सारांश
- यह विस्तृत राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषण भारतीय सार्वजनिक विमर्श में पिछले एक दशक से हावी “चयनात्मक आक्रोश” (Selective Outrage) और विरोधी पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) के दोहरे मापदंडों की पड़ताल करता है। यह आलेख हाल ही में दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए हिंसक उपद्रव और झारखंड की राजधानी रांची में JPSC तथा JSSC भर्ती घोटालों के खिलाफ हुए छात्र आंदोलनों की तुलनात्मक समीक्षा करता है।
- विश्लेषण दर्शाता है कि कैसे विरोध पक्ष और उसके समर्थक तंत्र के लिए कोई भी नियम या स्थिति तब तक लोकतांत्रिक और निष्पक्ष होती है जब तक वह उनके राजनीतिक हितों के अनुकूल हो। जैसे ही निर्णय उनके खिलाफ जाता है, वे उसे ‘अलोकतांत्रिक’ करार देने लगते हैं।
- दिल्ली में अराजकता फैलाने वालों के पक्ष में गृह मंत्री का इस्तीफा मांगने वाले नेता, झारखंड में निहत्थे छात्रों पर हुए बर्बर लाठीचार्ज और पेपर लीक घोटालों पर पूरी तरह मौन साधे रहते हैं।
- आलेख यह रेखांकित करता है कि देश की जनता इस राजनीतिक दोहरेपन और दशकों पुरानी ‘लूट और भ्रम’ की राजनीति को भली-भांति समझ चुकी है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में विकास एवं सुशासन का समर्थन करते हुए इस अवसरवादी तंत्र को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए संकल्पबद्ध है।
चयनात्मक आक्रोश के पीछे छिपे दोहरे मापदंड
I. एक दशक का पैटर्न: विरोधी तंत्र का दोहरा मापदंड और चयनात्मक लोकतंत्र
पिछले दस से अधिक वर्षों में देश ने विरोधी राजनीतिक दलों और उनसे जुड़ी इकोसिस्टम का एक स्थायी पैटर्न देखा है। इनके लिए लोकतंत्र और संवैधानिक मर्यादाओं की परिभाषा पूरी तरह से व्यक्तिगत और राजनीतिक सुविधा पर निर्भर करती है।
- सुविधाजनक लोकतंत्र की परिभाषा: यदि कोई प्रशासनिक फैसला, अदालती आदेश या चुनावी परिणाम विरोधी तंत्र के एजेंडे के अनुकूल होता है, तो उसे तत्काल ‘लोकतांत्रिक, निष्पक्ष और न्यायसंगत’ घोषित कर दिया जाता है।
- हितों के खिलाफ जाते ही ‘अलोकतांत्रिक‘ का नारा: इसके ठीक विपरीत, जब भी कोई नियम, फैसला या जनता का जनादेश उनके राजनीतिक हितों के खिलाफ जाता है, तो पूरे तंत्र द्वारा तुरंत ‘लोकतंत्र खतरे में है’ का विक्टिम कार्ड खेला जाने लगता है और संस्थाओं की साख पर सवाल उठाए जाने लगते हैं।
- संस्थागत निष्पक्षता का अपमान: चुनाव आयोग से लेकर न्यायपालिका तक, जब तक फैसले इनके पक्ष में रहें तब तक संस्थाएं महान हैं; जहां फैसला प्रतिकूल हुआ, वहीं से पूरी व्यवस्था को ‘अलोकतांत्रिक’ और ‘पक्षपाती’ बताने का अभियान शुरू हो जाता है।
II. दिल्ली (जंतर-मंतर) का घटनाक्रम: छात्र हित के नाम पर अराजकता और उपद्रव
दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुआ प्रदर्शन वास्तविक छात्र समस्याओं से पूरी तरह भटककर राजनीतिक उपद्रव, व्यक्तिगत घृणा और सुरक्षा बलों पर हमले का माध्यम बन गया था।
- असामाजिक और उग्र तत्वों की घुसपैठ: जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के नाम पर छात्रों के हितों की आड़ लेकर राजनीतिक उपद्रवी और कट्टरपंथी समूहों के समर्थक जमा हो गए। वहां का माहौल किसी नीतिगत सुधार या प्रशासनिक जवाबदेही की मांग का नहीं था।
- संवैधानिक मर्यादाओं और आस्था का अपमान: प्रदर्शन के दौरान देश के शीर्ष संवैधानिक पदों पर बैठे जनप्रतिनिधियों, प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और उनके दिवंगत परिजनों के खिलाफ अत्यंत अभद्र और अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल किया गया। साथ ही भगवान श्री राम, माता सीता और सनातन आस्था के प्रतीकों पर घृणास्पद टिप्पणियां की गईं।
- सुरक्षा बलों पर हमला और संसदीय परिसर में घुसने का प्रयास: देश की रक्षा में तैनात रैपिड Action Force (RAF) और पुलिसकर्मियों का उपहास उड़ाया गया, उन पर भारी पत्थरबाजी की गई। जब उपद्रवियों ने संसद भवन की सुरक्षा तोड़कर जबरन घुसने का प्रयास किया, तब कानून-व्यवस्था कायम करने के लिए प्रशासनिक कार्रवाई पूरी तरह संवैधानिक और अनिवार्य मजबूरी बन गई थी।
III. झारखंड (रांची) का छात्र आंदोलन: शांतिपूर्ण न्याय की मांग पर राज्य का दमन
दिल्ली के विपरीत, झारखंड की राजधानी रांची में हुआ आंदोलन पूरी तरह से वास्तविक, पीड़ित और मेधावी युवाओं की अपनी आजीविका और भविष्य को बचाने की एक अहिंसक लड़ाई थी।
- भ्रष्टाचार और पेपर लीक के खिलाफ आवाज: झारखंड में JPSC और JSSC जैसी राज्य स्तरीय परीक्षाओं में पिछले पांच वर्षों से लगातार हो रही धांधली, पेपर लीक और नौकरियों की कथित ‘सेल’ से त्रस्त होकर हजारों छात्र सड़कों पर उतरे थे।
- पूर्णतः अहिंसक और अनुशासित आचरण: रांची के छात्रों के हाथों में कोई पत्थर या हथियार नहीं थे। उन्होंने न तो किसी नेता के खिलाफ अभद्र भाषा का प्रयोग किया और न ही सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया। वे केवल अपने भविष्य के लिए शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन कर रहे थे।
- एकमात्र स्पष्ट मांग – CBI जांच: छात्रों की कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं थी। उनकी सीधी और स्पष्ट मांग थी कि राज्य में पिछले 5 सालों से नौकरियों के नाम पर चल रहे पूरे खेल और घोटालों की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) से कराई जाए।
- निहत्थे छात्रों पर बर्बर लाठीचार्ज: इसके बावजूद, झारखंड की राज्य सरकार और पुलिस ने इन निर्दोष छात्रों पर निर्दयतापूर्वक पत्थरों और लाठियों से हमला किया, जिसमें 100 से अधिक छात्र गंभीर रूप से घायल हुए। इसके बाद भी दोबारा छात्रों पर पुलिस बल का प्रयोग किया गया।
IV. मौन की राजनीति: हेमंत सोरेन सरकार को राजनीतिक संरक्षण
झारखंड में छात्रों पर हुए इतने बड़े प्रशासनिक अत्याचार के बावजूद, जो लोग दिल्ली में हर बात पर गृह मंत्री का इस्तीफा मांगते हैं, उनकी चुप्पी उनकी नीयत को बेनकाब करती है।
- दो लाइन के बयान की औपचारिकता: दिल्ली में प्रधानमंत्री से माफी की मांग करने वाले नेताओं ने झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से एक सवाल तक नहीं पूछा। जब पत्रकारों ने भारी दबाव बनाया, तो केवल “मैं छात्रों पर बल प्रयोग के खिलाफ हूँ” जैसा दो लाइन का गोल-मोल बयान देकर पल्ला झाड़ लिया गया।
- गठबंधन की मजबूरी और दोहरी नैतिकता: यह रवैया साबित करता है कि तथाकथित ‘उदारवादी’ नेताओं के लिए छात्रों का भविष्य तब तक कोई मायने नहीं रखता, जब तक कि उससे उनका राजनीतिक फायदा न हो। यदि अत्याचार उनके अपने सहयोगी दल की सरकार में हो रहा है, तो वे पूरी तरह आंखें मूँद लेते हैं।
V. जन-जागृति और विरोधी पारिस्थितिकी तंत्र का संपूर्ण निष्कासन
दशकों तक जनता को भ्रमित करके राज करने और देश के संसाधनों को लूटने वाला यह तंत्र अब पूरी तरह से बेनकाब हो चुका है। भारत की जनता इस राजनीतिक चालाकी को समझ चुकी है।
- जनता अब समझदार है: विरोधी तंत्र का यह भ्रम टूट चुका है कि जनता को झूठे नैरेटिव, जातिगत विभाजन और छद्म भाषणों से बार-बार गुमराह किया जा सकता है। आम नागरिक अब भली-भांति जानता है कि कौन सचमुच राष्ट्र निर्माण में लगा है और कौन केवल अपनी जेबें भरने और देश को कमजोर करने की राजनीति कर रहा है।
- मोदी सरकार के प्रति अटूट जन-विश्वास: जनता ने दशकों के इस शोषण, भ्रष्टाचार और सुरक्षा से खिलवाड़ करने वाली राजनीति को खारिज कर दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश के नागरिक पारदर्शी सुशासन, कड़े कानून-व्यवस्था के फैसलों और निरंतर विकास के मॉडल के साथ मजबूती से खड़े हैं।
- परजीवी राजनीति की विदाई: विरोधी दलों के इस दोहरे चरित्र ने जनता को उनसे पूरी तरह विमुख (alienate) कर दिया है। देश की जागरूक जनता अब इस भ्रष्ट, जनविरोधी और दोहरे मापदंडों वाले इकोसिस्टम को भारतीय राजनीति से जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए पूरी तरह कटिबद्ध है।
निष्कर्ष: दोहरे मापदंडों का अंत
- राजनीतिक निष्पक्षता का मूल सिद्धांत यह है कि न्याय और नियम सभी के लिए एक समान होने चाहिए। जब आप दिल्ली में हिंसक उपद्रव करने वालों का बचाव करते हैं और उन्हें ‘लोकतंत्र का रक्षक’ बताते हैं, लेकिन झारखंड में शांतिपूर्वक CBI जांच मांग रहे निर्दोष छात्रों के खून बहने पर मौन साध लेते हैं, तो आपकी नैतिकता पूरी तरह समाप्त हो जाती है।
- देश का युवा और आम नागरिक अब इस वैचारिक दोगलेपन और राजनीतिक व्यापार को पूरी तरह खारिज कर चुका है। झूठे नैरेटिव का दौर अब खत्म हो चुका है; भारत की जनता अब केवल राष्ट्रहित, ठोस विकास और पारदर्शी जवाबदेही के आधार पर अपना निर्णय दे रही है।
🇮🇳जय भारत, वन्देमातरम🇮🇳
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