सारांश
- यह विस्तृत आख्यान भारतीय न्यायपालिका के कथित चयनात्मक दृष्टिकोण, संवैधानिक दोहरे मापदंडों और बहुसंख्यक हिंदू समाज के प्रति संस्थागत विषमता का एक अत्यंत गहरा, तार्किक और प्रमाणिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
- भाजपा सांसद डॉ. निशिकांत दुबे के बयानों और प्रसिद्ध वैज्ञानिक व लेखक डॉ. आनंद रंगनाथन द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष उठाए गए 9 ज्वलंत प्रश्नों को आधार बनाकर यह लेख न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) के सामाजिक व राजनैतिक दुष्प्रभावों का पर्दाफाश करता है।
- यह विमर्श ‘कानून के समक्ष समानता’ के संवैधानिक सिद्धांत की कसौटी पर न्यायपालिका की भूमिका की समीक्षा करता है। कश्मीरी हिंदुओं की अनसुनी त्रासदी, वक्फ कानून का अनियंत्रित एकाधिकार, हिंदू मंदिरों का सरकारीकरण, शिक्षा के अधिकार (RTE) में भेदभाव, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पाखंड, सांस्कृतिक हस्तक्षेप और शाहीन बाग जैसी अराजकता पर न्यायिक निष्क्रियता जैसे गंभीर मुद्दों पर प्रकाश डालते हुए यह आलेख भारतीय न्याय प्रणाली (विशेषकर कोलेजियम व्यवस्था) में एक व्यापक, पारदर्शी और न्यायसंगत सुधार की अपरिहार्यता को रेखांकित करता है।
न्यायिक सक्रियता बनाम न्यायिक संयम: संवैधानिक संतुलन का प्रश्न
I. नए नेतृत्व में न्यायिक सुधारों का उदय: बदलाव की एक नई बयार
विगत कुछ समय में भारतीय न्यायपालिका की कार्यप्रणाली, प्रशासनिक प्राथमिकताओं और वैचारिक दृष्टिकोण में एक स्पष्ट और सकारात्मक बदलाव देखने को मिला है, जिसने आम नागरिकों में न्याय के प्रति विश्वास को पुनर्जीवित किया है।
- प्रशासनिक दृढ़ता और गति: पिछले कुछ महीनों में जब से मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने पदभार संभाला है, तब से न्यायिक प्रणाली में कुछ बेहद बुनियादी, साहसिक और दूरगामी सुधार देखने को मिल रहे हैं। मुकदमों के त्वरित निस्तारण, लंबित मामलों की समीक्षा और प्रशासनिक पारदर्शिता की दिशा में उठाए गए कदम इस बात का प्रमाण हैं कि व्यवस्था अब पुरानी जड़ता से बाहर निकल रही है।
- राष्ट्रहित और देशभक्तों को प्राथमिकता: यह बदलाव इसलिए भी बेहद स्वागत योग्य है क्योंकि पूर्व के कालखंडों में कई बार ऐसा प्रतीत होता था कि देशविरोधी तत्वों, दंगाइयों और चरमपंथियों को मानवाधिकारों और ‘त्वरित सुनवाई’ के नाम पर न्यायिक प्रणाली से अनुचित संरक्षण या प्राथमिकता मिल जाती थी। इसके विपरीत, वास्तविक देशभक्त, कानून का पालन करने वाले नागरिक और ऐतिहासिक अन्याय से पीड़ित समाज दशकों तक अदालतों के चक्कर काटता रहता था। वर्तमान नेतृत्व ने इस विसंगति को दूर करने का प्रयास किया है।
- गति तेज करने की आवश्यकता: हालाँकि वर्तमान नेतृत्व के तहत यह सुधार एक नई उम्मीद जगाता है, लेकिन इस प्रक्रिया को और अधिक तीव्र करने की आवश्यकता है। न्याय की गति इतनी तेज होनी चाहिए कि राष्ट्र की सुरक्षा और संप्रभुता से समझौता करने वाले तत्वों को तत्काल दंड मिले और सभ्यतागत अन्याय से पीड़ित देशभक्तों को त्वरित, सुलभ और सम्मानजनक न्याय मिल सके।
II. कश्मीरी हिंदुओं की त्रासदी बनाम पूर्व की न्यायिक अति-सक्रियता
पूर्व के कालखंडों में संवैधानिक व्याख्याओं और राजनैतिक याचिकाओं के लिए न्यायालय के दरवाजे जिस असाधारण रूप से सक्रिय हो जाते थे, वैसी तत्परता सबसे बड़े मानवीय और सभ्यतागत नरसंहार पर नहीं दिखाई गई।
- अनुच्छेद 370 पर असाधारण गति: पूर्व में सर्वोच्च न्यायालय ने जम्मू-कश्मीर से विशेष दर्जा हटाने वाले संवैधानिक निर्णय (अनुच्छेद 370 के निरस्तीकरण) के खिलाफ विपक्षी दलों, वामपंथी विचारकों और कश्मीरी अलगाववादी तत्वों द्वारा दायर याचिकाओं पर असाधारण तत्परता और गति से विचार किया था। संवैधानिक व्याख्याओं के लिए न्यायालय की आधी रात को भी सुनवाई करने की ‘जीवंतता’ जगजाहिर है।
- सनातनी नरसंहार की तकनीकी अनदेखी: इसके विपरीत, जब 1990 के दशक में कश्मीरी हिंदुओं के खिलाफ हुए भयानक और बर्बर अत्याचारों—जैसे साढ़े तीन लाख से अधिक लोगों का जबरन विस्थापन, सामूहिक नरसंहार, महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार, संपत्तियों पर अवैध कब्जे और सैकड़ों प्राचीन मंदिरों के विध्वंस—को लेकर पीड़ितों द्वारा याचिकाएं दायर की गईं, तो तत्कालीन न्यायपालिका ने उन्हें यह क्रूर तर्क देते हुए खारिज कर दिया कि “इस बात को बहुत लंबा समय (लगभग तीन दशक) बीत चुका है और अब साक्ष्य जुटाना संभव नहीं है।”
- सामूहिक जन-आक्रोश का मूल कारण: इतिहास के इतने भीषण, प्रत्यक्ष और अनसुलझे मानवीय संकट पर समय सीमा (Statute of Limitations) का तकनीकी बहाना बनाना और दूसरी ओर राजनैतिक एजेंडों पर त्वरित सुनवाई करना, बहुसंख्यक समाज के भीतर न्याय प्रणाली के प्रति एक गहरा अविश्वास पैदा करता रहा है। यह चयनात्मक न्याय समाज में यह आत्मघाती संदेश देता है कि पीड़ितों की पीड़ा को भी राजनैतिक प्राथमिकताओं के चश्मे से आंका जा सकता है।
III. वक्फ कानून का अनियंत्रित एकाधिकार और न्यायालय की मूक सहमति
प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों (Principles of Natural Justice) का खुला उल्लंघन करने वाले और देश के भीतर एक समानांतर न्यायिक व्यवस्था खड़ी करने वाले कानूनों पर लंबे समय तक संस्थागत चुप्पी देखी गई है।
- समानांतर और दमनकारी व्यवस्था: वक्फ अधिनियम, 1995 (विशेषकर 2013 के संशोधनों के बाद) ने वक्फ बोर्ड को एक ऐसी असीमित, अनियंत्रित और असंवैधानिक शक्ति प्रदान कर दी, जिसके तहत वह देश की किसी भी निजी या सार्वजनिक संपत्ति को ‘वक्फ की संपत्ति’ घोषित कर सकता है। इस कानून ने पीड़ितों से सीधे देश की अदालतों (Civil Courts) में जाने का अधिकार छीनकर उन्हें वक्फ के ही ट्रिब्यूनल के चक्कर काटने पर विवश किया।
- दशकों का न्यायिक मौन: पिछले 30 वर्षों में वक्फ बोर्ड ने रेलवे और रक्षा मंत्रालय के बाद देश में तीसरा सबसे बड़ा भूमि बैंक (लगभग 8 लाख एकड़ से अधिक भूमि) स्थापित कर लिया। तमिलनाडु के प्राचीन हिंदू मंदिरों और पूरे के पूरे हिंदू बहुल गांवों तक को वक्फ की संपत्ति घोषित कर दिया गया, परंतु देश की शीर्ष अदालत दशकों तक इस समानांतर, मजहबी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था पर पूरी तरह मूकदर्शक बनी रही।
- सुधारों के समय अचानक जागी धार्मिक संवेदनशीलता: वर्तमान समय में जब संसद द्वारा इस कानून की विसंगतियों को दूर करने, पीड़ितों को न्याय दिलाने और प्रशासनिक पारदर्शिता लाने के लिए संशोधनों के प्रयास किए जा रहे हैं, तो न्यायिक और राजनैतिक गलियारों में इसे अचानक ‘धार्मिक स्वतंत्रता पर आघात’ के रूप में प्रचारित किया जाने लगा है। यह दृष्टिकोण यह गंभीर प्रश्न खड़ा करता है कि क्या कानून की व्याख्या इस आधार पर बदल जाती है कि उसका प्रभाव किस विशेष समुदाय पर पड़ रहा है।
IV. मंदिरों का सरकारीकरण और हिंदुओं पर वित्तीय व शैक्षणिक भेदभाव
भारतीय सेक्युलर राज्य की सबसे बड़ी विसंगति यह है कि यहाँ केवल बहुसंख्यक हिंदू समाज के मंदिरों और उनकी अचल संपत्तियों का नियंत्रण, संचालन और प्रबंधन राज्य सरकारों के हाथों में है, जबकि अल्पसंख्यकों को पूर्ण स्वायत्तता प्राप्त है।
- धार्मिक संपदा का सेक्युलर दोहन: तिरुपति बालाजी, जगन्नाथ पुरी, सिद्धिविनायक और गुरुवायूर जैसे भव्य और ऐतिहासिक हिंदू मंदिरों की अरबों रुपए की वार्षिक आय का एक बड़ा हिस्सा सरकारी खजाने (State Exchequers) में जाता है, जिसका उपयोग अक्सर गैर-हिंदू गतिविधियों, अल्पसंख्यक ऋणों, हज यात्राओं के बुनियादी ढांचे, मदरसों के आधुनिकीकरण और राजनैतिक इफ्तार दावतों के लिए किया जाता है।
- अल्पसंख्यक संस्थानों को असीमित संवैधानिक स्वायत्तता: इसके विपरीत, संविधान के अनुच्छेद 30 के तहत मुस्लिम, ईसाई और अन्य अल्पसंख्यक संस्थाओं को अपनी धार्मिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक संस्थाएं बिना किसी सरकारी हस्तक्षेप, ऑडिट या नियंत्रण के चलाने की पूर्ण और निर्बाध स्वतंत्रता प्राप्त है। विडंबना यह है कि हिंदू समाज को अपने ही चढ़ावे और धन का उपयोग अपने धर्म के प्रचार, वेदों की शिक्षा, गुरुकुलों के संचालन या अपने पीड़ित समाज के उत्थान के लिए करने की कानूनी अनुमति नहीं है।
- शिक्षा के अधिकार (RTE) का आत्मघाती कानून: शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत केवल हिंदू संचालित स्कूलों के लिए 25% सीटें आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए आरक्षित करना और भारी प्रशासनिक व वित्तीय नियमों का पालन करना अनिवार्य बनाया गया। अल्पसंख्यक (मुस्लिम और ईसाई) स्कूलों को इस कानून से पूर्ण छूट दी गई।
- इस भेदभावपूर्ण नीति के कारण पिछले कई दशकों में हजारों हिंदू स्कूल बंद हो गए, जिसने परोक्ष रूप से गरीब हिंदू बच्चों को गैर-हिंदू संस्थानों की शरण में जाने और वहां होने वाले सांस्कृतिक व धार्मिक परिवर्तन (Conversion) के आधार को मजबूत किया।
V. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दोहरे मापदंड (Free Speech Hypocrisy)
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की व्याख्या में न्यायपालिका का दृष्टिकोण ऐतिहासिक रूप से अत्यधिक चयनात्मक और विरोधाभासी रहा है।
- नुपुर शर्मा बनाम न्यायिक अति-सक्रियता: नूपुर शर्मा के मामले में, जिन्होंने एक टीवी डिबेट के दौरान केवल इस्लामिक हदीस के स्वीकृत और लिखित संदर्भों को उद्धृत किया था, सर्वोच्च न्यायालय की एक पीठ ने कानून की स्थापित प्रक्रियाओं (Due Process of Law) को ताक पर रखकर, खुली अदालत में मौखिक रूप से उन्हें “पूरे देश से माफी मांगने” का आदेश दिया और देश में जिहादियों द्वारा की गई हिंसक घटनाओं (जैसे कन्हैया लाल और उमेश कोल्हे की हत्या) के लिए अकेले उन्हें जिम्मेदार ठहरा दिया।
- सनातन विरोधी विषवमन पर उदारवादी मौन: इसके विपरीत, जब तमिलनाडु के सत्ताधारी राजनेताओं (जैसे उदयनिधि स्टालिन, ए राजा) और अन्य वामपंथी विचारकों द्वारा सार्वजनिक मंचों से सनातन धर्म की तुलना “डेंगू, मलेरिया, कोरोना और एड्स” जैसी जानलेवा बीमारियों से की गई और इसके समूल नाश (Eradication) का आह्वान किया गया, तो न्यायपालिका ने इसे ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ या सामान्य राजनीतिक विमर्श मानकर कोई कड़ी दंडात्मक या स्वतः संज्ञान (Suo Motu) की कार्रवाई नहीं की।
- घृणास्पद भाषण (Hate Speech) की चयनात्मक परिभाषा: जब कोई हिंदू संगठन या कार्यकर्ता अपनी सांस्कृतिक और जनसांख्यिकीय रक्षा की बात करता है, तो उसे तुरंत ‘हेट स्पीच’ की श्रेणी में डालकर एफआईआर के निर्देश दिए जाते हैं। इसके विपरीत, जब सार्वजनिक सड़कों और रैलियों से बहुसंख्यक समाज के समूल विनाश या “सर तन से जुदा” के सीधे हिंसक और वहशियाना नारे लगाए जाते हैं, तो न्यायालय ‘अल्पसंख्यक अधिकारों’ की आड़ में सुस्त या मूक रुख अपना लेता था।
VI. सांस्कृतिक उत्सवों और हिंदू परंपराओं पर चयनात्मक प्रतिबंध
न्यायपालिका ने बार-बार हिंदू त्योहारों, लोक-परंपराओं और सांस्कृतिक रीति-रिवाजों को ‘आधुनिक सुधार’ और ‘पर्यावरण संरक्षण’ के दायरे में लाकर प्रतिबंधित या संकुचित किया है।
- सामाजिक सुधार और पर्यावरण के नाम पर केवल हिंदुओं को निशाना: दीपावली के पटाखों पर पूर्ण या आंशिक प्रतिबंध लगाना, जन्माष्टमी पर दही-हांडी की ऊंचाई और बालकों की आयु तय करना, और दशहरा, महाशिवरात्रि या अन्य क्षेत्रीय त्योहारों पर सदियों पुरानी पशु बलि प्रथा को पूरी तरह प्रतिबंधित करना इसके कुछ प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।
- अन्य मजहबों की प्रथाओं पर न्यायिक संकोच: पर्यावरण, वायु-ध्वनि प्रदूषण और जीव दया के ये सभी प्रगतिशील सिद्धांत अन्य धर्मों के त्योहारों पर लागू करते समय न्यायालयों के हाथ कांपने लगते हैं। बकरीद (ईद-उल-अजहा) के दौरान देश भर की सार्वजनिक सड़कों पर होने वाले सामूहिक हलाल, जल प्रदूषण और लाखों बेजुबान जीवों के खुलेआम वध पर न्यायालय कभी स्वतः संज्ञान नहीं लेता। क्रिसमस पर होने वाली भारी आतिशबाजी, जंगलों की कटाई या लाउडस्पीकरों से होने वाले ध्वनि प्रदूषण पर अदालतें हमेशा आंखें मूंद लेती हैं।
- सबरीमाला और परंपराओं पर आघात: सबरीमाला मंदिर के मामले में, न्यायालय ने वहां के आराध्य भगवान अयप्पा की ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ की विशिष्ट परंपरा, मंदिर के इतिहास और करोड़ों महिला श्रद्धालुओं की अपनी भावनाओं को दरकिनार करते हुए महिलाओं के प्रवेश का आदेश दे दिया।
- परंतु जब बात मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश, तीन तलाक (जिसमें कानून संसद को बनाना पड़ा, कोर्ट ने केवल राय दी), हलाला, बहुविवाह या चर्च के भीतर महिला पादरियों की नियुक्ति जैसे अत्यंत दमनकारी और आंतरिक मजहबी विषयों की आती है, तो न्यायालय ‘धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप न करने’ की सुरक्षित नीति का सहारा ले लेता है।
VII. पूजा स्थल अधिनियम 1991 और ऐतिहासिक अन्यायों का वैधानिक संरक्षण
यह कानून अप्रत्यक्ष रूप से उन विदेशी इस्लामी आक्रांताओं (जैसे औरंगजेब, बाबर, गजनी, खिलजी) के अत्याचारों, तलवार के बल पर किए गए धर्म परिवर्तन और तोड़े गए पवित्र हिंदू मंदिरों पर जबरन बनाई गई मस्जिदों और दरगाहों को स्थायी कानूनी मान्यता प्रदान करता है।
- आक्रांताओं के बर्बर कृत्यों को कानूनी ढाल: 1991 का ‘प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट’ (पूजा स्थल अधिनियम) यह दमनकारी प्रावधान करता है कि 15 अगस्त 1947 को जो धार्मिक स्थल जिस स्वरूप में था, उसे कभी बदला नहीं जा सकता और न ही उसके खिलाफ कोई कानूनी याचिका दायर की जा सकती है।
- न्यायिक विफलता और पांच शताब्दियों का संघर्ष: अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि की मुक्ति के लिए सनातनी समाज को पांच शताब्दियों तक सड़कों पर रक्त बहाना पड़ा और स्वतंत्रता के बाद भी स्वतंत्र भारत की अदालतों में सात दशकों तक थका देने वाले कानूनी दांव-पेंच झेलने पड़े।
- आज काशी (ज्ञानवापी) और मथुरा (श्री कृष्ण जन्मभूमि) जैसे स्थानों पर प्रत्यक्ष, साक्षात् और पुरातात्विक (ASI) प्रमाणों के मौजूद होने के बावजूद, इस काले कानून का उपयोग हिंदुओं को उनके सबसे पवित्र आराध्य स्थलों को वापस पाने से रोकने के लिए एक ढाल के रूप में किया जा रही है, जिसे देश की शीर्ष अदालत ने अभी तक असंवैधानिक घोषित नहीं किया है।
VIII. अराजकता पर मौन: शाहीन बाग और सीएए विरोधी आंदोलन
न्यायालय की पूर्व की ढुलमुल और कमजोर नीति ने यह खतरनाक संदेश दिया था कि यदि कोई संगठित, आक्रामक भीड़ सड़कों पर उतर आए, तो वह देश की संसद द्वारा पारित कानून को चुनौती दे सकती है और देश की राजधानी को बंधक बना सकती है।
- सार्वजनिक मार्गों का हिंसक बंधकीकरण: नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA)—जो कि पड़ोसी देशों में प्रताड़ित हो रहे अल्पसंख्यक हिंदुओं, सिखों और बौद्धों को नागरिकता देने का एक मानवीय कानून था—के विरोध में दिल्ली के शाहीन बाग और अन्य राष्ट्रीय मार्गों को महीनों तक अवैध रूप से अवरुद्ध करके रखा गया। इससे लाखों आम नागरिकों के जीवन, व्यापार, बच्चों की शिक्षा और आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं को भारी क्षति पहुंची।
- सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में देश के नागरिकों के ‘RIGHT TO MOVEMENT’ (आवागमन के अधिकार) की रक्षा करने के बजाय, प्रदर्शनकारियों को तुष्ट करने के लिए वार्ताकारों को भेजा।
- कानून के शासन (Rule of Law) का खुला उपहास: इसी कमजोर नीति ने आगे चलकर दिल्ली के भयानक दंगों और किसान आंदोलन के नाम पर लाल किले पर हुए हिंसक उपद्रवों और गणतंत्र दिवस के अपमान की पृष्ठभूमि तैयार की। न्यायपालिका उस पर लंबे समय तक मूकदर्शक बनी रही, जिसने देश की आंतरिक सुरक्षा को गंभीर खतरे में डाला।
न्यायिक जवाबदेही और कोलेजियम प्रणाली में शुद्धिकरण का समय
- भारतीय न्यायपालिका दुनिया की एकमात्र ऐसी व्यवस्था है जहाँ ‘जज ही जजों की नियुक्ति करते हैं’ (COLLEGIUM SYSTEM)। इस प्रणाली में कोई लोकतांत्रिक जवाबदेही, कोई राष्ट्रीय आयोग (जैसे NJAC जिसे कोर्ट ने असंवैधानिक घोषित कर दिया था) या जनता के प्रति कोई उत्तरदायित्व नहीं है।
- इसी बंद कमरों की अपारदर्शिता के कारण अक्सर ऐसे न्यायाधीश और निर्णय सामने आते हैं जो भारत की ज़मीनी हकीकत, सांस्कृतिक संवेदनशीलता, बहुसंख्यक समाज की भावनाओं और राष्ट्रीय सुरक्षा की प्राथमिकताओं से पूरी तरह कटे होते हैं।
- डॉ. निशिकांत दुबे का संसद और न्यायालय के प्रति आक्रोश और डॉ. आनंद रंगनाथन के ये 9 अचूक प्रश्न किसी एक संस्था के प्रति दुर्भावना या अवमानना का परिणाम नहीं हैं, बल्कि यह उस संचित जन-आक्रोश की वास्तविक अभिव्यक्ति है जो दशकों से चल रहे दोहरे मापदंडों के कारण भारतीय नागरिकों के भीतर सुलग रहा है।
- हालाँकि, हाल के महीनों में मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत के नेतृत्व में न्यायिक व्यवस्था में सुधार, प्रशासनिक गतिशीलता और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने की जो सकारात्मक शुरुआत हुई है, वह एक अत्यंत सराहनीय और स्वागत योग्य कदम है।
- यदि भारत के लोकतंत्र और उसके सामाजिक ताने-बाने को बचाना है, तो इस सुधारवादी गति को और तेज करना होगा ताकि ‘छद्म सेक्युलरिज्म’ की एकतरफा परिभाषा को त्यागकर ‘एक देश, एक संविधान और सभी के लिए समान न्याय’ के सिद्धांत को अक्षरशः लागू किया जा सके।
- न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि वह निष्पक्ष रूप से राष्ट्रहित में और देशभक्तों के पक्ष में होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए।
🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳
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