सारांश:
- यह विस्तृत आलेख एक तरफ जहाँ 2014 से पूर्व की दिशाहीन, रक्षात्मक विदेश नीति और ढीली घरेलू व्यवस्था की तुलना 2014 के बाद के ‘नए भारत’ की नीतियों से करता है, वहीं दूसरी ओर व्यंग्यात्मक तंज (Satire) के माध्यम से यह उजागर करता है कि देश के भीतर आखिर कौन-कौन से वर्ग मोदी सरकार के कड़े सुधारों से असहज या ‘नाराज’ हैं।
- इसमें डिजिटल प्रहार (जैसे आधार लिंकिंग, ई-टेंडरिंग, बोगस कंपनियों पर बंदी) के जरिए खत्म हुए भ्रष्टाचार और बिचौलियों के नेटवर्क का पूरा ब्योरा प्रस्तुत किया गया है। साथ ही, यह स्पष्ट किया गया है कि कैसे आज वैश्विक मंदी और क्षेत्रीय तनावों के बीच भारत एक मजबूत आर्थिक इंजन, स्वाभिमानी विदेश नीति और संतुलन साधने वाले शांतिदूत के रूप में दुनिया के केंद्र में स्थापित हुआ है।
‘India First’ विदेश नीति: भारत के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता
1. मोदी जी के खिलाफ ‘आक्रोश‘ का असली सच — आखिर कौन–कौन और क्यों नाराज हैं?
पूरे देश में कुछ लोग और विशेष हित समूह मोदी जी के फैसलों के खिलाफ मुखर नजर आते हैं। यदि निष्पक्षता और गहराई से देखा जाए, तो इस नाराजगी की मुख्य वजह दशकों से चली आ रही ढर्रे की व्यवस्था और अवैध तंत्र पर लगाम कसना है:
- 3 लाख से अधिक शैल कंपनियाँ (Shell Companies) बंद: कागजों पर चल रही फर्जी और बोगस कंपनियों पर ताला लगाया गया, जिससे काले धन को सफेद करने वाला अवैध सिंडिकेट ध्वस्त हुआ। परिणामस्वरूप, इनके पर्दे के पीछे बैठे संचालक और लाभार्थी बेहद नाराज हैं।
- 40,000 फर्जी NGOs रद्द: समाज सेवा और विकास के नाम पर मिलने वाली सरकारी ग्रांट और अप्रमाणित विदेशी फंडिंग की धांधली पर सख्त नियम बनाकर रोक लगाई गई, जिससे इनके कर्ताधर्ता दुःखी हैं।
- 1 करोड़ से अधिक फर्जी LPG कनेक्शन खत्म: जो रसोई गैस सिलेंडर ब्लैक मार्केट में अवैध रूप से बेचे जाते थे, वे पारदर्शी डिजिटल ट्रैकिंग और डेटा वेरिफिकेशन से बंद कर दिए गए।
- 1.5 करोड़ फर्जी राशन कार्ड रद्द: जो सरकारी राशन गरीबों के हिस्से का था और बिचौलियों की जेब में जाता था, वह लीकेज अब पूरी तरह रुक चुका है।
- 1.95 लाख फर्जी मदरसा छात्रवृत्तियाँ बंद: कागजों पर दर्ज फर्जी बच्चों के नाम हटाकर करोड़ों रुपये की सरकारी धांधली रोकी गई, जिससे अनुचित लाभ उठाने वाले लोग असहज हैं।
आधार लिंकिंग व पारदर्शी ट्रैकिंग से बड़ा सुधार: विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं में डिजिटल व्यवस्था लागू होने से लाखों फर्जी और बोगस लाभार्थी सिस्टम से बाहर हुए हैं, जिससे असली जरूरतमंदों तक सीधा लाभ (DBT) पहुँच रहा है।
2. व्यवस्था में पारदर्शिता और डिजिटल क्रांति से प्रभावित वर्ग
जब देश में कड़े प्रशासनिक सुधार और तकनीक आधारित जवाबदेही लागू की जाती है, तो पुरानी व्यवस्था से अनुचित लाभ लेने वाले समूहों का प्रभावित होना स्वाभाविक है:
- दलाल और बिचौलिए: सरकारी योजनाओं में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) और ई-टेंडरिंग (E-Tendering) लागू होने से सरकारी ठेकों और वित्तीय आवंटन में कमीशनखोरी का खेल समाप्त हो गया।
- प्रॉपर्टी डीलर और कालाबाजारी करने वाले: बेनामी संपत्ति कानून और डिजिटल लेन-देन में पारदर्शिता आने से नंबर-2 की काली कमाई और अघोषित निवेश पर ब्रेक लगा।
- कर चोरी करने वाले समूह: GST और ऑनलाइन डिजिटल भुगतान व्यवस्था से व्यापारिक रिकॉर्ड पारदर्शी हुआ। देश में लगभग 12 करोड़ नए लोग आयकर और औपचारिक अर्थव्यवस्था के दायरे में आए हैं।
- कामचोर और भ्रष्ट तंत्र: बायोमेट्रिक अटेंडेंस और सख्त वर्क-कल्चर लागू होने से वे अधिकारी और कर्मचारी नाराज हैं जो समय पर कार्यालय नहीं पहुँचते थे या काम अटकाकर अनुचित लाभ लेने के आदी थे।
- रिश्वतखोरी पर निर्भर लोग: जो लोग नियमों का पालन करने के बजाय टेबल के नीचे से पैसे देकर काम करवाने में विश्वास रखते थे, उनके लिए डिजिटल ई-गवर्नेंस के कारण रास्ते बंद हो गए हैं।
- सब्सिडी पर निर्भर लंबे समय के लाभार्थी: जो लोग दशकों से बिना किसी ठोस योगदान के सरकारी संसाधनों और सुविधाओं का अनियंत्रित उपभोग कर रहे थे, वे भी सुधारों से असहज हैं।
3. 2014 से पूर्व की स्थिति — नीतिगत पंगुता और रक्षात्मक कूटनीति
घरेलू मोर्चे पर जहाँ दशकों पुरानी अव्यवस्था को बदला गया, वहीं अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी 2014 के बाद भारत का दृष्टिकोण पूरी तरह बदला है। 2014 से पूर्व की स्थिति का विश्लेषण करें तो:
- कूटनीतिक दूरदर्शिता का अभाव: 2014 से पूर्व भारत की विदेश नीति किसी ठोस दीर्घकालिक रणनीतिक लक्ष्य के बजाय तत्कालीन परिस्थितियों (Conditional Circumstances) और बाहरी दबावों के अधीन संचालित होती प्रतीत होती थी।
- अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ढिलाई: वैश्विक सम्मेलनों में भारत की उपस्थिति कई बार नीतिगत ढिलाई की शिकार हुई। उदाहरण स्वरूप, अंतरराष्ट्रीय मंच पर पूर्व विदेश मंत्री द्वारा गलती से किसी अन्य देश के प्रतिनिधि का भाषण पढ़ देना देश की कूटनीतिक संजीदगी पर सवाल खड़े करता था।
- अमेरिका का दोहरा रवैया: उस दौर में दुनिया अलग-अलग महाशक्तिशाली खेमों में बंटी हुई थी। अमेरिका अपनी भू-राजनीतिक सुविधानुसार कभी भारत के करीब आता था तो कभी पाकिस्तान को वित्तीय व सैन्य सहायता देकर भारत के सुरक्षा हितों को प्रभावित करता था।
- रूस के साथ सीमित गहराई: भारत और रूस के संबंध ऐतिहासिक रूप से मित्रवत थे, लेकिन पश्चिमी दबावों के कारण दोनों देशों के बीच व्यापारिक और तकनीकी सहयोग अपनी पूरी क्षमता तक नहीं पहुँच पाता था।
- चीन का आक्रामक रुख: सीमावर्ती क्षेत्रों में चीन लगातार आक्रामक नीतियाँ अपनाता था और भारत की कूटनीति उसे मुंहतोड़ जवाब देने के बजाय प्रायः विवादों को टालने या शांत करने तक सीमित रहती थी।
4. 2014 के बाद की नीतिगत क्रांति — ‘India First’ और स्वाभिमानी कूटनीति
2014 में हुए सत्ता परिवर्तन के साथ ही “नए भारत” ने अपनी विदेश नीति का पुनर्गठन किया और स्पष्ट संदेश दिया कि भारत अपने फैसले खुद लेगा।
- ‘India First’ और ‘Nation First’ का मूल मंत्र: भारत ने स्पष्ट कर दिया कि वह किसी सुपरपावर या वैश्विक गुट का पिछलग्गू नहीं बनेगा। भारत की विदेश नीति का एक ही आधार तय हुआ—राष्ट्रीय हित, देश की सुरक्षा और नागरिकों का कल्याण।
- रणनीतिक स्वतंत्रता (Strategic Autonomy): भारत ने दुनिया को दिखाया कि वह अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं, रक्षा सौदों या व्यापारिक फैसलों के मामलों में किसी भी अंतरराष्ट्रीय दबाव के सामने नहीं झुकेगा।
- दुर्लभ संसाधनों की सुलभता: जिस ‘रेयर अर्थ मेटल्स’ (Rare Earth Metals) के लिए ऑस्ट्रेलिया कभी भारत को पहुँच देने से हिचकिचाता था, वही ऑस्ट्रेलिया प्रधानमंत्री मोदी के कूटनीतिक प्रयासों के बाद भारत को निर्बाध आपूर्ति के लिए द्विपक्षीय समझौतों (MoUs) पर हस्ताक्षर कर चुका है।
- समुद्री सीमाओं पर शिकंजा: चीन की आक्रामकता को संतुलित करने के लिए भारत ने मलक्का स्ट्रैट (Malacca Strait) और हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में अपनी नौसैनिक उपस्थिति और रणनीतिक चौकियों को अत्यंत मजबूत कर दिया है।
5. वैश्विक मंदी में उभरता महाशक्ति भारत और अभूतपूर्व कूटनीतिक संतुलन
आज जब पूरी दुनिया गंभीर आर्थिक संकट, मंदी, मुद्रास्फीति और युद्ध के दौर से गुजर रही है, तब भारत का निरंतर विकास एक वैश्विक मिसाल बन चुका है।
- विश्व अर्थव्यवस्था का चमकता सितारा: यूरोप से लेकर अमेरिका तक कई प्रमुख अर्थव्यवस्थाएँ जब अनिश्चितता का सामना कर रही हैं, तब भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था के रूप में टिका हुआ है।
- आधे से अधिक वैश्विक आबादी पर प्रभाव: आज भारत की आपूर्ति-श्रृंखला (Supply Chain) और उत्पादन क्षमता इतनी निर्णायक हो चुकी है कि यदि भारत में कोई बड़ा व्यवधान आता है, तो दुनिया की आधी से अधिक आबादी पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ सकता है। खाद्यान्न सुरक्षा से लेकर दवाओं की आपूर्ति तक भारत एक अनिवार्य स्तंभ बन चुका है।
- ग्लोबल पैक्ट्स (Global Pacts) का केंद्र: दुनिया के दर्जनों देश अपनी अर्थव्यवस्थाओं को उबारने और व्यापार बढ़ाने के लिए भारत के साथ रणनीतिक और मुक्त व्यापार समझौते (FTA) कर रहे हैं।
- अभूतपूर्व कूटनीतिक संतुलन: आज अमेरिका, रूस (राष्ट्रपति पुतिन), फ्रांस (राष्ट्रपति मैक्रॉन), इजराइल, ईरान (राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान) और चीन—ये सभी परस्पर विरोधी हित रखने वाली शक्तियाँ भी भारत के साथ रणनीतिक और आर्थिक साझेदारियाँ बनाए रखने के लिए उत्सुक हैं। भारत किसी खेमे का हिस्सा नहीं है, बल्कि हर उस ताकत के लिए दरवाजा खुला रखता है जिससे राष्ट्रहित जुड़ा हो।
6. निष्कर्ष: परिवर्तन की एक नई कहानी
- चाहे देश के भीतर डिजिटल क्रांति से फर्जीवाड़े, दलाली और काले धन पर प्रहार हो या फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्वाभिमानी कूटनीति से भारत का परचम लहराना हो—2014 के बाद एक ‘नए भारत‘ की मजबूत नींव रखी जा चुकी है।
- जब वर्षों पुराने ढर्रे, भ्रष्टाचार और तुष्टीकरण के तंत्र को बदला जाता है, तो उससे अनुचित लाभ उठाने वाले फूफा वर्ग का दुःखी और नाराज होना स्वाभाविक है। ऐसे बदलावों को समझने वाले जब देश के विकास का समर्थन करते हैं, तो उन्हें तरह-तरह के नाम दिए जाते हैं। लेकिन सच यह है कि आज का आत्मनिर्भर भारत अपनी शर्तों पर काम करता है, अपनी रक्षा जरूरतों के लिए ‘Make in India’ को बढ़ावा देता है और अपनी नीतियों से पूरे देश का मस्तक गर्व से ऊँचा करता है।
- यह #NayaBharat की वह रणनीतिक, स्वाभिमानी और पारदर्शी ताकत है, जिसने आज पूरी दुनिया को भारत के दरवाजे पर लाकर खड़ा कर दिया है।
🇮🇳जय भारत, वन्देमातरम 🇮
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