सारांश:
- यह विस्तृत एवं शोध-परक आलेख राहुल गांधी द्वारा सनातन धर्म, मनुस्मृति और भारतीय संस्कृति पर लगातार किए जाने वाले तीखे प्रहारों के पीछे की तथ्यहीनता और सतही अध्ययन को उजागर करता है।
- विश्व इतिहास, पश्चिमी ईसाइयत, इस्लामी पर्सनल लॉ, पश्चिमी साहित्य और भारतीय इतिहास के अकाट्य साक्ष्यों के आधार पर यह लेख सिद्ध करता है कि महिलाओं के उत्पीड़न या सामाजिक विषमताओं का दोष सनातन धर्म या मनुस्मृति पर मढ़ना पूरी तरह से भ्रामक और प्रायोजित एजेंडा है।
- यह आलेख हिंदू समाज के अनुचित मौन और राजनीतिक संकोच पर सवाल उठाते हुए आह्वान करता है कि वह इतिहास और शास्त्रों के ज्ञान के साथ इन प्रहारों का मुखरता से उत्तर दे।
हिंदू समाज के मौन, वैश्विक इतिहास और सामाजिक सत्यों की निष्पक्ष समीक्षा
प्रस्तावना: राजनीतिक डर, सिलेक्टिव नैरेटिव और हिंदू समाज का मौन
भारतीय राजनीति में पिछले कुछ वर्षों से एक बहुत ही अजीब और चिंताजनक परिपाटी देखने को मिली है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी और उनका रणनीतिक दल लगातार सनातन धर्म, भारतीय शास्त्रों और मनुस्मृति को निशाना बनाकर तीखे बयान जारी करता है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे आश्चर्यजनक पहलू यह है कि हिंदू समाज में एक अजीब सा संकोच, डर या हिचकिचाहट बैठी हुई है, जिसके कारण वह इन बेबुनियाद प्रहारों का तथ्यपरक और तीखा जवाब नहीं दे पाता।
- सिलेक्टिव सेक्युलरिज्म का सच: राहुल गांधी की वैचारिक क्रांति केवल सनातन धर्म की आलोचना तक सीमित रहती है। अन्य मजहबों की अमानवीय कुरीतियों, महिलाओं पर होने वाले जुल्मों और कट्टरपंथी व्यवस्थाओं पर बोलने का साहस न उनमें कभी था, न आज है और न ही भविष्य में कभी होगा।
- अधकचरा और प्रायोजित ज्ञान: राहुल गांधी का इतिहास बोध और भारतीय दर्शन का अध्ययन अत्यंत सतही है। उनका अध्ययन किसी गहन शोध का परिणाम नहीं, बल्कि वामपंथी और ‘अर्बन नक्सल’ सलाहकारों द्वारा 3 मिनट में तैयार करके दी गई पर्चियों पर आधारित है।
- वोट बैंक की मजबूरी: एक वर्ग विशेष के वोटों के तुष्टिकरण के लिए सनातन संस्कृति को कटघरे में खड़ा करना कांग्रेस की एक स्थापित राजनीतिक रणनीति बन चुका है।
1. पश्चिमी इतिहास, ईसाइयत और चर्च में महिलाओं का उत्पीड़न
राहुल गांधी और उनके वामपंथी रणनीतिकार हर सामाजिक कुरीति या महिला उत्पीड़न का दोष मनुस्मृति या सनातन परंपरा पर मढ़ने की चेष्टा करते हैं। परंतु, यदि वे विश्व इतिहास और पश्चिमी समाज का थोड़ा भी निष्पक्ष अध्ययन करते, तो उन्हें ज्ञात होता कि ईसाइयत और यूरोपीय इतिहास में महिलाओं की स्थिति कितनी भयावह रही है:
- नागरिक अधिकारों और मताधिकार के लिए शताब्दियों का संघर्ष: यूरोप के तथाकथित आधुनिक देशों में महिलाओं को मूलभूत अधिकारों के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ा। इटली में महिलाओं को मतदान का अधिकार 1945 में जाकर मिला। क्या इटली की महिलाओं को 1945 तक मताधिकार से वंचित रखने का काम मनुस्मृति ने किया था?
- महिला पादरी (Priest) पर युगों पुरानी रोक: ईसाइयत और चर्च की व्यवस्था में महिलाओं को पादरी या धार्मिक नेतृत्व का अधिकार देने में सदियों का समय लग गया। क्या भारतीय ग्रंथों ने चर्च के नियमों को प्रभावित किया था?
- जॉआन ऑफ आर्क (Joan of Arc) को जिंदा जलाना: राहुल गांधी की दादी पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी जिस फ्रांसीसी वीरांगना जॉआन ऑफ आर्क से अत्यधिक प्रभावित थीं, उस 19 वर्षीय युवती को ब्रिटिश चर्च ने ‘डायन’ (Witch) घोषित करके जिंदा आग में जला दिया था। क्या वह अमानवीय सजा अंग्रेज पादरियों ने मनुस्मृति पढ़कर सुनाई थी?
- जॉर्जिया मेलोनी पर गंदी टिप्पणियां: आज जब इटली में एक महिला जॉर्जिया मेलोनी प्रधानमंत्री बनती हैं, तो उन पर और उनके हाव-भाव पर गंदी और भद्दी टिप्पणियां की जाती हैं। क्या यह आचरण मनुस्मृति सिखाती है या यह पश्चिमी समाज की गहरी पितृसत्तात्मक विकृति का प्रमाण है?
2. इस्लामी कुरीतियां, शाहबानो केस और कांग्रेस का ऐतिहासिक समर्पण
सनातन धर्म पर ज्ञान देने वाले राहुल गांधी को इस्लामी पर्सनल लॉ और उसमें महिलाओं की स्थिति पर बोलते ही सांप सूंघ जाता है। यदि इतिहास के पन्नों को पलटा जाए, तो कांग्रेस का अपना इतिहास कट्टरपंथ के आगे घुटने टेकने का रहा है:
- शाहबानो केस और राजीव गांधी का समर्पण: 1985 में 403 लोकसभा सीटें जीतकर इतिहास रचने वाले तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कट्टरपंथी मौलवियों के दबाव में आकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को संसद में कानून बनाकर पलट दिया। एक असहाय, 62 वर्षीय वृद्ध महिला शाहबानो को उसके गुजारा भत्ता के अधिकार से वंचित कर दिया गया। क्या राजीव गांधी का यह समर्पण मनुस्मृति के कारण था?
- अमानवीय प्रथाओं पर चुप्पी: तीन तलाक, बुर्का, हलाला और चार-चार शादियों जैसी नारकीय व्यवस्थाएं किस ग्रंथ से निकली हैं? आजादी के 70 सालों तक—जिसमें गांधी परिवार के तीन प्रत्यक्ष प्रधानमंत्री और एक मनमोहन सिंह सरकार रही—तीन तलाक जैसी कुप्रथा को खत्म क्यों नहीं किया गया?
- वैश्विक अमानवीयता और हमास की बर्बरता: इजराइल पर हमास के आतंकियों द्वारा किए गए हमले में महिलाओं को बंधक बनाने, बलात्कार करने और उनके साथ क्रूरतम व्यवहार के दृश्य पूरी दुनिया ने देखे। क्या वे बर्बर आतंकी मनुस्मृति के सिद्धांतों पर चल रहे थे?
3. ‘अर्बन नक्सल‘ सलाहकारों की पर्चियां और वीर सावरकर का अपमान
राहुल गांधी की पूरी वैचारिकी माओवादियों और ‘शहरी नक्सलियों’ के स्टॉलों पर 20-20 रुपये में बिकने वाली प्रोपेगैंडा किताबों पर आधारित है। उनके इर्द-गिर्द ऐसे सलाहकारों का घेरा है जो उन्हें केवल विवाद पैदा करने वाली राजनीति सिखाते हैं:
- चाटुकारों की गलत सलाह: आसपास के अधकचरे सलाहकार राहुल गांधी को पर्ची थमा देते हैं कि “कभी मनुस्मृति पर हमला कर दो, तो कभी स्वातंत्र्यवीर सावरकर पर अमर्यादित बयान दे दो—मीडिया में हिट हो जाओगे।”
- वीर सावरकर के योगदान से अनभिज्ञता: सावरकर को अपशब्द कहने वाले राहुल गांधी ने यदि अंदमान की सेल्यूलर जेल की यातनाओं को छोड़ भी दिया हो, लेकिन यदि उन्होंने सावरकर द्वारा लिखित ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ पढ़ा होता, तो वे कभी ऐसे महान राष्ट्रभक्त का अपमान करने का दुस्साहस नहीं करते।
- अज्ञानता के कारण पार्टी की फजीहत: बिना गहराई से अध्ययन किए सिर्फ बयानों के बांस पर चढ़ जाना और अंततः अपनी ही पार्टी को रक्षात्मक स्थिति में ला खड़ा करना राहुल गांधी की शैली बन चुकी है।
4. वेद, उपनिषद और भारतीय दर्शन: नारी चेतना का वास्तविक स्रोत
राहुल गांधी को न तो भारतीय वेदों और उपनिषदों का ज्ञान है और न ही भारत के महान सामाजिक पुनर्जागरण के इतिहास की कोई समझ है। भारत का मूल दर्शन सदैव नारी सम्मान का संवाहक रहा है:
- वैदिक काल की विदुषियों की परंपरा: भारतीय इतिहास गार्गी, मैत्रेयी, विद्योत्तमा, घोषा, अपाला और लोपामुद्रा जैसी महान प्रकांड विदुषियों का इतिहास रहा है, जिन्होंने ऋषि-मुनियों के साथ बड़े-बड़े शास्त्रार्थ किए और ज्ञान के नए आयाम स्थापित किए।
- सामाजिक सुधार आंदोलनों का आधार: स्वामी दयानंद सरस्वती, राजा राममोहन राय, स्वामी विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस, आदिशंकराचार्य और रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा चलाए गए महान सामाजिक सुधार आंदोलनों का आधार यही वेद और उपनिषद थे, जिनमें नारी उत्थान की परम प्रेरणा समाहित है।
5. दुनिया भर में महिलाओं पर हुए दमन का ऐतिहासिक सच
विश्व इतिहास में महिलाओं के दमन और शोषण के जो काले अध्याय दर्ज हैं, उनका सनातन संस्कृति या भारतीय उपमहाद्वीप से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं था:
- इतिहास के क्रूर अध्याय: जर्मनी के हिटलर शासन में गैस चेंबरों में महिलाओं का संहार, ईरान में तानाशाही शासकों द्वारा महिलाओं का दमन, अफ्रीका में औपनिवेशिक दौर की गुलामी, रोम के स्टेडियमों में भूखे शेरों के आगे महिला गुलामों को फेंका जाना, और मुगलों व तुर्कों के हरम की नारकीय जिंदगी—क्या यह सब मनुस्मृति से संचालित था?
- पश्चिमी साहित्यकारों का आक्रोश: एनी ब्रोंटे, जॉर्ज एलियट, एंजेला कार्टर जैसी अंग्रेज लेखिकाओं और इटली की मोदेराता व ताराबोती जैसी महिला साहित्यकारों ने जिस लिंगभेद, हिंसा और पितृसत्ता के खिलाफ अपनी लेखनी चलाई, वह समाज पूरी तरह से पश्चिमी और चर्च-शासित व्यवस्था से प्रभावित था।
निष्कर्ष: राजनीतिक भय त्यागकर सत्य के साथ खड़े होने का समय
- राहुल गांधी द्वारा सनातन धर्म पर बार-बार किया जाने वाला प्रहार किसी तथ्यपरक अध्ययन का परिणाम नहीं, बल्कि वोट बैंक की घटिया राजनीति और भारत की सांस्कृतिक जड़ों को कमजोर करने का एक प्रायोजित प्रयास है।
- हिंदू समाज को अब अपने मन से इस अकारण भय और राजनीतिक झिझक को पूरी तरह निकाल देना होगा।
- जब तक समाज अपने शास्त्रों के वास्तविक ज्ञान, इतिहास के ठोस साक्ष्यों और अकाट्य तथ्यों के साथ खड़ा होकर इन झूठे नैरेटिव्स का मुंहतोड़ जवाब नहीं देगा, तब तक सतही ज्ञान वाले नेता अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए सनातन पर वार करते रहेंगे।
जय हिंद! जय भारत! 🙏
🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳
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