सारांश
- 12 और 13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली के प्रतिष्ठित भारत मंडपम में आयोजित हो रहा 18वां ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन केवल एक नियमित द्विवार्षिक अंतरराष्ट्रीय बैठक नहीं है, बल्कि यह तेजी से बदलती वैश्विक बहुध्रुवीय व्यवस्था में भारत की बढ़ती कूटनीतिक छाप, रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) और नेतृत्व क्षमता का ऐतिहासिक प्रदर्शन है।
- 1 जनवरी 2026 को चौथी बार ब्रिक्स की अध्यक्षता संभालने के बाद, भारत ने इस मंच को किसी एक देश या गुट की भू-राजनीतिक प्राथमिकताओं का मोहरा बनने से बचाकर व्यापार, डिजिटल तकनीक, सूक्ष्म-लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME), ऊर्जा सुरक्षा, आपूर्ति श्रृंखला लचीलेपन और ‘ग्लोबल साउथ’ (Global South) के व्यावहारिक एजेंडे से जोड़ा है।
- वर्ष 2026 के दौरान देश के 25 से अधिक प्रमुख शहरों में आयोजित 350 से अधिक उच्चस्तरीय बैठकों के माध्यम से भारत ने दुनिया के सामने यह सिद्ध कर दिया है कि वह पूर्व और पश्चिम, तथा उत्तर और दक्षिण के बीच संतुलन साधने वाली सबसे विश्वसनीय और प्रभावकारी वैश्विक शक्ति है।
- आज पूरा विश्व भारत के सामर्थ्य को नमन कर रहा है। ऐसे में देश के भीतर कुछ राजनीतिक तत्त्वों द्वारा भारत की इस वैश्विक सफलता और प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के दूरदर्शी नेतृत्व का विरोध करना अत्यंत दुखद है, जिसका जवाब देश की जनता समय आने पर अवश्य देगी।
भारत के बढ़ते कूटनीतिक प्रभाव और राष्ट्रीय दृष्टिकोण
1. ब्रिक्स 2026 और भारत का वैचारिक दृष्टिकोण: ‘ह्यूमैनिटी फर्स्ट‘
भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता का आधिकारिक ध्येय वाक्य (Motto) “Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability” (लचीलेपन, नवाचार, सहयोग और निरंतरता के लिए निर्माण) है, जिसे भारत ने अपने सर्वसमावेशी सांस्कृतिक और कूटनीतिक दर्शन “Humanity First” (मानवता प्रथम) के साथ एकीकृत किया है। यह दृष्टिकोण केवल खोखले वादों का समूह नहीं है, बल्कि भारत की विदेश नीति का मूल स्तंभ है।
- व्यावहारिक एवं जन-केंद्रित एजेंडा: भारत ने ब्रिक्स के विमर्श को केवल अमूर्त राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रखने के बजाय इसे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) को मजबूत करने, एमएसएमई सेक्टर को प्रोत्साहन देने, वित्तीय समावेशन और समावेशी डिजिटल बुनियादी ढांचे जैसे जमीनी मुद्दों से मजबूती से जोड़ा है।
- चीन के बहुपक्षीय मॉडल से स्पष्ट भिन्नता: जहाँ चीन जैसे देश ब्रिक्स को एक अमेरिका-विरोधी या पश्चिम-विरोधी (Anti-Western) राजनीतिक धड़े के रूप में विकसित करके अपना दबदबा बनाना चाहते हैं, वहीं भारत इसे एक ‘गैर-पश्चिमी’ (Non-Western) मंच के रूप में देखता है। भारत का मानना है कि इस मंच का उपयोग विकासशील देशों की जायज चिंताओं को उठाने और समाधान खोजने के लिए होना चाहिए, न कि दुनिया को नए ध्रुवों में बांटने के लिए।
- 2026 की विस्तृत तैयारियों का रोडमैप: 1 जनवरी 2026 से अध्यक्षता संभालने के बाद भारत ने देश भर के 25 से अधिक ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक शहरों में 350 से अधिक बैठकों का सफल आयोजन किया। इन आयोजनों के माध्यम से भारत की सांस्कृतिक विविधता, आर्थिक क्षमता और प्रशासनिक कुशलता का बहुपक्षीय प्रदर्शन हुआ।
2. ब्रिक्स का ऐतिहासिक सफर: 4 देशों के विचार से 11 देशों के वैश्विक महाशक्ति केंद्र तक
ब्रिक्स की उत्पत्ति और विकास यह दर्शाता है कि कैसे एक आर्थिक अवधारणा समय के साथ विश्व राजनीति और अर्थशास्त्र का सबसे शक्तिशाली बहुपक्षीय मंच बन गई।
- उत्पत्ति और शुरुआती ढांचा: ‘BRIC’ शब्द पहली बार वर्ष 2001 में ‘गोल्डमैन सेक्स’ के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जिम ओ’नील द्वारा ब्राजील, रूस, भारत और चीन की उभरती आर्थिक क्षमताओं को दर्शाने के लिए गढ़ा गया था। वर्ष 2006 में न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के इतर इन देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक के साथ औपचारिक अंतर-सरकारी सहयोग शुरू हुआ। पहला औपचारिक शिखर सम्मेलन 2009 में रूस के येकातेरिनबर्ग में हुआ।
- दक्षिण अफ्रीका का प्रवेश (2011): वर्ष 2010 के उत्तरार्ध में दक्षिण अफ्रीका को इस समूह में शामिल होने का निमंत्रण दिया गया, और 2011 के सान्या शिखर सम्मेलन में दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने के साथ ही इसका नाम ‘BRIC’ से बदलकर ‘BRICS’ हो गया।
- 2024 का ऐतिहासिक विस्तार और वर्तमान स्वरूप: 2024 में ब्रिक्स का ऐतिहासिक विस्तार हुआ, जिसके तहत मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया इसके पूर्णकालिक सदस्य बने। आज ब्रिक्स 11 शक्तिशाली देशों का समूह है।
- वैश्विक संसाधनों एवं जनसांख्यिकी का महाशक्ति केंद्र: आज का ब्रिक्स दुनिया की लगभग 45% आबादी, वैश्विक जीडीपी के 35% से अधिक हिस्से और दुनिया के कुल कच्चे तेल उत्पादन के लगभग 43% हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। इसमें एशिया, अफ्रीका, पश्चिम एशिया और लैटिन अमेरिका की सबसे मजबूत अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं।
3. बहुध्रुवीय विश्व में रणनीतिक स्वायत्तता और अमेरिका के साथ संतुलन
ब्रिक्स का मंच भारत को किसी गुटबाजी में शामिल हुए बिना अपनी ‘रणनीतिक स्वायत्तता‘ (Strategic Autonomy) को बनाए रखने और पश्चिमी शक्तियों (विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका) के साथ द्विपक्षीय वार्ता में अधिक ‘बार्गेनिंग पावर’ (Bargaining Power) प्रदान करने का एक सशक्त माध्यम है।
- बहुपक्षीय विदेश नीति (Multi-Aligned Foreign Policy): भारत अमेरिका के साथ रणनीतिक, तकनीकी और रक्षा साझेदारी (जैसे QUAD और iCET) को मजबूत रखता है; रूस के साथ अपने पारंपरिक रक्षा और ऊर्जा संबंधों को संजोकर रखता है; चीन के साथ प्रतिस्पर्धा और कूटनीतिक संवाद दोनों का संतुलन साधता है; और खाड़ी देशों के साथ गहरे आर्थिक व ऊर्जा संबंध बनाए रखता है।
- वार्ता की क्षमता में वृद्धि: भारत खुलकर ब्रिक्स को अमेरिका या पश्चिम के खिलाफ इस्तेमाल नहीं करता, लेकिन ब्रिक्स के भीतर जिन वैकल्पिक आर्थिक नेटवर्कों, स्थानीय मुद्रा व्यापार और आपूर्ति श्रृंखलाओं को भारत मजबूत कर रहा है, वे अप्रत्यक्ष रूप से वॉशिंगटन के साथ वार्ता में भारत की स्थिति को बहुत अधिक मजबूत करते हैं। भारत किसी भी एक शक्ति केंद्र पर निर्भर हुए बिना अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार निर्णय लेने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है।
4. भारत की अध्यक्षता में प्रमुख व्यावहारिक उपलब्धियां
2026 में अपनी अध्यक्षता के दौरान भारत ने ब्रिक्स के जरिए कई ठोस, व्यापक और दूरगामी परिणाम हासिल किए हैं, जिसने इस समूह के आर्थिक ढांचे को नया जीवन दिया है:
- जयपुर कॉमर्स मंत्रियों की बैठक (एमएसएमई का सशक्तीकरण): भारत ने ब्रिक्स का आर्थिक लाभ केवल बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MNCs) तक सीमित रखने के बजाय इसे छोटे और मध्यम उद्योगों तक पहुँचाने के लिए ‘एमएसएमई फाइनेंसिंग गाइडिंग प्रिंसिपल्स’ पर सहमति बनाई। इसके तहत ऋण उपलब्धता, व्यापार वित्तपोषण (Trade Finance) के अंतर को कम करने और फिनटेक समाधानों पर विशेष जोर दिया गया।
- डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) और यूपीआई का मॉडल: भारत ने अपने सफल यूपीआई (UPI), आधार और ओपन-सोर्स डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के अनुभवों को ब्रिक्स देशों के साथ साझा किया। अगस्त 2026 में आयोजित ब्रिक्स संचार मंत्रियों की बैठक में डिजिटल परिवर्तन, सूचना-संचार प्रौद्योगिकी और समावेशी डिजिटल सार्वजनिक ढांचे को प्राथमिकता दी गई।
- गुरुग्राम ऊर्जा मंत्रियों की बैठक (ऊर्जा सुरक्षा और क्रिटिकल मिनरल्स): जून 2026 में गुरुग्राम में ऊर्जा सुरक्षा, विविध ऊर्जा स्रोतों, पावर ग्रिड के आधुनिकीकरण, ऊर्जा भंडारण और महत्वपूर्ण खनिजों (Critical Minerals) की आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने पर आम सहमति बनी। रूस, सऊदी अरब, यूएई, ईरान और ब्राजील जैसे बड़े ऊर्जा उत्पादकों का एक मंच पर होना भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- चेन्नई विज्ञान एवं नवाचार सम्मेलन (AI एवं युवा वैज्ञानिक): अगस्त 2026 में चेन्नई में आयोजित वरिष्ठ अधिकारियों की बैठक में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence), उन्नत प्रौद्योगिकियों, विज्ञान एवं तकनीक सहयोग तथा युवा नवोन्मेषकों (Young Innovators) के बीच साझेदारी बढ़ाने का रोडमैप तैयार किया गया।
5. नई दिल्ली शिखर सम्मेलन: वैश्विक कूटनीति का सबसे बड़ा केंद्र
नई दिल्ली का भारत मंडपम एक बार फिर वैश्विक कूटनीति की सबसे जगमगाती धुरी बनने जा रहा है। इस सम्मेलन के समय और पृष्ठभूमि ने इसके कूटनीतिक महत्व को कई गुना बढ़ा दिया है।
- शी जिनपिंग और पुतिन की ऐतिहासिक उपस्थिति: सम्मेलन के ठीक पहले चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा (जो कि पिछले 7 वर्षों में उनकी पहली भारत यात्रा होगी) और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की व्यक्तिगत उपस्थिति भारत की मध्यस्थता और कूटनीतिक प्रतिष्ठा की सफलता को दर्शाती है। यह भारत और चीन के बीच सीमा पर बने तनाव के बाद कूटनीतिक सुधारों की दिशा में भी एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
- G20 से BRICS तक: ‘ग्लोबल साउथ‘ का सबसे भरोसेमंद नेता: वर्ष 2023 में नई दिल्ली में G20 शिखर सम्मेलन की ऐतिहासिक मेजबानी के दौरान अफ्रीकी संघ (African Union) को G20 में स्थायी सदस्यता दिलाकर भारत ने दुनिया को दिखा दिया था कि वह ‘ग्लोबल साउथ’ की सबसे मुखर और जिम्मेदार आवाज है। 2026 के ब्रिक्स सम्मेलन के माध्यम से भारत अपनी इसी नेतृत्वकारी भूमिका को और अधिक सुदृढ़ कर रहा है।
- अभूतपूर्व ‘कन्वेनिंग पावर‘ (Convening Power): 25 से अधिक शहरों में 350 से अधिक बैठकों के निर्बाध और सफल आयोजन ने साबित कर दिया है कि भारत केवल एक विशाल आर्थिक बाजार नहीं है, बल्कि दुनिया की परस्पर विरोधी ताकतों को भी एक मेज पर लाने की अपार क्षमता रखने वाली एक ‘विश्व-मित्र’ और वैश्विक शक्ति है।
6. राजनीतिक परिप्रेक्ष्य: राष्ट्रीय गौरव बनाम विपक्ष की संकीर्ण राजनीति
आज जब नई दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन जैसा ऐतिहासिक और भव्य आयोजन होने जा रहा है और पूरे विश्व की निगाहें भारत के बढ़ते सामर्थ्य पर टिकी हुई हैं, ऐसे गौरवशाली समय में देश के मुख्य विपक्षी दल और उसके नेताओं का रवैया अत्यंत शर्मसार और निराश करने वाला है।
- विपक्ष का नकारात्मक और गैर-जिम्मेदाराना रवैया: जब देश अपनी कूटनीतिक शक्ति, आर्थिक क्षमता और अंतरराष्ट्रीय साख को नई ऊंचाइयों पर ले जा रहा है, तब कांग्रेस के नेताओं द्वारा दिए जा रहे बयान भारत की उपलब्धि को नीचा दिखाने का कुत्सित प्रयास हैं। जब पूरा विश्व भारत के साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ने के लिए लालायित है, तब कांग्रेस के लोग भारत के इस अभूतपूर्व विकास और वैश्विक सम्मान को पचा नहीं पा रहे हैं।
- विदेशी धरती पर देश का अपमान: यह पहली बार नहीं है जब विपक्ष ने ऐसा किया हो। विदेशी जमीन पर जाकर भी राहुल गांधी और कांग्रेस के अन्य नेता लगातार भारत के लोकतंत्र, संवैधानिक संस्थाओं और देश की छवि को अपमानित करते रहे हैं। आज जब देश के भीतर इतना बड़ा अंतरराष्ट्रीय आयोजन हो रहा है, तब भी उनके बयानों से उनकी पीड़ा और निराशा साफ झलक रही है।
- मजबूत नेतृत्व और जनता का अचूक फैसला: मैं कांग्रेस के नेताओं से स्पष्ट रूप से कहना चाहता हूँ कि आपकी इस हताशा और पीड़ा का जवाब देश की जनता सही समय पर देगी। जब-जब देश के विकास, उत्थान और राष्ट्रीय स्वाभिमान की बात आती है, कांग्रेस को हमेशा पीड़ा होती है। लेकिन कांग्रेस अपनी संकीर्ण राजनीति से इस देश की विकास यात्रा को रोक नहीं पाएगी, क्योंकि आज भारत का नेतृत्व श्री नरेन्द्र मोदी जी जैसे मजबूत, दृढ़-संकल्पित और दूरदर्शी नेता के हाथों में है। आने वाले चुनावों में देश की जनता कांग्रेस की इस राष्ट्र-विरोधी मानसिकता को फिर से कड़ा सबक सिखाएगी।
7. बहुध्रुवीय विश्व में भारत का स्वर्णिम भविष्य
- 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन यह निर्विवाद रूप से सिद्ध करता है कि 21वीं सदी का भारत अब केवल अंतरराष्ट्रीय नीतियों का पालन करने वाला दर्शक देश नहीं है, बल्कि वैश्विक एजेंडा तय करने वाला एक समर्थ राष्ट्र है।
- भारत ने पूरी दुनिया को यह दिखा दिया है कि वह एक ही समय में वॉशिंगटन से लेकर मॉस्को, बीजिंग, रियाद और ब्रासीलिया तक समान आत्मविश्वास, बराबरी और सम्मान के साथ संवाद कर सकता है।
- भारत ‘ग्लोबल साउथ’ की जायज मांगों की सबसे मजबूत आवाज भी है और विश्व की प्रमुख आर्थिक शक्तियों का सबसे भरोसेमंद साझेदार भी।
- प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के दूरदर्शी नेतृत्व में भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों, अपनी संप्रभुता और सनातन संस्कृति के गौरव से बिना कोई समझौता किए एक न्यायपूर्ण, संतुलित और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की अगुवाई करने का संकल्प सिद्ध कर दिखाया है।
🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳
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