सारांश:
- दिल्ली में आयोजित अंतरराष्ट्रीय मंच पर दुनिया भर के दिग्गजों के बीच अंतरराष्ट्रीय राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण सवाल पर चर्चा हुई—”दुनिया में शांति कैसे आए?”
- भारत ने इस वैश्विक मंच पर बिना किसी हिचकिचाहट के पश्चिमी और वैश्विक कूटनीति के सबसे बड़े दोहरे मापदंडों—’आतंकवाद और कूटनीति के दोहरे मापदंड’—पर करारा प्रहार किया।
- यह विस्तृत आख्यान वैश्विक कूटनीति में ‘ग्लोबल साउथ’ (Global South) की आवाज के रूप में भारत के उभरते स्वदेशी रुख, निष्पक्ष नियमों की मांग और अंतरराष्ट्रीय शब्दकोश को बदलने के उसके ऐतिहासिक प्रयास का व्यंग्यात्मक व रणनीतिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
ग्लोबल मेज पर दिल्ली का संदेश: दोहरे मापदंडों का अंत, एक नया वैश्विक शब्दकोश और भारत की नीति
1. अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का यथार्थ और शांति की परिभाषा
दुनिया भर के देश वर्षों से विभिन्न अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में ‘शांति’ पर विचार करने के लिए जमा होते हैं। कूटनीतिक गलियारों में यह परिपाटी रही है कि बड़े देश शांति पर भाषण देते हैं और रणनीतिक संतुलन बनाए रखने के लिए समय-समय पर युद्ध भी लड़ते रहते हैं।
- सम्मेलन का पृष्ठभूमि परिदृश्य:
- दिल्ली में आयोजित इस सम्मेलन में रूस, चीन, ईरान और दुनिया के विभिन्न महाद्वीपों के प्रतिनिधि उपस्थित थे।
- कई देशों के प्रतिनिधियों का रुख इस बात पर निर्भर था कि भारत से निकटता बढ़ाने पर अमेरिका नाराज होगा या अमेरिका से निकटता बढ़ाने पर भारत।
- शांति और युद्ध का विरोधाभास:
- दुनिया के शक्तिशाली राष्ट्र वर्षों से शांति स्थापना पर विचार-विमर्श कर रहे हैं, लेकिन उनकी विदेश नीतियों में हथियार आपूर्ति और सैन्य हस्तक्षेप प्रमुख साधन बने हुए हैं।
- भारत ने इस ढोंग पर सीधा सवाल उठाते हुए कहा कि जब तक आतंकवाद पर स्पष्ट और एकसमान नीति नहीं बनेगी, तब तक वैश्विक शांति की बात केवल एक कूटनीतिक औपचारिकता बनकर रह जाएगी।
2. आतंकवाद का पासपोर्ट, कूटनीतिक उपयोगिता और भारत का रुख
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में आतंकवाद की पहचान अक्सर उसके द्वारा किए गए विनाश से नहीं, बल्कि उसकी ‘कूटनीतिक उपयोगिता’ (Diplomatic Utility) से तय की जाती रही है।
- सहूलियत भरी परिभाषाएं:
- एक देश का आतंकवादी दूसरे देश के लिए “स्वतंत्रता सेनानी” मान लिया जाता है।
- तीसरे देश के लिए वह “रणनीतिक संपत्ति” (Strategic Asset) और चौथे देश के लिए “क्षेत्रीय प्रतिरोध की आवाज” बन जाता है।
- परंतु जब वही व्यक्ति किसी पश्चिमी या शक्तिशाली देश में हमला करता है, तो अचानक उसका कूटनीतिक दर्जा बदलकर ‘आतंकवादी’ हो जाता है।
- भारत का स्पष्ट और कठोर संदेश:
- भारत ने कहा कि आतंकवाद की पहचान उसके पासपोर्ट, उसकी वेशभूषा या उसकी राजनीतिक पृष्ठभूमि से नहीं, बल्कि उसके काम से होनी चाहिए।
- आतंकवादी चाहे दाढ़ी रखता हो या सूट पहनता हो, किसी प्रतिबंधित संगठन का सदस्य हो या किसी राज्य का अनौपचारिक मेहमान—आतंकवाद केवल आतंकवाद है।
- वैश्विक महाशक्तियों की खामोशी:
- जब भारत ने यह मुद्दा उठाया, तो सम्मेलन कक्ष में गहरा सन्नाटा छा गया। यह सन्नाटा दर्शाता है कि वैश्विक शक्तियां आतंकवाद पर अपने दोहरे रवैये का सामना करने से बचती रही हैं।
3. ‘हमारे आतंकवादी बनाम तुम्हारे आतंकवादी’: दोहरे मानकों पर करारा प्रहार
जब एक पुराने जमाने के अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ ने पूछा कि “क्या यह देखना जरूरी नहीं कि आतंकवाद का इस्तेमाल किसके खिलाफ हुआ है?” तो भारत का जवाब अंतरराष्ट्रीय विदेश नीति के खोखलेपन को उजागर करने वाला था।
- दुश्मनी आधारित निष्कर्ष का पर्दाफाश:
- भारत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई समूह आपके दुश्मन को निशाना बना रहा है और आप चुप हैं, तो आप आतंकवाद के खिलाफ नहीं हैं; आप केवल इस बात के खिलाफ हैं कि वह आपके खिलाफ न हो।
- अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का पुराना शब्दकोश:
- दुनिया लंबे समय से एक ढोंगी शब्दकोश के सहारे जी रही है:
- शक्तिशाली देश का हस्तक्षेप: “रणनीतिक आवश्यकता” (Strategic Necessity)
- विकासशील देश का हस्तक्षेप: “अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन”
- हमारी मिसाइल: “प्रतिरोध और सुरक्षा” (Deterrence)
- तुम्हारी मिसाइल: “आक्रामकता” (Aggression)
- हमारे प्रतिबंध: “राष्ट्रीय सुरक्षा”
- तुम्हारे प्रतिबंध: “आर्थिक दबाव”
- दुनिया लंबे समय से एक ढोंगी शब्दकोश के सहारे जी रही है:
- नियमों की एकसमानता की मांग:
- भारत ने बिना किसी देश के खिलाफ युद्ध की घोषणा किए केवल एक बुनियादी मांग रखी—”नियम सबके लिए एक ही रखिए।”
- यदि दुनिया में एक ही पैमाना लागू हो गया, तो कई देशों की पुरानी और दोहरे मापदंडों पर टिकी विदेश नीतियां पूरी तरह निरर्थक हो जाएंगी।
4. ‘नियम मानने वाला’ नहीं, ‘नियम बनाने वाला’ भारत
एक समय था जब वैश्विक मंचों पर भारत को केवल सलाह दी जाती थी और यह तय किया जाता था कि भारत को किस गुट के साथ खड़ा होना चाहिए।
- रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) का युग:
- आज का भारत अपनी विदेश नीति स्वयं तय करता है। वह रूस, चीन, ईरान, अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ एक साथ संवाद बनाए रखने में सक्षम है।
- भारत अब बिना किसी संकोच के वैश्विक मंचों पर यह स्पष्ट करता है कि उसके सभी अंतरराष्ट्रीय निर्णय ‘राष्ट्र हित’ (Nation First) के आधार पर लिए जाएंगे।
- ग्लोबल साउथ (Global South) की सशक्त आवाज:
- भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि विकासशील और उभरते देश अब केवल पश्चिमी शक्तियों द्वारा बनाए गए नियमों का पालन करने वाले (Rule Takers) नहीं रहेंगे।
- भारत ‘ग्लोबल साउथ’ के प्रतिनिधि के रूप में नियम बनाने (Rule Makers) की प्रक्रिया में बराबरी की हिस्सेदारी की मांग कर रहा है।
- वैश्विक शक्तियों की बेचैनी:
- पुराने नियमों के ठेकेदारों के लिए सबसे परेशान करने वाली बात यह है कि भारत अब केवल अपनी बात रख नहीं रहा है, बल्कि अपनी शर्तें मनवाने की स्थिति में भी आ रहा है।
5. वैश्विक कूटनीति और घरेलू राजनीतिक परिदृश्य का अंतर्संबंध
दिल्ली में आयोजित इस वैश्विक सम्मेलन के साथ-साथ देश के भीतर चल रही राजनीतिक हलचलों और विरोध की राजनीति को भी इस परिदृश्य से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
- वैश्विक हैसियत बनाम आंतरिक राजनीति:
- एक तरफ जहां भारत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दोहरे मापदंडों को चुनौती दे रहा है और वैश्विक मेज पर अपनी धक जमा रहा है, वहीं देश के भीतर कुछ राजनीतिक गुट इन वैश्विक उपलब्धियों की उपेक्षा करने का प्रयास करते हैं।
- बढ़ती ताकत का प्रभाव:
- विरोधी शक्तियों और उनके समर्थकों को सबसे अधिक परेशानी इस बात से होती है कि भारत अलग-अलग और विपरीत हितों वाले देशों को एक साथ एक मेज पर बैठाने में सफल हो रहा है।
- जागरूक नागरिकता की आवश्यकता:
- भारत की अंतरराष्ट्रीय साख को बनाए रखने और देश को ‘विश्वगुरु’ व ‘नियम निर्माता’ के रूप में स्थापित करने के लिए आवश्यक है कि नागरिक समाज वैश्विक राजनीति के पैटर्न को समझे और आंतरिक व बाहरी उपद्रवों के प्रति सतर्क रहे।
🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳
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