सारांश (Summary)
- यह विस्तृत और तथ्य-आधारित राजनीतिक-सामाजिक विश्लेषण कश्मीर में अलगाववाद, आतंकवाद और उसके तंत्र के पूर्ण पतन की पड़ताल करता है। लेख में 25 जनवरी 1990 को श्रीनगर के रावलपोरा में हुए निर्मम हत्याकांड को केंद्र में रखा गया है, जहाँ JKLF के मुख्य शूटर यासीन मलिक और उसके सहयोगियों ने भारतीय वायु सेना (IAF) के 4 निहत्थे जवानों—जिसमें स्क्वाड्रन लीडर रवि खन्ना शामिल थे—की हत्या कर दी थी और 40 अन्य को गंभीर रूप से घायल कर दिया था।
- विश्लेषण में इस बात पर गहरा आक्रोश व्यक्त किया गया है कि कैसे दशकों तक ऐसे जघन्य अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण और दिल्ली के गलियारों में शाही आवभगत दी गई।
- चार विस्तृत खंडों के माध्यम से यह लेख ‘कर्म’ के अटूट सिद्धांत, पाकिस्तान में बेनकाब होते अलगाववादी इकोसिस्टम और कानूनी न्याय की बारीकियों पर प्रकाश डालता है।
- लेख में यह स्पष्ट किया गया है कि यासीन मलिक जैसे अपराधियों के लिए एक पल में फांसी की सजा के बजाय तिहाड़ जेल की चारदीवारी में पश्चाताप से भरी हर एक सेकंड की सजा ही वास्तविक न्याय है।
- यह विश्लेषण शहीदों के परिवारों के साढ़े तीन दशकों के संघर्ष और नए भारत के दृढ़ प्रशासनिक रवैये को रेखांकित करता है।
यासीन मलिक और कर्म का हिसाब
खंड 1: आक्रोश की शुरुआत: जब आस्तीन के सांपों को मिला राजनीतिक संरक्षण
- कश्मीर की खूबसूरत वादियों को दशकों तक गन कल्चर, धार्मिक कट्टरता और अलगाववाद की आग में झोंकने वाले आतंकी आका आज भले ही सलाखों के पीछे बैठकर मानवाधिकारों, गिरते स्वास्थ्य और अपनी बेगुनाही की दुहाई दें, लेकिन भारत का प्रत्येक जागरूक नागरिक आज उनसे सीधा सवाल पूछ रहा है। भारत माता के वीर सपूतों की शहादत पर बिलखते उनके मासूम अनाथ बच्चों, बूढ़े माता-पिता और रोती-बिलखती विधवाओं के आंसुओं का हिसाब कौन देगा? यासीन मलिक जैसे दरिंदों ने केवल एके-47 से गोलियां नहीं चलाईं, बल्कि उन्होंने हंसते-खेलते परिवारों की खुशियों, कश्मीरी पंडितों के हजारों साल पुराने अस्तित्व और कश्मीर के सुनहरे भविष्य की निर्दयता से हत्या की।
- आज जब भारत के नए प्रशासनिक, कूटनीतिक और न्यायिक तंत्र का शिकंजा कसता है, तो यही आतंकी अपने परिवार, अपनी बेटी और अपने निकाह की दुहाई देकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दया की भीख मांगते हैं। परंतु सवाल यह है कि जब 25 जनवरी 1990 को श्रीनगर के रावलपोरा में निहत्थे भारतीय वायु सेना के जवानों पर अंधाधुंध गोलियां बरसाई जा रही थीं, तब इन कसाइयों की दया, इंसानियत और ज़मीर कहाँ सोए हुए थे?
पिछली सरकारों द्वारा तुष्टिकरण और संरक्षण
- तुष्टीकरण और राजनीतिक शरण का दौर: देश के जख्मों पर सबसे बड़ा नमक उस दौर में छिड़का गया जब देशद्रोह और नरसंहार के इस मुख्य आरोपी को तत्कालीन राजनीतिक व्यवस्था में न केवल संरक्षण मिला, बल्कि दिल्ली के लुटियंस जोन में विशेष आवभगत दी गई।
- प्रधानमंत्रियों के साथ बैठकें: तत्कालीन प्रधानमंत्री द्वारा 7 रेस कोर्स रोड (प्रधानमंत्री आवास) पर इस मुख्य शूटर और अलगाववादी को बुलाकर उससे हाथ मिलाना और ‘शांति प्रक्रिया’ के नाम पर शाही सम्मान देना देश कभी नहीं भूल सकता।
- वीआईपी ट्रीटमेंट का कलंक: जिस हत्यारे के हाथों पर हमारे वायु सेना कर्मियों और बेगुनाह नागरिकों का खून लगा था, उसे वीआईपी ट्रीटमेंट देना, सरकारी खर्च पर चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराना और विदेश यात्राओं के लिए पासपोर्ट जारी करना अमर शहीदों के बलिदान का सीधा और अक्षम्य अपमान था।
- अलगाववादी एजेंडे का महिमामंडन: वर्षों तक मुख्यधारा के मीडिया और कुछ बौद्धिक वर्गों द्वारा एक खूंखार आतंकी को ‘गांधीवादी नेता’ और ‘शांतिदूत’ के रूप में पेश करने का कुत्सित प्रयास किया गया, जिससे पीड़ित परिवारों के जख्म हर दिन हरे होते रहे।
खंड 2: 25 जनवरी 1990 का काला सच: वायु सेना के रक्षकों का नरसंहार
इतिहास के पन्नों पर दर्ज 25 जनवरी 1990 की वह काली तारीख आज भी भारत के सीने में शूल की तरह चुभती है। यह वह दौर था जब कश्मीर में अलगाववाद अपने चरम पर था और कश्मीरी पंडितों का पलायन शुरू हो चुका था। श्रीनगर के रावलपोरा इलाके में भारतीय वायु सेना (IAF) के निहत्थे जवान सुबह-सुबह अपनी आधिकारिक बस का इंतजार कर रहे थे।
- निहत्थे रक्षकों पर कायरतापूर्ण वार: उसी समय यासीन मलिक और उसके आतंकी संगठन JKLF (जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट) के हथियारबंद गिरोह ने अचानक चारों तरफ से घेरकर उन पर अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी।
- शहीदों का बलिदान: इस जघन्य आतंकी हमले में स्क्वाड्रन लीडर रवि खन्ना सहित वायु सेना के 4 जांबाज कर्मी ऑन-ड्यूटी शहीद हो गए, जबकि लगभग 40 अन्य जवान गंभीर रूप से घायल हो गए।
- जांच एजेंसियों का अकाट्य खुलासा: अगस्त 1990 में CBI द्वारा जम्मू की TADA अदालत में दाखिल की गई विस्तृत चार्जशीट और प्रत्यक्षदर्शी गवाहों के बयानों ने यह पूरी तरह साफ कर दिया कि इस हत्याकांड में यासीन मलिक ही मुख्य शूटर था, जिसने स्वयं अपनी राइफल से देश के रक्षकों पर गोलियां दागी थीं।
- साढ़े तीन दशकों का अनवरत कानूनी संघर्ष: शहीद जवानों के परिवारों ने इस गद्दार को कभी माफ नहीं किया। स्क्वाड्रन लीडर रवि खन्ना की धर्मपत्नी शालिनी खन्ना आज साढ़े तीन दशकों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी अपने पति के सम्मान और न्याय की लौ जलाए बैठी हैं। उन्होंने हर विषम परिस्थिति में इस लड़ाई को लड़ा और इस क्रूर हत्यारे के लिए कठोरतम सजा की मांग जारी रखी।
खंड 3: ‘कर्म’ का चक्र और प्रायोजित ढोंग का अंत
सृष्टि का यह अटूट नियम है कि समय का चक्र जब घूमता है, तो ‘कर्म’ का सिद्धांत अपना हिसाब स्वयं चुकता करता है। जो अलगाववादी कभी पाकिस्तान और उसके नापाक खुफिया तंत्र (ISI) के इशारों पर नाचते थे, बंद हड़तालों के फरमान जारी करते थे और मासूम कश्मीरी युवाओं के हाथों में पत्थर और बंदूकें थमाकर अपनी राजनीति चमकाते थे, आज वे तिहाड़ जेल की तंग, अंधेरी और बदबूदार कोठरियों में अपने पापों की सजा भुगत रहे हैं।
- पाकिस्तान में बेनकाब होता नेटवर्क: यासीन मलिक के जेल जाने के बाद उसकी पत्नी मुशाल मलिक द्वारा पाकिस्तान और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चलाए गए तथाकथित अभियानों का सच भी अब पूरी तरह बेनकाब हो चुका है।
- प्रायोजित ड्रामे का खुलासा: जिस तरह से पाकिस्तानी राजनीतिक गलियारों और आतंकी आकाओं द्वारा मुशाल मलिक को राजनीतिक मोहरा बनाकर इस्तेमाल किया गया, उसने इस पूरे अलगाववादी इकोसिस्टम के नैतिक पतन और खोखलेपन को दुनिया के सामने उजागर कर दिया।
- व्यक्तिगत और रणनीतिक पतन: जो लोग दूसरों के हंसते-खेलते घरों को उजाड़कर अपनी रोटियां सेंकते थे, आज उनका स्वयं का व्यक्तिगत, पारिवारिक और राजनीतिक ढांचा पूरी तरह ढह चुका है।
- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर असहायता: आज न तो उनका कोई अंतरराष्ट्रीय आका उन्हें बचा पा रहा है और न ही उनका कोई पुराना प्रायोजित एजेंडा काम आ रहा है। जेल की सलाखों के पीछे बैठा आतंकी आज न केवल कानूनी रूप से पंगु हो चुका है, बल्कि उसका पूरा नेटवर्क पूरी तरह ध्वस्त कर दिया गया है।
खंड 4: वास्तविक न्याय: फांसी से भी बदतर तड़प
ऐसे देशद्रोही और आस्तीन के सांप के लिए केवल फांसी की सजा देकर एक पल में समाप्त कर देना पूर्ण या वास्तविक न्याय नहीं होगा, क्योंकि फांसी तो उसे इस दुनिया के तमाम शारीरिक कष्टों, मानसिक ग्लानि और पश्चाताप से तुरंत मुक्ति दे देगी। वास्तविक न्याय तो तब होगा जब इस दरिंदे को जेल की चारदीवारी के भीतर फांसी से भी बदतर, तड़प-तड़पकर जीने वाली सजा मिले।
- अंधेरे और तन्हाई में पश्चाताप: यह आतंकी तिहाड़ जेल के उस घने अंधेरे, सन्नाटे और तन्हाई में उस असह्य मानसिक और शारीरिक दर्द को हर एक सेकंड महसूस करे, जो उसने देश के शहीद जवानों की विधवाओं, अनाथ बच्चों और बेघर हुए लाखों कश्मीरी पंडितों को जीवनभर के लिए दिया है।
- कानून के शासन का अंतिम संदेश: कानून का यह संदेश स्पष्ट होना चाहिए कि जब तक उसकी सांसें चलें, जेल का हर एक दिन उसके लिए मौत से भी ज्यादा खौफनाक और दर्दनाक साबित हो।
- नए भारत की संप्रभुता: यही भारत की अखंडता, कानून के शासन और देश के लिए प्राण न्योछावर करने वाले अमर शहीदों के खून का असली और सबसे कड़ा हिसाब होगा। अब भारत किसी आतंकी के आगे झुकेगा नहीं, बल्कि अपने शहीदों के सम्मान की रक्षा के लिए अंतिम हद तक जाएगा।
🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳
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