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विज्ञापन-पोषित मीडिया और फर्जी वोट

विज्ञापन-पोषित मीडिया से लेकर फर्जी वोटों के विलाप तक, पूरा इकोसिस्टम हिला हुआ है!

सारांश

  • आज देश में जो तमाशा रचा जा रहा है, वह कोई सामान्य लोकतांत्रिक विरोध नहीं है, बल्कि एक हताश, दिशाहीन और बेनकाब होते राजनीतिक-मीडिया सिंडिकेट की खुली बौखलाहट है।
  • जब जनता का समर्थन हासिल करने के लिए कोई ठोस विकास के मुद्दे नहीं बचते और चुनाव आयोग की पारदर्शी प्रक्रियाओं ने फर्जी, मृत और डुप्लीकेट मतदाताओं की बैसाखी छीन ली है, तो संवैधानिक संस्थाओं की साख पर हमला करना ही एकमात्र विकल्प बच जाता है।
  • यह विस्तृत विश्लेषण उस पूरी पटकथा को बेनकाब करता है, जिसमें विज्ञापनों पर पलने वाले मीडिया संगठन, राजनीतिक नेता, न्यायिक मर्यादा का उल्लंघन करने वाले न्यायाधीश और विदेशी फंड पर जीवित रहने वाले एनजीओ शामिल हैं।
  • तथ्य स्पष्ट रूप से यह स्थापित करते हैं कि 13 करोड़ मतदाताओं के नाम ‘हटाए’ नहीं गए थे, बल्कि उन्हें ड्राफ्ट सूची में संदिग्ध प्रविष्टियों के रूप में चिह्नित किया गया था, और यह मतदाता शुद्धिकरण प्रक्रिया 1952 से कानूनी रूप से चल रही है।

टूलकिट 2.0 का पर्दाफाश

अध्याय 1: ड्रामे की क्रोनोलॉजी और मीडिया की भूमिका

  • मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच एक बड़े टकराव और विद्रोह के संबंध में एक मनगढ़ंत और सनसनीखेज रिपोर्ट ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ अखबार में ‘सूत्रों’ के माध्यम से प्लांट की गई थी।
  • किसी भी बहु-सदस्यीय संवैधानिक आयोग के भीतर प्रशासनिक फाइलों या प्रक्रियाओं पर आंतरिक चर्चा करना और मतभेद होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, लेकिन इसे एक सुनियोजित कथा गढ़ने के लिए ‘विद्रोह’ का विस्फोटक रंग दिया गया। यह अखबार विपक्ष शासित राज्यों के विज्ञापनों के दान पर चल रहा है और इसने 2012 में ‘सैन्य तख्तापलट’ की एक झूठी अफवाह भी फैलाई थी।
  • इस विज्ञापन से पोषित झूठी चिंगारी के आधार पर, राहुल गांधी अपने पूरे दल-बल के साथ निर्वाचन सदन तक मार्च किया और सीने पीटते हुए झूठा दावा किया कि विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया के माध्यम से वोट चुराने के लिए 13 करोड़ मतदाताओं के नाम हटा दिए गए हैं। बिना किसी पूर्व औपचारिक नियुक्ति या अनुमति के भीड़ के साथ उच्च सुरक्षा वाले क्षेत्र में मार्च करना केवल कानून और व्यवस्था को बाधित करने का एक स्टंट था।

अध्याय 2: SIR प्रक्रिया और आंकड़ों का सच

  • मतदाता सूची के शुद्धिकरण के दौरान चुनाव आयोग द्वारा चिह्नित किए गए संदिग्ध नामों का आधिकारिक और वास्तविक डेटा इस प्रकार है:
    • 2.8 करोड़ मृत मतदाता: ऐसे व्यक्ति जिनका निधन हो चुका था, और जिनके नाम नगर निकायों/पंचायतों के मृत्यु रजिस्टरों और बीएलओ के माध्यम से विधिवत सत्यापित किए गए थे।
    • 6.3 करोड़ स्थानांतरित मतदाता: ऐसे व्यक्ति जो रोजगार या विवाह के कारण दशकों पहले अपने मूल गांवों से पलायन कर चुके थे और दो से तीन स्थानों पर पंजीकृत थे।
    • 1.0 करोड़ डुप्लीकेट प्रविष्टियां: डेमोग्राफिक और फोटो-सिमिलर श्रेणियों के तहत आधुनिक सॉफ्टवेयर द्वारा पकड़ी गईं।
    • 3.0 करोड़ अनुपस्थित लोग: ऐसे व्यक्ति जो घर-घर भौतिक सत्यापन के दौरान अपने पते पर पूरी तरह अनुपस्थित पाए गए और नोटिस चस्पा होने के बाद भी सामने नहीं आए।
    • कुल (ड्राफ्ट चरण): 13.1 करोड़ संदिग्ध प्रविष्टियां, जो अंततः हटाई गई संख्या नहीं हैं बल्कि ड्राफ्ट सूची का हिस्सा हैं।
  • यह गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया आज की कोई नई व्यवस्था नहीं है; इसकी शुरुआत 1952 में पंडित जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में हुई थी और यह जनप्रतिनिधि अधिनियम, 1950 के प्रावधानों के तहत पूरी तरह से वैध है। फॉर्म-7 के माध्यम से घर-घर सत्यापन और राजनीतिक दलों के बूथ लेवल एजेंटों को प्रतियां उपलब्ध कराना इसकी उच्च पारदर्शिता को प्रमाणित करता है।

अध्याय 3: गोलपोस्ट बदलना और EVM ड्रामे का अंत

  • जब देश की शीर्ष अदालत ने अप्रैल 2024 में VVPAT सत्यापन से जुड़ी सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया और EVMs की निष्पक्षता तथा विश्वसनीयता पर अपनी अंतिम मुहर लगा दी, तो उनका पुराना ड्रामा समाप्त हो गया और रातों-रात उनके टूलकिट का पन्ना बदलकर ‘वोटर लिस्ट’ पर आ गया।
  • उनका दोहरा मानदंड यह है कि जब वे उन्हीं EVMs और वोटर सूचियों का उपयोग करके कर्नाटक, तेलंगाना या हिमाचल प्रदेश में सरकारें बनाते हैं, तो उन्हें लोकतंत्र पूरी तरह सुरक्षित नजर आता है; लेकिन जहां जनता उन्हें खारिज कर देती है, वहां वे चुनाव आयोग का चेहरा धूमिल करने के लिए दौड़ पड़ते हैं।

अध्याय 4: न्यायिक मर्यादा और विवादित बयान

  • इस पूरी साजिश के दौरान, सुप्रीम कोर्ट के एक वर्तमान न्यायाधीश, न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां ने न्यायिक मर्यादा को पूरी तरह ताक पर रख दिया और हैदराबाद के नाल्सर (NALSAR) विश्वविद्यालय के मंच से इस विचाराधीन राजनीतिक मुद्दे पर विवादित टिप्पणियां कीं।
  • कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि एक वर्तमान न्यायाधीश द्वारा इस प्रकार के बयान देना न्यायिक स्वतंत्रता के स्थापित सिद्धांतों के विपरीत है। विशेष रूप से, उनके पिता असम में कांग्रेस सरकार के दौरान महाधिवक्ता के रूप में कार्य कर चुके थे, और उनकी अपनी नियुक्ति भी पिछली केंद्र सरकार (कांग्रेस) के कार्यकाल के दौरान हुई थी।

अध्याय 5: एनजीओ नेटवर्क और सेवानिवृत्त दरबारी

  • पूर्व गृह सचिव जी.के. पिल्लई और नजीब जंग जैसे पूर्व नौकरशाह भी चुनाव आयोग के बाहर तथाकथित ‘पीपुल्स महाभियोग’ का एक हास्यास्पद नाटक करने में पीछे नहीं रहे।
  • तीस्ता सीतलवाड़ और उनके ‘सबरंग ट्रस्ट’ जैसे संदेहास्पद एनजीओ—जिनका विदेशी अंशदान (नियमन) अधिनियम (FCRA) लाइसेंस विदेशी फंड के गबन और नियमों के उल्लंघन के कारण गृह मंत्रालय द्वारा पहले ही रद्द कर दिया जा चुका है—इस पूरे खेल के पीछे सक्रिय हैं। देश की शीर्ष अदालत ने भी उनकी याचिकाओं पर यह टिप्पणी की थी कि उन्होंने अपने निहित स्वार्थों के लिए कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग किया है।

अध्याय 6: मोदी सरकार 3.0 और निष्कर्ष

  • यह पूरा हंगामा केवल इसलिए खड़ा किया जा रहा है ताकि जनता का ध्यान मोदी सरकार 3.0 के ऐतिहासिक निर्णयों से हटाया जा सके—जैसे आयुष्मान भारत के तहत वरिष्ठ नागरिकों के लिए मुफ्त स्वास्थ्य कवरेज, पीएम आवास योजना, पीएम सूर्य घर योजना, एकीकृत पेंशन योजना और रिकॉर्ड रक्षा निर्यात।
  • चुनाव आयोग की SIR जैसी पारदर्शी प्रक्रियाएं लोकतंत्र को कमजोर नहीं करतीं बल्कि उसे और मजबूत बनाती हैं। आज भारत की जागरूक जनता भावनात्मक कथाओं और मीडिया ट्रायल का शिकार होने के बजाय तथ्यात्मक प्रक्रियाओं और संवैधानिक संस्थाओं पर पूरी तरह भरोसा करती है।

🇮🇳जय भारत, वन्देमातरम🇮🇳

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