सारांश
- यह विस्तृत विश्लेषणात्मक आलेख राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं (जैसे NEET-UG और UGC-NET) में हुई गड़बड़ियों पर विपक्ष, एक्टिविस्टों, बॉलीवुड हस्तियों और स्वघोषित ‘न्यूट्रल’ डिजिटल इंफ्लुएंसर्स द्वारा मचाए गए बवंडर और इसके विपरीत, गैर-भाजपा शासित राज्यों (कर्नाटक, झारखंड, पंजाब और केरल) में हुए व्यापक भर्ती घोटालों पर साधे गए सन्नाटे के दोहरे मापदंडों का एक तीखा, अकादमिक और रणनीतिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
- यह पाठ उजागर करता है कि कैसे युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ होने पर भी प्रशासनिक जवाबदेही तय करने के बजाय अतीत के घोटालों की आड़ लेकर त्यागपत्र देने से इंकार किया जा रहा है।
- इस विमर्श में इस कटु सत्य को रेखांकित किया गया है कि यदि आज इन राज्यों में भाजपा की सरकार होती, तो विपक्षी दल, बॉलीवुड सेलिब्रिटीज और टूलकिट इंफ्लुएंसर्स सड़कों पर उतरकर आंदोलनों को हवा दे रहे होते। चूंकि वहां ‘इंडी गठबंधन’ और गैर-भाजपा दलों की सरकारें हैं, इसलिए पूरा इकोसिस्टम आपराधिक चुप्पी साधे हुए है।
- यह निबंध सत्ता के अहंकार, राजनीतिक पाखंड और ‘चयनात्मक आक्रोश’ (Selective Outrage) को बेनकाब करते हुए यह स्थापित करता है कि युवाओं का हित केवल तभी तक मायने रखता है जब तक उससे राजनीतिक रोटियां सेंकी जा सकें।
NEET और UGC-NET पर हंगामा, कर्नाटक से केरल तक पेपर लीक पर खामोशी
भाग 1: ‘राजनीतिक सहूलियत का विरोध’ — गैर-भाजपा राज्यों पर मौन का सच
प्रतियोगी परीक्षाओं में धांधली का मुद्दा सीधे तौर पर देश के लाखों मेधावी युवाओं की कठिन मेहनत, उनके परिवारों के सपनों और प्रशासनिक नींव से जुड़ा है। लेकिन जब इस गंभीर विषय में निष्पक्षता के बजाय राजनीतिक अवसरवाद हावी हो जाता है, तो व्यवस्था का दोहरा चरित्र खुलकर सामने आता है।
- NEET और UGC-NET पर राष्ट्रीय स्तर का अभूतपूर्व हंगामा: राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षाओं में गड़बड़ी और अनियमितताओं की खबरें आते ही पूरे देश में एक सोची-समझी रणनीति के तहत राजनीतिक बवंडर खड़ा कर दिया गया। जंतर-मंतर से लेकर हर राज्य की राजधानी तक सड़कों पर चक्काजाम किया गया, प्रेस कॉन्फ्रेंसों के जरिए ‘लोकतंत्र और शिक्षा प्रणाली के विनाश’ के बड़े-बड़े दावे किए गए, और तुरंत केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग उठाई गई।
- विपक्षी राज्यों के भर्ती घोटालों पर रहस्यमयी सन्नाटा:
- काश आज झारखंड में भाजपा की सरकार होती…
- काश आज पंजाब में भाजपा की सरकार होती…
- काश आज कर्नाटक में भाजपा की सरकार होती…
- काश आज केरल में भाजपा की सरकार होती…
- यदि इन राज्यों में आज भाजपा की सरकार होती, तो विपक्षी दलों के तमाम बड़े नेता तुरंत सड़कों पर उतरकर इन आंदोलनों से जुड़ जाते और चौबीसों घंटे टीवी मीडिया व सोशल मीडिया पर केंद्र और राज्य सरकार को घेर रहे होते।
- बॉलीवुड और ‘अवॉर्ड वापसी‘ ब्रिगेड का दोहरा रवैया: गैर-भाजपा शासित राज्यों में युवाओं पर पुलिस की निर्मम लाठियां बरसने या खुलेआम पेपर लीक होने पर बॉलीवुड के बड़े-बड़े स्टार्स अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर कोई स्टोरी या पोस्ट नहीं लगाते। ‘जस्टिस फॉर स्टूडेंट्स’ का ट्रेंड केवल राजनीतिक सहूलियत देखकर और प्रायोजित एजेंडे के तहत ही चलाया जाता है।
- राजनीतिक एजेंडे का कड़वा सच: अब कोई कुछ नहीं बोलेगा क्योंकि इन राज्यों में भाजपा की सरकार नहीं है। यह पाखंड साबित करता है कि तथाकथित विरोध केवल युवाओं को न्याय दिलाने के लिए नहीं, बल्कि केवल भाजपा शासित राज्यों में दंगा-फसाद, अशांति और आंदोलन खड़ा करने के लिए आयोजित किया जाता है।
- भविष्य की रणनीति — राजनीतिक पाखंड का अंत: अब देश की जनता और युवाओं के बीच यह चेतना जग रही है कि इन सभी गैर-भाजपा शासित राज्यों में भी भाजपा की सरकार लाना आवश्यक है, ताकि ये विपक्षी नेता, टूलकिट गैंग और एक्टिविस्ट वहां भी जाकर आंदोलन, दंगा-फसाद और सवाल खड़े कर सकें, और वहां के युवाओं को भी वही ‘मीडिया अटेंशन’ और न्याय मिल सके जो भाजपा शासित राज्यों में दिया जाता है।
भाग 2: कर्नाटक, झारखंड, पंजाब और केरल की ज़मीनी हकीकत
गैर-भाजपा शासित राज्यों में युवाओं के साथ हो रहे अन्याय और प्रशासनिक भ्रष्टाचार का दायरा अत्यंत भयावह और चिंताजनक है, जिसकी जमीनी हकीकत को यह इकोसिस्टम जानबूझकर छिपाता है।
- 1. कर्नाटक का PSI (पुलिस सब-इंस्पेक्टर) भर्ती घोटाला:
- व्यापक भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी: ओएमआर शीटों में बड़े पैमाने पर हेरफेर, खाली पन्नों को बाद में भरने की सांठगांठ और करोड़ों रुपये के लेनदेन के ठोस साक्ष्य सामने आने के बाद भी राज्य सरकार का रवैया संवेदनहीन रहा है।
- गृह मंत्री का हठधर्मिता से भरा बयान: जब मीडिया ने सवाल पूछा, तो गृह मंत्री ने बेशर्मी से कहा कि वे इस्तीफा नहीं देंगे। उन्होंने कहा कि “पहले छात्रों को 25 दिन की भूख हड़ताल करने दो, मुझे उन पर लाठीचार्ज करके तोड़ने दो, उसके बाद देखूंगा।” इसके साथ ही पूर्ववर्ती एस.आर. बोम्मई सरकार का हवाला देकर भ्रष्टाचार का बचाव किया गया।
- 2. झारखंड में JSSC का निरंतर पेपर लीक:
- परीक्षाओं में अनियंत्रित धांधली: झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) की परीक्षाओं में बार-बार प्रश्नपत्र लीक होना एक स्थायी परिपाटी बन चुका है।
- छात्रों पर पुलिसिया दमन: वर्षों की मेहनत के बाद जब छात्र परीक्षा हॉल में पहुंचते हैं, तो पता चलता है कि पेपर बिक चुका है। जब वे सड़कों पर विरोध दर्ज कराते हैं, तो हेमंत सोरेन सरकार की पुलिस उन पर निर्ममता से लाठियां बरसाती है और उन पर मुकदमे दर्ज करती है।
- 3. पंजाब में भर्ती प्रक्रियाओं की प्रशासनिक विफलता:
- अनिश्चितता में अटका भविष्य: पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार के तहत प्रशासनिक, तकनीकी और पुलिस भर्ती परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक होने या अंतिम समय पर रद्द होने के कारण लाखों युवाओं का भविष्य अधर में लटका हुआ है।
- ‘बदलाव‘ के दावों का खोखलापन: पारदर्शी शासन का दावा करने वाले नेता पंजाब के युवाओं के आक्रोश पर पूरी तरह से मौन साधे हुए हैं।
- 4. केरल में PSC भर्ती विवाद और प्रशासनिक पक्षपात:
- स्वजन पक्षपात और धांधली: केरल पब्लिक सर्विस कमीशन (PSC) की नियुक्तियों में कथित भाई-भतीजावाद, सत्तारूढ़ वामपंथी दल के कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता देने और अनियमितताओं को लेकर स्थानीय युवा और छात्र संगठन लगातार सड़कों पर आंदोलन कर रहे हैं।
- मुख्यधारा के मीडिया का मौन: केरल के छात्रों के इस दमन पर राष्ट्रीय मीडिया और वामपंथी बुद्धिजीवी वर्ग पूरी तरह से आंखें मूंदकर बैठा है।
भाग 3: ‘इंडी गठबंधन’ और शीर्ष विपक्षी नेताओं का राजनीतिक पाखंड
विपक्ष का मुख्य दायित्व सरकार को घेरना और जनता के अधिकारों की रक्षा करना होता है, लेकिन जब विपक्ष स्वयं अपनी सहूलियत के आधार पर मुद्दों का चयन (Cherry-Picking) करने लगे, तो उसकी विश्वसनीयता पूरी तरह नष्ट हो जाती है।
- राहुल गांधी, प्रियंका वाड्रा और अखिलेश यादव का दोहरा मापदंड:
- केंद्र सरकार के किसी भी निर्णय या राष्ट्रीय परीक्षा (जैसे NEET) पर तुरंत वीडियो संदेश जारी करने और अभ्यर्थियों के पास जाकर तस्वीरें खिंचवाने वाले राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा कर्नाटक, झारखंड, पंजाब या केरल के पीड़ित युवाओं के पास क्यों नहीं जाते?
- अखिलेश यादव और अन्य घटक दलों के नेता केंद्र के खिलाफ ‘युवा विरोधी’ होने का भाषण तो देते हैं, लेकिन अपने सहयोगी दलों द्वारा शासित राज्यों में युवाओं पर हो रहे लाठीचार्ज पर उनके मुंह में ‘दही जम’ जाता है।
- ‘न्याय‘ के दावों की खुली पोल: जिस ‘न्याय’ और ‘संविधान रक्षा’ की बात राजनीतिक मंचों से की जाती है, वह न्याय कर्नाटक और झारखंड की सीमा पर आकर समाप्त हो जाता है। यह रुख साबित करता है कि विपक्ष के लिए छात्र हित केवल एक ‘पॉलिटिकल टूल’ (राजनीतिक हथियार) है, न कि कोई वास्तविक वैचारिक प्रतिबद्धता।
- संस्थागत निष्पक्षता की बलि: जब राज्य स्तर के घोटालों पर शीर्ष विपक्षी नेतृत्व चुप्पी साधे रखता है, तो इससे राज्य सरकारों के भ्रष्ट तंत्र को संरक्षण मिलता है और वे बेखौफ होकर युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करते रहते हैं।
भाग 4: टूलकिट इकोसिस्टम, डिजिटल दलालों और ‘यूट्यूबर’ ब्रिगेड का पर्दाफाश
सोशल मीडिया के दौर में ‘न्यूट्रल जर्नलिज्म’ और ‘स्वतंत्र इंफ्लुएंसर’ का नकाब पहनकर बैठने वाले डिजिटल मसीहाओं की भूमिका इस पूरे मामले में सबसे अधिक संदिग्ध और शर्मनाक रही है।
- ध्रुव राठी, अभिजीत दीपके और ‘न्यूट्रल‘ यूट्यूबर्स की रहस्यमयी खामोशी:
- यूट्यूब और सोशल मीडिया पर दिन-रात लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की आजादी और प्रशासनिक जवाबदेही पर उपदेश देने वाले ये स्वघोषित इंफ्लुएंसर्स NEET और UGC-NET पर तो घंटों लंबे वीडियो बनाते हैं।
- लेकिन जैसे ही कर्नाटक PSI घोटाले, झारखंड JSSC पेपर लीक, या पंजाब व केरल की धांधली का जिक्र आता है, इनके यूट्यूब चैनलों, एक्स (ट्विटर) हैंडल और इंस्टाग्राम पेजों पर श्मशान जैसा सन्नाटा छा जाता है।
- ‘टूलकिट‘ और प्रायोजित एजेंडे का कड़वा सच:
- यह ‘चयनात्मक चुप्पी’ (Selective Silence) साबित करती है कि ये इंफ्लुएंसर्स किसी निष्पक्षता या सत्य की खोज के लिए काम नहीं कर रहे हैं, बल्कि इनका संचालन एक सुनियोजित ‘टूलकिट’ और विशिष्ट राजनीतिक आकाओं के इशारे पर हो रहा है।
- जब तक फंड और पॉलिटिकल नैरेटिव का समर्थन मिलता है, तब तक ये ‘क्रांति’ की बात करते हैं; और जहां इनके राजनीतिक आकाओं की सरकार फंसी, वहां ये ‘कॉकरोच’ की तरह बिलों में छिप जाते हैं।
- जनता और युवाओं के सामने बेनकाब होता इकोसिस्टम: आज का युवा समझ चुका है कि इन डिजिटल इंफ्लुएंसर्स का उद्देश्य छात्रों को न्याय दिलाना नहीं, बल्कि अपने व्यूज (Views), स्पॉन्सरशिप और राजनीतिक आकाओं के एजेंडे को आगे बढ़ाना है।
निष्कर्ष: युवाओं की चेतना और प्रशासनिक जवाबदेही का समय
- नीति, नीयत और निष्पक्षता ही किसी भी शासन व्यवस्था की वास्तविक कसौटी होती हैं। यदि आप दिल्ली में बैठकर केंद्र सरकार पर सवाल उठाने का नैतिक साहस रखते हैं, तो आपको बेंगलुरु, रांची, चंडीगढ़ और तिरुवनंतपुरम की सड़कों पर रोते हुए छात्रों का दर्द भी दिखाई देना चाहिए।
- देश का युवा अब इस दोहरे चरित्र, प्रशासनिक अहंकार और राजनीतिक पाखंड को भली-भांति समझ चुका है। चाहे वह कर्नाटक का पुलिस भर्ती घोटाला हो, झारखंड का JSSC पेपर लीक हो या NEET की परीक्षा, युवाओं के अधिकारों और उनकी मेहनत पर डाका डालने वाली सरकारों और उनका बचाव करने वाले चाटुकार इकोसिस्टम को जवाब देना ही होगा।
“न्याय कोई सहूलियत की वस्तु नहीं है जिसे राजनीति के हिसाब से बांटा जाए। जो लोग दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्र हित की दुहाई देते हैं, लेकिन अपने राजनीतिक सहयोगियों के राज्यों में हो रहे घोटालों पर चुप्पी साध लेते हैं, वे युवाओं के सबसे बड़े विरोधी हैं। सच को अपनी सहूलियत के हिसाब से देखने वाले कभी बदलाव के नायक नहीं हो सकते।”
🇮🇳जय भारत, वन्देमातरम🇮🇳
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