सारांश
- यह विस्तृत विश्लेषण भारतीय राजनीति में गहराई से पैठे इस भ्रम को ध्वस्त करता है कि ‘सवर्ण समाज’ केवल भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का प्रमुख कोर वोटर है।
- साक्ष्यों के साथ यह दिखाया गया है कि कैसे कांग्रेस, सपा, आप, टीएमसी और वामपंथी इकोसिस्टम के ९०% आईटी सेल, डिजिटल इन्फ्लुएंसर और मीडिया हैंडल सवर्णों द्वारा ही संचालित हो रहे हैं।
- यह लेख NEET, UGC और ‘आरक्षण हटाओ’ आंदोलनों के नाम पर सवर्ण युवाओं को भड़काने वाले मौकापरस्त नेताओं, करनी सेना के चुनावी पाखंड और अविमुक्तेश्वरानंद जैसे कांग्रेसी मठाधीशों की साजिशों को उजागर करता है।
- लेख का मुख्य निष्कर्ष यह है कि सामान्य वर्ग के प्रबुद्ध नागरिकों को विपक्षी ‘ठगबंधन’ की कठपुतली बने इन गद्दारों के बहकावे में आने से बचना चाहिए और देश को पाकिस्तान या बांग्लादेश जैसी बदहाली से बचाकर एक वैश्विक महाशक्ति (Global Superpower) बनाने के लिए राष्ट्रवादी नीतियों का मजबूती से समर्थन करना चाहिए।
छद्म आंदोलनों की भ्रामक राजनीति
१. ‘सवर्ण कोर वोटर‘ के मिथक की वास्तविकता
भारतीय राजनीतिक बहसों में एक भ्रामक नैरेटिव लगातार चलाया जाता है कि सवर्ण समाज केवल बीजेपी का एकमुश्त और अंधा ‘कोर वोटर’ है। लेकिन आंकड़ों और जमीनी हकीकत का निष्पक्ष विश्लेषण करने पर यह धारणा पूरी तरह निराधार साबित होती है।
- एकपक्षीय वोटर बैंक का भ्रम: सवर्ण समाज को एक ही राजनीतिक पाले में बंधा हुआ मानना एक ऐसी रणनीति है, जिसका इस्तेमाल सवर्णों को राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक बनाने के लिए किया जाता है।
- विभिन्न दलों में अवसरवाद: हकीकत यह है कि सवर्ण समाज का एक बड़ा वर्ग सभी राजनीतिक दलों में सत्ता और पदों की मलाई खाने के लिए बंटा हुआ है।
- स्थायी निष्ठा का अभाव: किसी एक विचारधारा के प्रति सामूहिक निष्ठा दर्शाने के बजाय सवर्ण नेतृत्व हर दल के मंच पर अपनी अलग राजनीतिक दुकान चला रहा है।
२. विपक्षी आईटी सेल और वामपंथी इकोसिस्टम में सवर्णों का दबदबा
बीजेपी, संघ और सनातन परंपरा के खिलाफ दिन-रात दुष्प्रचार फैलाने वाले डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर की गहराई में जाने पर एक कड़वी सच्चाई सामने आती है।
- विपक्षी आईटी सेल का नेतृत्व: कांग्रेस, आम आदमी पार्टी (AAP), समाजवादी पार्टी (सपा), तृणमूल कांग्रेस (TMC) और आई-पैक (I-PAC) जैसी एजेंसियों के ९०% आईटी प्रमुख, रणनीतिकार और सोशल मीडिया मैनेजर खुद सवर्ण उपनामों वाले लोग हैं।
- डिजिटल मीडिया और फेसबुकी पत्रकार: यूट्यूब और फेसबुक पर राष्ट्रवाद का विरोध करने वाले, बीजेपी को गाली देने वाले और जहरीले नैरेटिव गढ़ने वाले अधिकांश पत्रकार और यूट्यूबर सवर्ण वर्ग से ही आते हैं।
- कमेंट सेक्शन का सच: इन भारत-विरोधी और धर्म-विरोधी पोस्टों के नीचे समर्थन में टिप्पणियां करने वाले और दुष्प्रचार को फैलाने वाले अधिकतर लोग भी सवर्ण पृष्ठभूमि के ही होते हैं।
- लेफ्ट-लिबरल शैक्षणिक संस्थान: जेएनयू (JNU) के ‘डफली गैंग’ से लेकर लुटियंस मीडिया के वामपंथी धड़े में भारत-विरोधी एजेंडा चलाने वाले अग्रणी चेहरे सवर्ण लॉबी के ही हैं।
३. प्रामाणिक कोर वोटर बनाम सवर्णों का वैचारिक बिखराव
राजनीतिक शास्त्र के अनुसार कोर वोटर वह होता है जो अपनी निष्ठा से कभी समझौता नहीं करता और अपनी पार्टी के खिलाफ नैरेटिव नहीं बनाता। इस धरातल पर सवर्ण समाज की तुलना अन्य समूहों से करने पर बड़ा अंतर स्पष्ट होता है।
- यादव समुदाय की अटूट निष्ठा: उत्तर प्रदेश और बिहार का यादव मतदाता सपा और आरजेडी का प्रामाणिक कोर वोटर है। कभी किसी यादव इन्फ्लुएंसर या विश्लेषक को संगठित होकर सपा या आरजेडी के हितों के खिलाफ कैंपेन चलाते नहीं देखा गया।
- मुस्लिम समाज का एकमुश्त रुख: मुस्लिम मतदाता किसी भी स्थिति में बीजेपी के पक्ष में नैरेटिव नहीं बनाता। उसका पूरा ध्यान रणनीतिक वोटिंग के जरिए बीजेपी को हराने वाले प्रत्याशी पर केंद्रित रहता है।
- सवर्ण जातियों का विरोध में खड़ा होना: इसके विपरीत, हरियाणा का जाट समाज और पंजाब का जट्ट सिख समाज सवर्ण और सामान्य वर्ग का हिस्सा होते हुए भी खुलकर बीजेपी और उसकी नीतियों का डटकर विरोध करता है।
- राजनीतिक दिशाहीनता: जब समाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा विपक्षी खेमे की अग्रिम पंक्ति में बैठकर राष्ट्रवाद के खिलाफ माहौल बना रहा हो, तो उस पूरे समाज को बीजेपी की ‘जेब का वोटर’ कहना सरासर बेबुनियाद है।
४. NEET, UGC और आरक्षण विरोधी आंदोलनों के नाम पर विपक्षी षड्यंत्र
आजकल सोशल मीडिया पर सवर्णों और सामान्य वर्ग (General Category) के हितों की रक्षा का ढिंढोरा पीटने वाले कई तथाकथित सवर्ण नेता असल में विरोधी दलों की कठपुतली बनकर काम कर रहे हैं।
- विरोधी ‘ठगबंधन‘ के मोहरे: NEET, UGC दिशा-निर्देशों और ‘आरक्षण हटाओ’ आंदोलनों के नाम पर सवर्ण युवाओं को भड़काने वाले ये शोरबाज़ नेता असल में कांग्रेस और विपक्षी गठबंधन के हाथों बिक चुके हैं।
- युवाओं को गुमराह करने की साजिश: इनका मकसद सवर्ण समाज या छात्रों का भला करना बिल्कुल नहीं है; बल्कि ये केवल मोदी सरकार को घेरने और देश में असंतोष फैलाकर माहौल बिगाड़ने का काम कर रहे हैं।
- सामुदायिक हितों पर चोट: अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और विपक्षी दलों से मिलने वाले प्रोत्साहन के चक्कर में ये तथाकथित नेता सवर्ण समाज को उसी तुष्टिकरणवादी विपक्ष की गोद में धकेल रहे हैं जिसने दशकों तक सामान्य वर्ग के अधिकारों को छीना है।
५. करनी सेना का चुनावी पाखंड और राजनीतिक मठाधीशों की नौटंकी
चुनाव करीब आते ही सवर्णों के हमदर्द बनने वाले संगठनों और राजनीतिक चोला ओढ़े मठाधीशों का एक निश्चित क्रोनोलॉजी पैटर्न रहा है।
- करनी सेना का १२ सालों का तय ढर्रा: पिछले १२ वर्षों से हर चुनाव से ठीक २-३ महीने पहले करनी सेना जैसे संगठन कचरे के ढेर से कोई न कोई फर्जी मुद्दा ढूँढकर बीजेपी का विरोध करने निकल पड़ते हैं।
- इनके नेता मीडिया में आकर रटा-रटाया बयान देते हैं कि “हम तो जी कोर वोटर थे, लेकिन हमारा अपमान हुआ है।”
- इसके बाद एक सभा आयोजित करके कार्यकर्ताओं को कसमें खिलाई जाती हैं कि बीजेपी को वोट नहीं देना है।
- लगातार हर चुनाव में बीजेपी का विरोध करने के बावजूद चुनाव खत्म होते ही फिर से खुद को ‘कोर वोटर’ बताना एक खुला राजनीतिक पाखंड और ब्लैकमेलिंग है।
- इसी नौटंकीबाजी के कारण राजपूत समाज के आम और विचारशील लोगों ने खुद ही इन्हें खारिज करके ‘नौटंकीबाज़’ का टैग दे दिया है।
- कांग्रेसी मठाधीशों का अवसरवाद: बाजार में ‘अविमुक्तेश्वरानंद’ जैसे कुछ राजनीतिक मठाधीश सक्रिय हैं, जिनके गुरुओं का इतिहास जनसंघ के समय से ही कांग्रेस नेताओं की जी-हुज़ूरी करने का रहा है।
- यह मठाधीश आजकल ब्राह्मणों के घर-घर जाकर हाथ में पानी रखवाकर बीजेपी विरोधी वोट देने की कसमें खिलवा रहा है।
- जिस दिन सामान्य हिंदू समाज ने इन राजनीतिक मठाधीशों का बहिष्कार कर दिया, उस दिन इनके ये शंकराचार्य मठ केवल एक छोटे से पंथ या संप्रदाय तक सिमटकर रह जाएंगे।
६. ‘सवर्ण एकता‘ का झुनझुना और जातियों के प्रति आंतरिक नफरत
सवर्ण एकता का राग अलापने वाले स्वघोषित ठेकेदारों के मन में दूसरी सवर्ण जातियों के प्रति गहरा जहर और द्वेष भरा हुआ है, जो अक्सर बाहर आ जाता है।
- वैश्य और कायस्थ समाज का अपमान: सोशल मीडिया पर वैश्य समाज को ‘बनिया’, ‘तेली’, ‘मारवाड़ी’, ‘जैनी’ कहकर नीचा दिखाना और गालियां देना इन तत्वों का रोज का काम बन चुका है। बांकीपुर उपचुनाव जैसे स्थानीय राजनीतिक स्वार्थों के लिए कायस्थ समाज को निशाना बनाकर भयानक दुष्प्रचार किया गया।
- खत्री समाज पर अभद्र टिप्पणियां: हद तो तब हो गई जब कांग्रेस समर्थित कुछ तथाकथित ‘आचार्य’ और लाल टोपी पहनकर खुद को नया ‘पेशवा’ साबित करने वाले विपक्षी नेता उत्तर भारत के खत्री समाज को ‘वर्णसंकर’ और ‘नाजायज औलाद’ तक घोषित करने का दुस्साहस कर रहे हैं।
- नकली मसीहाओं की राजनीतिक कुंठा: बैंक की नौकरी छोड़कर खुद को अविमुक्तेश्वरानंद का शिष्य बताने वाले ये लोग दावा करते हैं कि भारत की आधी से ज्यादा सवर्ण जातियां असली भारतीय ही नहीं हैं। यह दिखाता है कि इन पाखंडियों के दिमाग में अपनी ही बिरादरी की अन्य जातियों के खिलाफ कितनी कुंठा भरी हुई है।
७. चेतावनी : गद्दारों से सावधान, राष्ट्रहित प्रथम
सवर्ण समाज और सामान्य वर्ग के नागरिकों को अब जागने की जरूरत है। NEET, UGC और विभिन्न आंदोलनों के नाम पर सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक भ्रम फैलाने वाले ये सवर्ण नेता सवर्णों के रक्षक नहीं, बल्कि कांग्रेस और ‘ठगबंधन’ के खरीदे हुए मोहरे हैं।
- विरोधी इकोसिस्टम से दूरी: इन गद्दारों का एकमात्र उद्देश्य सवर्ण युवाओं के कंधों पर बंदूक रखकर मोदी सरकार को गिराना और देश में अराजकता फैलाना है।
- विपक्ष का असली चेहरा: कांग्रेस और उसके सहयोगियों का शासन में आने का मतलब देश को उसी गरीबी, लाचारी और अस्थिरता की ओर धकेलना है जैसा आज पाकिस्तान और बांग्लादेश में देखने को मिल रहा है।
- राष्ट्र निर्माण में भूमिका: सवर्ण समाज को इन मौकापरस्त मठाधीशों, भाड़े के संगठनों और फर्जी जातीय नेताओं के बहकावे में आए बिना, देश को एक वैश्विक महाशक्ति (Global Superpower) बनाने वाली राष्ट्रवादी सरकार के साथ मजबूती से खड़ा होना होगा। कोर वोटर का यह गुब्बारा अब पूरी तरह फूट चुका है, और भविष्य केवल राष्ट्रहित की दिशा में ही तय होगा।
🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳
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