी लाश पर बनेगा’ वाला बयान बेअसर साबित हुआ।
V. 1947 का विभाजन और ‘ठगबंधन’ काल का नीतिगत पक्षपात
1947 के विभाजन से लेकर स्वतंत्रता के बाद के सात दशकों में शासन तंत्र की नीतियों ने तुष्टिकरण के इस ढर्रे को और अधिक आगे बढ़ाया।
- 1947 का विभाजन: जब भारत का धार्मिक आधार पर विभाजन स्वीकार किया गया, तब सत्ता की मेज पर केवल तीन पक्ष थे—अंग्रेज, कांग्रेस और मुस्लिम लीग। उस समय RSS ने विभाजन के विरुद्ध आवाज उठाई, जिसे तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व ने अनसुना कर दिया।
- 70 वर्षों के शासन की असमान नीतियां: आजादी के बाद के लगभग 70 वर्षों के शासनकाल को देखें तो यह स्पष्ट होता है कि तथाकथित ‘ठगबंधन’ सरकारों की योजनाओं, नीतियों और संवैधानिक संशोधनों में एकतरफा पक्षपात दिखाई दिया। वोट बैंक की खातिर मुस्लिम समुदाय को विशेष तरजीह दी गई, जबकि बहुसंख्यक हिंदू समाज के हितों और अधिकारों की लगातार अनदेखी की गई।
- ‘भगवा आतंकवाद‘ का झूठा नैरेटिव: कांग्रेस शासन के दौरान राजनीतिक लाभ साधने के लिए ‘भगवा आतंकवाद’ (Saffron Terror) का एक काल्पनिक नैरेटिव गढ़ने की साजिश रची गई। हालांकि यह प्रयास अंततः बुरी तरह विफल रहा और अदालतों में टिक न सका, लेकिन इस पूर्वाग्रह से ग्रसित प्रशासनिक कार्रवाइयों के कारण अनगिनत निर्दोष हिंदुओं को वर्षों तक गंभीर उत्पीड़न और मानसिक व सामाजिक यातनाएं झेलनी पड़ीं।
VI. 12 वर्षों का समावेशी शासन: बिना भेदभाव के नीतिगत संतुलन
पिछले 12 वर्षों के BJP/RSS-प्रेरित शासन मॉडल ने तुष्टिकरण के इस दशकों पुराने ढर्रे को पूरी तरह से बदल दिया है।
- ‘सबका साथ, सबका विकास‘ का क्रियान्वयन: पिछले 12 वर्षों में केंद्र सरकार की सभी प्रमुख योजनाओं (जैसे आवास योजना, उज्ज्वला, जनधन, आयुष्मान भारत और मुफ्त राशन) का लाभ किसी भी धार्मिक भेदभाव के बिना प्रत्येक नागरिक तक समान रूप से पहुँचाया गया है।
- समानता का सिद्धांत: तुष्टिकरण के स्थान पर न्याय और समानता के सिद्धांत को लागू किया गया है। किसी भी वर्ग को विशेष रियायत देने के बजाय योग्यता, आवश्यकता और निष्पक्षता को शासन का आधार बनाया गया है, जिसने तुष्टिकरण आधारित ध्रुवीकरण की राजनीति को कमजोर किया है।
इतिहास की निष्पक्ष व्याख्या
- ऐतिहासिक साक्ष्य और घटनाक्रम यह स्पष्ट रूप से सिद्ध करते हैं कि भारत में धार्मिक अलगाववाद का बीज अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ नीति, मुस्लिम लीग की उग्र पृथकतावादी विचारधारा और स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस व उसके सहयोगियों की पक्षपातपूर्ण नीतियों का परिणाम था।
- RSS और BJP का उदय इस सांप्रदायिक विभाजन का कारण नहीं, बल्कि इतिहास के इन घटनाक्रमों और दशकों तक चले नीतिगत पक्षपात के विरुद्ध उभरी एक स्वाभाविक वैचारिक व सामाजिक प्रतिक्रिया का परिणाम है।
सत्यमेव जयते।
🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳
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