“लाख मतभेद होने के बावजूद कभी ‘अपने घर के शेर’ को मत मारो, वरना बाहर के गीदड़ तुम्हें नोच-नोच कर खा जाएंगे। सावधान रहिए उन अंदरूनी गद्दार गीदड़ों से भी, जो विदेशी ताकतों के साथ मिलकर देश को बर्बाद करने पर तुले हुए हैं!”
सारांश
- वर्तमान वैश्विक और आंतरिक परिदृश्य में भारत एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। विगत 12 वर्षों में देश ने सुरक्षा, अर्थव्यवस्था, कूटनीति और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के क्षेत्रों में जो अभूतपूर्व प्रगति की है, उसने भारत के प्रति दुनिया के दृष्टिकोण को पूरी तरह बदल दिया है।
- हालांकि 70 वर्षों के संचित कुप्रबंधन और औपनिवेशिक मानसिकता के अवशेषों को साफ करने में समय लगना स्वाभाविक है। इस प्रक्रिया में कई प्रशासनिक व व्यावहारिक अनसुलझे मुद्दे उभर सकते हैं, लेकिन व्यापक सभ्यतागत हितों, राष्ट्रीय अखंडता और सार्वभौमिक संप्रभुता की रक्षा के लिए राजनीतिक और सामाजिक स्थिरता अत्यंत आवश्यक है।
- देश विरोधी इकोसिस्टम, वैश्विक ‘डीप स्टेट’ तथा विदेशी ताकतों के सम्मिलित प्रयासों का मुकाबला करने के लिए राष्ट्रप्रेमी समाज को एकजुट रहकर दूरदर्शी नेतृत्व का संबल बनना होगा।
एक विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण
1. प्रस्तावना: तात्कालिक असंतोष बनाम सभ्यतागत दृष्टिकोण
राजनीतिक चेतना का सबसे परिपक्व रूप वह है जो तात्कालिक असंतोष और दीर्घकालिक सभ्यतागत अस्तित्व के बीच अंतर कर सके।
- आंतरिक मतभेद और लोकतंत्र: लोकतंत्र में किसी नीति, कर व्यवस्था या स्थानीय प्रशासनिक निर्णय से सहमति या असहमति होना पूरी तरह स्वाभाविक है। यह जनतंत्र की जीवंतता का प्रमाण है।
- अस्तित्व की प्राथमिक चुनौती: जब चुनौती केवल प्रशासनिक नीतियों तक सीमित न रहकर देश की संप्रभुता, पहचान और सभ्यतागत अस्तित्व पर आ जाए, तो आंतरिक मतभेदों को राष्ट्रहित के ऊपर तरजीह देना आत्मघाती साबित होता है।
- ‘घर के शेर’ का रूपक: कहावत स्पष्ट है—यदि आंतरिक नाराजगी के कारण अपने ही संरक्षक और मजबूत स्तंभों को कमजोर किया गया, तो बाहर की विघटनकारी और अराजक शक्तियां (गीदड़) समाज को छिन्न-भिन्न करने में तनिक भी देर नहीं लगाएंगी।
2. विगत 12 वर्षों की अभूतपूर्व सफलताएं और परिवर्तन
पिछले एक दशक से अधिक समय में भारत ने बुनियादी और रणनीतिक सुधारों के क्षेत्र में वे कार्य कर दिखाए हैं, जो दशकों से असंभव माने जाते थे।
(अ) राष्ट्रीय सुरक्षा और उग्रवाद पर निर्णायक प्रहार
- आंतरिक सुरक्षा में क्रांति: पूर्वोत्तर का उग्रवाद हो, वामपंथी उग्रवाद (नक्सलवाद) का दायरा हो या फिर कश्मीर में जारी प्रायोजित आतंकवाद—इन सभी पर कठोर रणनीतिक व सैन्य प्रहार किया गया है।
- सीमापार सख्त रुख: ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ और ‘एयर स्ट्राइक’ के माध्यम से भारत ने अपनी रक्षा नीति में ‘सक्रिय रक्षा’ (Active Defense) के सिद्धांत को लागू किया, जिसने दुश्मनों के मन में डर पैदा किया है।
- रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता: भारत अब केवल हथियारों का सबसे बड़ा आयातकों में से एक नहीं रहा, बल्कि ‘मेक इन इंडिया’ के तहत घरेलू रक्षा उत्पादन और निर्यात में रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज कर रहा है।
(ब) सनातनी पुनर्जागरण और सांस्कृतिक गौरव की पुनर्स्थापना
- सांस्कृतिक पहचान का उदय: दशकों की हीनभावना और औपनिवेशिक मानसिक गुलामी को दरकिनार कर भारत ने अपनी सनातनी परंपराओं, प्रतीकों और ऐतिहासिक नायकों को पुनः सम्मान दिया है।
- सांस्कृतिक केंद्रों का पुनर्निर्माण: श्री राम जन्मभूमि मंदिर का निर्माण, काशी विश्वनाथ धाम का जीर्णोद्धार, उज्जैन का महाकाल लोक और केदारनाथ-बद्रीनाथ धाम का कायाकल्प इस सांस्कृतिक जागरण के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।
- वैश्विक पटल पर सनातन चेतना: अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस से लेकर वैश्विक मंचों पर भारतीय दर्शन, वासुदेव कुटुंबकम और सनातनी मूल्यों को मिली मान्यता ने भारत को एक ‘सांस्कृतिक महाशक्ति’ (Cultural Superpower) के रूप में स्थापित किया है।
(स) आर्थिक सुदृढ़ता और वैश्विक साख में वृद्धि
- अग्रणी अर्थव्यवस्था का सफर: भारत कमजोर और नाजुक अर्थव्यवस्थाओं की सूची से निकलकर दुनिया की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में मजबूती से शामिल हो चुका है।
- ढांचागत विकास (Infrastructure): राजमार्गों, रेलवे के आधुनिकीकरण, डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर (UPI) और बंदरगाहों के निर्माण की गति अभूतपूर्व रही है।
- कूटनीतिक संप्रभुता: वैश्विक मंचों पर भारत अब दबाव में निर्णय नहीं लेता, बल्कि अपने राष्ट्रीय और आर्थिक हितों (जैसे रियायती दरों पर ऊर्जा संसाधन जुटाना) को सर्वोपरि रखकर तटस्थ व कठोर निर्णय लेता है।
3. 70 वर्षों का ऐतिहासिक कचरा और जारी सफाई प्रक्रिया
एक विशाल और विविधतापूर्ण राष्ट्र में 70 वर्षों तक पनपे भ्रष्टाचार, तुष्टिकरण, और प्रशासनिक शिथिलता को रातों-रात खत्म करना संभव नहीं है।
- औपनिवेशिक कानूनों की समाप्ति: ब्रिटिश काल के अप्रासंगिक और दमनकारी कानूनों (जैसे IPC, CrPC) को बदलकर आधुनिक, पारदर्शी और भारतीय संदर्भों के अनुकूल ‘भारतीय न्याय संहिता’ जैसे नियम लागू किए जा रहे हैं।
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP): मैकाले की शिक्षा पद्धति से बाहर निकलकर बच्चों में आलोचनात्मक सोच, भारतीय ज्ञान परंपरा, और मातृभाषा में शिक्षा को बढ़ावा दिया जा रहा है।
- असामाजिक व राष्ट्रविरोधी तत्वों पर नकेल: संगठित अपराध, वित्तीय धोखाधड़ी, और जनसांख्यिकीय असंतुलन पैदा करने वाली अवैध गतिविधियों पर कानूनी और प्रशासनिक शिकंजा लगातार कसा जा रहा है।
- धैर्य की आवश्यकता: इतने बड़े स्तर पर सामाजिक और प्रशासनिक ढाँचे की सफाई के दौरान कुछ असुविधाएँ और अनसुलझे मुद्दे उभरना स्वाभाविक है, जिसके लिए जनता से रणनीतिक धैर्य की अपेक्षा है।
4. ‘डीप स्टेट’ और राष्ट्रविरोधी इकोसिस्टम की चुनौतियां
भारत की इस तीव्र वृद्धि और वैश्विक महाशक्ति बनने की यात्रा से कई आंतरिक व बाहरी ताकतें अत्यधिक असहज हैं।
(अ) आंतरिक इकोसिस्टम का अवरोध
- विकास में बाधाएं: जब-जब कोई दूरगामी और कल्याणकारी नीति लागू की जाती है, तब-तब एक विशेष इकोसिस्टम द्वारा भ्रम, अफवाहें और नागरिक अशांति पैदा करने का सुनियोजित प्रयास किया जाता है।
- सत्ता की छटपटाहट: पिछले 12 वर्षों में लगातार दरकिनार किए गए राजनीतिक और वैचारिक हित समूह किसी भी कीमत पर पुरानी व्यवस्था को वापस लाने के लिए आतुर हैं, चाहे इसके लिए राष्ट्रहितों का बली ही क्यों न देना पड़े।
(ब) विदेशी ताकतें और ‘डीप स्टेट’ की साजिशें
- अस्थिरता का प्रयास: वैश्विक ‘डीप स्टेट’ और भारत विरोधी विदेशी फंडिंग संगठन नहीं चाहते कि दक्षिण एशिया में एक मजबूत, आत्मनिर्भर और सांस्कृतिक रूप से जागरूक भारत नेतृत्व करे।
- नैरेटिव वॉर (Narrative Warfare): मानवाधिकारों, धार्मिक स्वतंत्रता और लोकतंत्र के नाम पर झूठी रिपोर्टें तैयार कर अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत की छवि को धूमिल करने का एक संगठित प्रयास चल रहा है।
- आंतरिक दरारें पैदा करना: जाति, भाषा, क्षेत्र और धर्म के नाम पर भारतीय समाज को आपस में लड़ाकर देश की आर्थिक और रणनीतिक प्रगति की गति को धीमा करना इनका मुख्य एजेंडा है।
5. भावी दिशा
किसी भी राष्ट्र के इतिहास में ऐसे क्षण आते हैं जब नागरिकों को यह चुनना होता है कि वे तात्कालिक शिकायतों के आधार पर निर्णय लेंगे या राष्ट्र के दीर्घकालिक भविष्य और सुरक्षा को देखकर।
- सुधार की मांग और सतर्कता: सरकार से सवाल पूछना, नीतियों में सुधार की मांग करना और कमियों को उजागर करना नागरिक का अधिकार है, लेकिन यह विरोध इस सीमा तक नहीं जाना चाहिए कि देश विरोधी ताकतें उसका फायदा उठा सकें।
- राजनीतिक और सामाजिक संबल: वर्तमान समय एक ऐसे दृढ़ संकल्प का समर्थन करने का है जो भारत को वैश्विक पटल पर एक संप्रभु, सुरक्षित और समृद्ध राष्ट्र के रूप में स्थापित कर रहा है।
- सभ्यतागत जिम्मेदारी: यह समय विभाजनकारी षड्यंत्रों को पहचानने और राष्ट्र निर्माण के इस महायज्ञ में राजनीतिक व सामाजिक रूप से एकजुट रहने का है।
🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳
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