सारांश
- भारतीय जनता पार्टी (BJP) की राजनीतिक यात्रा मुख्य रूप से एक सशक्त राष्ट्रवादी विचारधारा, संगठनात्मक अनुशासन और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के संकल्प पर आधारित रही है। समय चक्र के साथ भारत की केंद्र सरकारों के प्रशासनिक दृष्टिकोण में बड़े परिवर्तन आए हैं, लेकिन 2014 के पश्चात देश के विकास मॉडल और रणनीतिक प्राथमिकताओं में एक मौलिक और गुणात्मक बदलाव स्पष्ट रूप से देखा गया है।
- पिछले सात दशकों से लंबित नागरिकों की मूलभूत प्राथमिक आवश्यकताओं को पूरा करने से लेकर आधुनिक विश्वस्तरीय अवसंरचना (Infrastructure) के निर्माण तक, भारत ने एक अभूतपूर्व गति पकड़ी है।
- जहाँ एक ओर दूरदराज के आदिवासी और दुर्गम क्षेत्रों में दशकों से जड़े जमाए सशस्त्र नक्सलवाद और पारंपरिक आतंकवाद पर करारा प्रहार कर उन क्षेत्रों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ा गया है, वहीं दूसरी ओर देश के सामने ‘दिमागी नक्सलवाद‘ (Urban and Ideological Naxalism) और संस्थागत विघटन की एक नई तथा अधिक जटिल चुनौती खड़ी हुई है।
- देश विरोधी तत्व और निहित स्वार्थ समूह, जिनके लिए अपने राजनीतिक और आर्थिक हित देश से ऊपर हैं, भारत को पुनः 2014 से पहले जैसी अस्थिरता, गरीबी, नीतिगत अपंगता और विदेशी हितों की गुलामी की ओर धकेलने के लिए 24×7 काम कर रहे हैं।
- इन ताकतों द्वारा खड़े किए जा रहे भीषण आंतरिक प्रतिरोध और वैश्विक साजिशों के कारण सुधारों और विकास के दूरगामी परिणामों को पूर्ण रूप से धरातल पर दिखने में अपेक्षा से अधिक समय लग रहा है।
- ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर देशप्रेमी नागरिकों और राष्ट्रवादियों के लिए यह अत्यंत आवश्यक हो गया है कि वे उतावलेपन से बचें, अगाध धैर्य रखें और सरकार का राजनीतिक एवं सामाजिक रूप से मजबूती से समर्थन करें। यह विस्तृत आलेख भारत की इस बहुआयामी विकास यात्रा, राष्ट्रवाद के मूल सिद्धांतों और आधुनिक वैचारिक युद्ध (Ideological Warfare) का एक गहन और बिंदुवार विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
देशभक्तों की ऐतिहासिक जिम्मेदारी
1. 2014 के बाद विकास की नई परिपाटी: प्राथमिक आवश्यकताओं से वैश्विक नेतृत्व तक
वर्ष 2014 से पूर्व भारत की एक विशाल आबादी बुनियादी मानवीय सुविधाओं और गरिमापूर्ण जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं के लिए निरंतर संघर्ष कर रही थी। नई प्रशासनिक परिपाटी ने “जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे विकास” के सिद्धांत को धरातल पर उतारा और विकास को देश के अंतिम छोर तक पहुँचाया।
- मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति: देश के करोड़ों निर्धन और वंचित परिवारों को पहली बार शौचालय (स्वच्छ भारत मिशन), पक्के मकान (प्रधानमंत्री आवास योजना), हर घर नल से जल, शत-प्रतिशत बिजली कनेक्टिविटी और नि:शुल्क रसोई गैस (उज्ज्वला योजना) जैसी प्राथमिक सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं।
- मांग और आपूर्ति का अभूतपूर्व संतुलन: घरेलू और वैश्विक स्तर पर मांग एवं पूर्ति के नियम को पूरा करने का बीड़ा उठाया गया। जिन क्षेत्रों में भारत दशकों तक नकारात्मक वृद्धि दर या प्रशासनिक ठहराव से जूझ रहा था, आज वे क्षेत्र 50% से अधिक की सकारात्मक प्लस वृद्धि दर्ज कर रहे हैं।
- विषम परिस्थितियों में आर्थिक वृद्धि: वैश्विक महामारी, आर्थिक मंदी और अंतरराष्ट्रीय संघर्षों जैसी जटिल परिस्थितियों के बावजूद भारत जिस गति से अपनी जीडीपी वृद्धि दर और विनिर्माण (Manufacturing) क्षमता को बनाए हुए है, उसने वैश्विक नीति-निर्माताओं को हतप्रभ कर दिया है।
- सामाजिक कल्याण का नया ढांचा: प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के माध्यम से बिचौलियों की व्यवस्था को समाप्त कर शत-प्रतिशत लाभ सीधे लाभार्थियों तक पहुँचाया गया, जिससे प्रशासनिक भ्रष्टाचार पर ऐतिहासिक लगाम लगी।
2. विकास के हाईवे और शुरुआती बाधाएं: ‘गड्ढों’ से आगे की यात्रा
किसी भी राष्ट्र के व्यापक कायाकल्प और नवनिर्माण की प्रक्रिया में शुरुआती गतिरोध, पुरानी व्यवस्था की खामियाँ या व्यावहारिक समस्याएं आना स्वाभाविक है।
- पुराने गड्ढों का भराव: पिछले सात दशकों की उपेक्षित नीतियों और प्रशासनिक शिथिलता के ‘गड्ढों’ को भरने का काम युद्ध स्तर पर किया गया है। निर्माण की इस विशाल यात्रा के बीच यदि कोई नया प्रशासनिक या तकनीकी गतिरोध सामने आता है, तो वह केवल अस्थायी होता है।
- दूरगामी दृष्टिकोण (Highways of Progress): छोटे-मोटे राजनीतिक या प्रशासनिक गतिरोधों के कारण देश के बड़े दूरगामी लक्ष्यों से ध्यान नहीं भटकाया जा सकता। आज भारत में वर्ल्ड-क्लास एक्सप्रेसवे, बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट्स, अत्याधुनिक पर्वतीय सुरंगें, रेलवे का शत-प्रतिशत विद्युतीकरण और नए एयरपोर्ट्स का एक सशक्त नेटवर्क तैयार हो रहा है।
- अभूतपूर्व इंफ्रास्ट्रक्चर क्रांति: देश के सीमावर्ती क्षेत्रों में सड़कों, पुलों और सामरिक सुरंगों के निर्माण से न केवल आम नागरिकों का जीवन सुगम हुआ है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा बलों की आवाजाही को अभूतपूर्व मजबूती मिली है।
3. सशस्त्र नक्सलवाद पर प्रहार: जंगलों से विकास की मुख्यधारा तक
वर्षों तक देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बने सशस्त्र नक्सलवाद और वामपंथी उग्रवाद के खिलाफ रणनीतिक और कड़े कदम उठाए गए हैं।
- जंगलों से मुख्यधारा में वापसी: रेड कॉरिडोर के गढ़ माने जाने वाले बस्तर, दंतेवाड़ा और गढ़चिरौली जैसे सुदूर इलाकों में सुरक्षा बलों की तैनाती के साथ-साथ विकास की नई धारा बहाई गई। आईईडी धमाकों और हिंसा की जगह अब पक्की सड़कों, स्कूलों, मोबाइल टावरों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों ने ले ली है।
- दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति: सुरक्षा बलों के लक्षित ऑपरेशनों और स्थानीय समुदायों को कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ने के समन्वित मॉडल ने सशस्त्र नेटवर्क को लगभग समाप्त कर दिया है।
- पिछली सरकारों की तुलना: पूर्ववर्ती सरकारों के पास इस समस्या के स्थायी समाधान की न तो स्पष्ट नीति थी और न ही राजनीतिक इच्छाशक्ति, जिसके कारण यह समस्या दशकों तक फैलती रही। वर्तमान मॉडल ने सुरक्षा और विकास को एक साथ लागू करके इस नेटवर्क की कमर तोड़ दी।
4. ‘दिमागी नक्सलवाद’, संस्थागत विघटन और देश विरोधी तत्वों की साजिश
जब बंदूक और हिंसा के बल पर चलने वाला उग्रवाद जंगलों में पराजित हुआ, तो उसने शहरी केंद्रों, शैक्षणिक संस्थानों और बौद्धिक मंचों की ओर रुख किया। इस वैचारिक उग्रवाद को ही ‘दिमागी नक्सलवाद‘ (Urban/Ideological Naxalism) कहा जाता है।
- संसद और सड़कों पर वैचारिक प्रहार: जब भी संसद में देश हित, आर्थिक सुधार या आंतरिक सुरक्षा से जुड़े बड़े और ऐतिहासिक कानून पारित किए जाते हैं, तब संसद से लेकर सड़कों तक नियोजित हंगामे और भ्रामक आख्यानों (Narratives) को गढ़ा जाता है।
- संस्थागत विघटन का प्रयास: अपनी राजनीतिक जमीन खो चुके कुछ समूह और अप्रासंगिक होते राजनीतिक दल अब इस वैचारिक और दिमागी नक्सलवाद का सहारा लेकर देश की प्रशासनिक स्थिरता और विकास की गति को बाधित करने का प्रयास करते हैं।
- निहित विदेशी हितों की गुलामी: ये देश विरोधी तत्व और निहित स्वार्थी वर्ग 24×7 इस प्रयास में लगे रहते हैं कि भारत को पुनः 2014 से पहले वाली स्थिति में धकेल दिया जाए—जहाँ देश गरीब, कमजोर, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दूसरों पर निर्भर और आंतरिक रूप से अस्थिर था। इनके लिए राष्ट्र का विकास, सुरक्षा और समाज का हित पूरी तरह गौण हैं, जबकि अपने संकीर्ण राजनीतिक और आर्थिक हित सर्वोपरि हैं। वे विदेशी ताकतों और निहित स्वार्थों के एजेंडे को पूरा करने के लिए देश की प्रगति में रोड़े अटका रहे हैं।
- सांस्कृतिक प्रतीकों पर विवाद: आजादी के इतने दशकों बाद भी देश के भीतर संविधान की मूल प्रति में अंकित सांस्कृतिक धरोहरों और राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ के प्रति पूर्ण सर्वसम्मति न बन पाना इस बात का प्रमाण है कि वैचारिक गुलामी की जड़ें कितनी गहरी जमाई गई थीं।
5. राष्ट्रवादियों की जिम्मेदारी: राजनीतिक-सामाजिक समर्थन और धैर्य की आवश्यकता
देश विरोधी ताकतों द्वारा खड़े किए जा रहे भीषण प्रतिरोध, अदालती अड़चनों और वैश्विक साजिशों के कारण सुधारों एवं विकास के परिणामों को पूर्ण रूप से धरातल पर दिखने में अपेक्षा से अधिक समय लग रहा है। ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर देशप्रेमी नागरिकों की भूमिका अत्यंत निर्णायक हो जाती है।
- धैर्य और दूरदर्शिता की आवश्यकता: राष्ट्र निर्माण एक जटिल और समय साध्य प्रक्रिया है। जब विरोधी ताकतें चौबीसों घंटे देश को कमजोर करने में जुटी हों, तब देशभक्तों को उतावलेपन या किसी क्षणिक असंतोष के बहकावे में आने के बजाय अगाध धैर्य का परिचय देना होगा।
- दृढ़ राजनीतिक और सामाजिक समर्थन: आज यह बेहद आवश्यक हो गया है कि प्रत्येक देशभक्त नागरिक और राष्ट्रवादी समाज सरकार के साथ मजबूती से खड़ा रहे। चाहे सोशल मीडिया हो, बौद्धिक मंच हों या सामाजिक संवाद—हर स्तर पर देश विरोधी आख्यानों (Anti-National Narratives) का मुंहतोड़ जवाब देना और सरकार की नीतियों का राजनीतिक व सामाजिक रूप से पूर्ण समर्थन करना समय की मांग है।
- वैचारिक सतर्कता: दिमागी नक्सलवाद और भ्रामक दुष्प्रचार के खिलाफ बौद्धिक स्तर पर सजग रहना होगा ताकि समाज में फैलाए जा रहे असंतोष और विभाजनकारी एजेंडे को समय रहते विफल किया जा सके।
6. वैश्विक पहचान और भावी दिशा
भारत का नवनिर्माण केवल भौतिक बुनियादी ढांचे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के सांस्कृतिक स्वाभिमान, आर्थिक स्वावलंबन और बौद्धिक चेतना की पुनर्जागरण यात्रा है।
- नागरिकों की राजनीतिक परिपक्वता: भारत की जागरूक जनता अब वैचारिक रुकावटों, भ्रामक विमर्शों और संकीर्ण राजनीतिक बयानों के पीछे के असली मकसदों को भली-भांति समझने लगी है।
- आत्मनिर्भरता का पथ: देश विरोधी तत्वों के अत्यधिक प्रतिरोध के बावजूद, यदि नागरिक धैर्य और एकजुटता के साथ राष्ट्रहित में खड़े रहते हैं, तो भारत को पुनः निर्धन और परावलंबी बनाने की तमाम कोशिशें नाकाम होंगी।
- विश्वगुरु की ओर अग्रसर: भारत आज सुरक्षा, प्रौद्योगिकी, विश्वस्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर और सांस्कृतिक गौरव के साथ एक आत्मनिर्भर और वैश्विक रूप से मजबूत राष्ट्र के रूप में आगे बढ़ रहा है, जिसे कोई भी आंतरिक या बाह्य साजिश रोक नहीं सकती।
🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳
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