सारांश
- यह नैरेटिव व्यंग्यात्मक और विश्लेषणात्मक शैली में उस पुरानी व्यवस्था और राजनीतिक दौर पर प्रहार करता है, जिसे आज कुछ लोग अपनी सुविधा और राजनीतिक स्वार्थ के लिए ‘स्वर्णिम काल’ के रूप में याद करना चाहते हैं।
- बिजली के अभाव, अनियंत्रित घुसपैठ, चरमराती कानून-व्यवस्था, पेपर लीक और भ्रष्टाचार से भरे उस दौर को याद करते हुए यह लेख वर्तमान समय में हुए संरचनात्मक बदलावों की तुलना प्रस्तुत करता है। इसके साथ ही, यह उस खतरनाक ‘एंटी-इंडिया इकोसिस्टम’ को बेनकाब करता है जो भारत की वैश्विक प्रगति से बौखलाकर देश की संप्रभुता और सुरक्षा को खतरे में डालने पर उतारू है।
- यह स्पष्ट करता है कि कैसे तुष्टिकरण और कुप्रबंधन से भरे उन दिनों को वापस लाने की बातें केवल राष्ट्रविरोधी और अवसरवादी ताकतों का एजेंडा मात्र हैं।
राष्ट्रविरोधी षड्यंत्र और वर्तमान का यथार्थ
1. खुला बॉर्डर और तुष्टिकरण की राजनीति: राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रहार
- बिना वीज़ा का भारत: वह दौर जब देश की सीमाएं पूरी तरह छलनी थीं और पड़ोसी देशों से कोई भी बिना किसी रोक-टोक के, सिर्फ तार फांदकर अंदर आ जाता था। इसे ही तथाकथित ‘भाईचारा’ कहकर महिमामंडित किया जाता रहा है।
- वोट-बैंक की राजनीति: दशकों तक सत्ता में रहे दलों ने अपने राजनीतिक स्वार्थ और मुस्लिम वोट-बैंक को मजबूत करने के लिए इन घुसपैठियों को संरक्षण दिया। जनसांख्यिकी संतुलन को बिगाड़ने वाले इन तत्वों को बढ़ावा देना ही उस दौर की सबसे बड़ी ‘रणनीति’ थी।
- राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता: सीमाओं की इस बेकद्री और तुष्टिकरण ने देश की आंतरिक सुरक्षा को जो गहरे घाव दिए, वे आज भी राष्ट्र के लिए एक गंभीर चुनौती बने हुए हैं।
2. ‘लाइट आ गई‘ का रोमांच और गड्ढों में तलाशती सड़कें
- बिजली का संकट: वह समय जब घरों में बिजली का आना किसी त्योहार से कम नहीं होता था और हर कुछ घंटों पर “लाइट आ गई” का शोर गूंजता था। बिजली कटौती आम बात थी, और उद्योग तथा आम नागरिक दोनों इससे त्रस्त थे।
- सड़क और बुनियादी ढांचे का अभाव: सड़कों पर गड्ढे इतने गहरे होते थे कि कभी-कभार उनमें कोई सड़क नजर आती थी। विकास के नाम पर केवल फाइलों का पेट भरा जाता था और धरातल पर सिर्फ लाचारी दिखती थी।
3. ‘ऑनलाइन‘ यानी लाइन में ऑन रहने का झंझट और भ्रष्टाचार
- राशन और गैस की कतारें: तब ‘ऑनलाइन’ का मतलब डिजिटल तकनीक नहीं, बल्कि सरकारी डिपो और गैस एजेंसियों के बाहर धूप और बारिश में लंबी-लंबी लाइनों में खड़े रहना होता था। थोड़ा सा हिले कि नंबर गया।
- भ्रष्टाचार का मकड़जाल: आम आदमी का जीवन केवल बुनियादी जरूरतों को पूरा करने की अंतहीन जद्दोजहद बनकर रह गया था, जहाँ हर छोटे काम के लिए रिश्वत और सिफारिश की आवश्यकता होती थी।
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4. कानून-व्यवस्था और असुरक्षा का साया
- महिला सुरक्षा की बदहाली: शाम ढलते ही महिलाओं के लिए घरों से बाहर निकलना दूभर हो जाता था। आज महिला सशक्तिकरण और सुरक्षा की बात करने वाले भूल जाते हैं कि तब कानून-व्यवस्था अपराधियों और माफियाओं के हाथ की कठपुतली थी।
- आतंक और हिंसा: बम धमाके और हिंसक घटनाएं आम बात थीं, और सरकारें केवल ‘निंदा’ करके अपना पल्ला झाड़ लेती थीं। आम नागरिक की सुरक्षा भगवान भरोसे थी।
5. शिक्षा, रोजगार और व्यवस्था का मज़ाक
- पेपर लीक संस्कृति: परीक्षा के पर्चे लीक होना एक सामान्य प्रक्रिया थी, जिससे मेहनती और मेधावी छात्रों का भविष्य अंधकार में डूब जाता था। भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार ने योग्यता का गला घोंट दिया था।
- बुनियादी ढांचे की कमी: दशकों तक देश के बड़े राज्यों में गिने-चुने उच्च शिक्षण संस्थान हुआ करते थे, और नई संस्थाओं के निर्माण की इच्छाशक्ति पूरी तरह गायब थी।
- ट्रेनें और समय का चक्र: रेलवे स्टेशनों पर ट्रेनों का इंतजार करना एक अनिश्चितकालीन रोमांच था, जहाँ ट्रेन के आने की तारीख तो तय होती थी, पर समय का कोई अता-पता नहीं होता था।
6. एंटी-इंडिया इकोसिस्टम का षड्यंत्र और विदेशी ताकतों से गठजोड़
आज जब भारत मोदी युग में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त कर रहा है और वैश्विक स्तर पर अपनी मजबूत पहचान बना रहा है, तब एक पूरा राष्ट्रविरोधी इकोसिस्टम बेचैन हो उठा है।
- झूठे नैरेटिव और दुष्प्रचार: यह इकोसिस्टम देश और दुनिया के स्तर पर सरकार को बदनाम करने के लिए पुराने झूठे नैरेटिव गढ़ने और आज की वास्तविकताओं को विकृत करने में व्यस्त है।
- पुरानी चालों की विफलता: मोदी युग से पहले ये ताकतें अपनी साजिशों में सफल हो जाती थीं, लेकिन आज इनकी पुरानी गंदी चालें काम नहीं कर रही हैं। इससे इनकी सत्ता की भूख इस हद तक बढ़ गई है कि वे भारत की संप्रभुता और सुरक्षा के खिलाफ हो गए हैं।
- विदेशों और चरमपंथियों से हाथ: अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए इन्होंने विदेशी निहित स्वार्थों, डीप स्टेट के खिलाड़ियों, चरमपंथियों और जिहादियों के साथ हाथ मिला लिया है, जिसका परिणाम देश में अनावश्यक आंदोलनों और प्रदर्शनों के रूप में सामने आ रहा है।
- संसद का अवरोध और अराजकता: जो मुद्दे संसद में संवाद के जरिए सुलझ सकते हैं, उन्हें सड़कों पर हिंसा और संसद को अवरुद्ध करके देश को अस्थिर करने के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। यह देश के दुश्मनों और चरमपंथियों को बढ़ावा देने वाला एक अत्यंत खतरनाक खेल है।
कौन चाहता है ‘वो’ दिन वापस लाना?
- आज जब देश डिजिटलीकरण, मजबूत बुनियादी ढांचे, अंतरिक्ष की ऊंचाइयों और एक आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है, तब कुछ राजनीतिक दल और ‘ठगबंधन’ के लोग अपनी पुरानी कुर्सियों और खोए हुए रुतबे को पाने के लिए देश को उसी गर्त में धकेलना चाहते हैं।
- भारत के नागरिकों को इन राष्ट्रविरोधी ताकतों के कुप्रचार और साजिशों के प्रति अत्यंत सतर्क और जागरूक रहने की आवश्यकता है। यदि हम इन बेईमान और स्वार्थी तत्वों के बहकावे में आ गए, तो हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के विनाश का मार्ग स्वयं प्रशस्त कर देंगे।
- यह देश उन हजारों वर्षों के इतिहास और एक जीवित सभ्यता का प्रमाण है, जिसने मुगलों, अंग्रेजों और आजादी के बाद तुष्टिकरण की राजनीति करने वाली पिछली सरकारों के 800 वर्षों के हमलों को भी झेलते हुए खुद को बचाया है।
- अब समय आ गया है कि हम मूर्धन्य स्वामी विवेकानंद के आह्वान को याद रखें—“उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए”—ताकि भारत को एक महाशक्ति और विश्वगुरु बनाया जा सके। राष्ट्रहित सर्वोपरि है, और हमें अपनी राष्ट्रवादी सरकार का समर्थन कर देश की रक्षा करनी होगी।
- निर्णय स्पष्ट है: अतीत की विफलताओं और अंधकारमय ‘गोल्डन डेज़’ को अब दोहराने की कोई अनुमति नहीं दी जा सकती।
🇮🇳जय भारत, वन्देमातरम🇮🇳
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