सारांश
- 29 अगस्त को न्यूयॉर्क के मैनहटन स्थित मेडिसन स्क्वायर गार्डन के इंफोसिस थिएटर में आयोजित ‘एक विश्व-एक मानवता उत्सव’ (Universal Oneness Celebration) ने वैश्विक पटल पर भारतीय सनातन दर्शन और सार्वभौमिक कल्याण की भावना को एक ऐतिहासिक आयाम दिया है।
- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष की श्रृंखला में आयोजित इस भव्य कार्यक्रम में 30 देशों के 16 विभिन्न धर्मों के प्रतिनिधियों और 180 से अधिक आध्यात्मिक गुरुओं ने हिस्सा लिया।
- कार्यक्रम के मुख्य वक्ता, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉक्टर मोहन भागवत ने अपने उद्बोधन में वसुधैव कुटुंबकम और ‘विविधता में एकता’ के सिद्धांतों को दुनिया के सामने रखा। सनातन धर्म और हिंदुओं ने सदैव सभी पंथों के शांतिपूर्ण सहअस्तित्व में विश्वास रखा है, परंतु हमारी इस सहिष्णुता का जिहादियों, खिलाफतवादियों, चरमपंथियों और धर्मांतरणकारी ताकतों द्वारा पिछले दो हजार वर्षों से लगातार दुरुपयोग किया गया है।
- हमारी सहनशीलता को हमेशा हमारी कमजोरी समझा गया, जबकि सत्य यह है कि हम आज भी अपने मूल मूल्यों पर अडिग हैं। अब समय आ गया है कि हम केवल मर्यादा और सहिष्णुता आधारित राम राज्य के आदर्श तक सीमित न रहें, बल्कि भगवान कृष्ण की उस नीति को अपनाएं जिसमें नैतिकता के साथ-साथ अधर्म का नाश करने के लिए ‘साम, दाम, दंड, भेद’ और आवश्यकता पड़ने पर ‘छल’ का उपयोग करने का भी विधान है।
- कलियुग में अधर्म का मुकाबला करने के लिए यही एकमात्र मार्ग है। हमारा विरोध किसी मुस्लिम या ईसाई समुदाय से नहीं, बल्कि उनकी धर्मांतरण, जिहाद और आतंकवाद जैसी विध्वंसकारी विचारधाराओं से है। राहत की बात यह है कि 2014 के बाद देश में पहली बार ऐसी सरकार आई है जिसमें सदियों से पूर्ववर्ती शासकों में गायब रही राजनीतिक इच्छाशक्ति और क्षमता दोनों स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं।
सनातन धर्म का विराट दर्शन और जीवन के मूल सिद्धांत
1. मेडिसन स्क्वायर गार्डन में आयोजित ‘एक विश्व-एक मानवता उत्सव’ का विराट स्वरूप
- ऐतिहासिक आयोजन स्थल: न्यूयॉर्क के मैनहटन स्थित प्रतिष्ठित मेडिसन स्क्वायर गार्डन के इंफोसिस थिएटर में 29 अगस्त को आयोजित ‘एक विश्व-एक मानवता उत्सव’ (Universal Oneness Celebration) ने आधुनिक वैश्विक पटल पर एक नया इतिहास रचा है।
- खचाखच भरा सभागार: 5,570 की अधिकतम आसन क्षमता वाला यह विशाल सभागार पूरी तरह खचाखच भरा हुआ था, जिसके बाहर भी अनेक आगंतुक और आमंत्रित लोग अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए खड़े रहे।
- बहु-सांस्कृतिक और वैश्विक प्रतिनिधित्व: इस कार्यक्रम में न केवल भारतीय समुदाय के प्रमुख लोग उपस्थित थे, बल्कि दुनिया भर के 30 देशों के 16 विभिन्न धर्मों के प्रतिनिधि तथा 180 से अधिक आध्यात्मिक व धार्मिक आचार्य भी सम्मिलित हुए थे।
- व्यापक वैश्विक प्रसारण: विश्व के सैकड़ों चैनलों और हजारों सोशल मीडिया खातों के माध्यम से इस ऐतिहासिक कार्यक्रम का लाइव प्रसारण किया गया, जिससे संपूर्ण विश्व की निगाहें इस विराट मंच पर टिकी थीं।
- स्वामी विवेकानंद के शिकागो भाषण की स्मृति: इस आयोजन ने 11 सितंबर 1893 को दिए गए स्वामी विवेकानंद के ऐतिहासिक शिकागो भाषण के उस गौरवशाली और सार्वभौमिक संदेश की जीवंत स्मृति को ताजा कर दिया।
2. डॉक्टर मोहन भागवत का उद्बोधन: भारत का संदेश, मिशन और नियति
- राष्ट्र का आंतरिक उद्देश्य: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉक्टर मोहन भागवत ने अपने मुख्य वक्ता के रूप में उद्बोधन देते हुए कहा कि इस विश्व में प्रत्येक देश का अपना एक विशिष्ट संदेश होता है, एक निश्चित उद्देश्य होता है और एक भागधेय (नियति) होती है।
- विविधता का आदर करने का दायित्व: उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत को यह ऐतिहासिक जिम्मेदारी और दायित्व मिला है कि वह विविधता का आदर करने और ‘विविधता में एकता’ के शाश्वत संदेश को सारे विश्व तक लेकर जाए।
- मानवता की दो श्रेणियां: दुनिया के वैचारिक परिदृश्य को स्पष्ट करते हुए उन्होंने बताया कि विश्व में दो प्रकार के लोग हैं—एक जो “जियो और जीने दो” (Live and let live) के मार्ग पर चलते हैं (देव श्रेणी), और दूसरे वे जो केवल अपनी बात मनवाने वालों को ही जीने का अधिकार देने की संकीर्ण सोच रखते हैं (असुर श्रेणी)।
- विश्व कल्याण ही आत्ममोक्ष: रामकृष्ण मिशन के महान बोधवाक्य ‘आत्मनो मोक्षार्थम् जगत् हिताय च’ की व्याख्या करते हुए उन्होंने विस्तार से बताया कि भौतिक सुख कभी भी स्थायी समाधान नहीं दे सकता; वास्तविक मोक्ष और शांति तभी संभव है जब मनुष्य विश्व कल्याण के मार्ग पर चले और “मैं आप में हूँ और आप मेरे में हैं” (Oneness) के सत्य को आत्मसात करे।
3. वसुधैव कुटुंबकम और हमारी सहिष्णुता का ऐतिहासिक दुरुपयोग
- शाश्वत सहअस्तित्व का भाव: सनातन धर्म और हिंदुओं ने अपने प्राचीन काल से लेकर आज तक सदैव ‘वसुधैव कुटुंबकम’ (संपूर्ण पृथ्वी ही परिवार है) और सभी पंथों व धर्मों के शांतिपूर्ण सहअस्तित्व में अटूट विश्वास रखा है।
- सहिष्णुता का दीर्घकालिक शोषण: दुर्भाग्यवश, हमारी इस उदारता, सहिष्णुता और शांतिप्रियता का जिहादियों, खिलाफतवादियों, चरमपंथियों और धर्मांतरणकारी ताकतों द्वारा पिछले दो हजार वर्षों से लगातार दुरुपयोग और शोषण किया गया है।
- कमजोरी समझने की भयंकर भूल: हमारी सहनशीलता, अहिंसा और शांति की नीति को आक्रामक ताकतों ने हमेशा हमारी कमजोरी समझा, जबकि यह हमारी सांस्कृतिक शक्ति और उच्च नैतिक चरित्र का परिचायक रही है।
- मूल्यों पर अडिगता: इतने शताब्दियों के आघातों, संघर्षों और चुनौतियों के बाद भी सनातन समाज अपने मूल मानवीय, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों पर पूरी तरह कायम है और आज भी वैश्विक शांति में विश्वास रखता है।
4. वैचारिक और रणनीतिक बदलाव: राम मर्यादा से कृष्ण नीति की ओर
- राम राज्य से आगे की आवश्यकता: हमें अपनी वैचारिक और रणनीतिक दिशा में यह महत्वपूर्ण बदलाव करना होगा कि हम केवल मर्यादा, त्याग और सहिष्णुता आधारित राम राज्य के आदर्शों तक ही सीमित न रहें।
- भगवान कृष्ण की नीति का आह्वान: अब समय आ गया है कि हम भगवान कृष्ण की उस प्रखर ‘कृष्ण नीति’ को अपने जीवन और राष्ट्रनीति का हिस्सा बनाएं जिसमें नैतिकता के साथ-साथ अधर्म का नाश करने की पूरी क्षमता हो।
- साम, दाम, दंड, भेद और छल का विधान: कृष्ण नीति स्पष्ट रूप से सिखाती है कि यदि हमारे धर्म, संस्कृति या समाज पर कोई अधर्म, अन्याय या आक्रामकता थोपता है, तो उस अधर्म का विनाश करने के लिए ‘साम, दाम, दंड, भेद’ और आवश्यकता पड़ने पर ‘छल’ का उपयोग करने से भी पीछे नहीं हटना चाहिए।
- कलियुग में अस्तित्व की अनिवार्यता: अधर्म, पाखंड और आक्रामकता से परिपूर्ण इस कलियुग में अपने अस्तित्व, स्वाभिमान और धर्म की रक्षा करने का यही एकमात्र व्यावहारिक, अचूक और सफल मार्ग है।
5. व्यक्तियों से कोई विरोध नहीं, केवल विध्वंसकारी विचारधाराओं से संघर्ष
- समुदायों से किसी प्रकार का द्वेष नहीं: हमारा किसी भी साधारण मुस्लिम, ईसाई या अन्य किसी भी समुदाय के व्यक्तियों से कोई व्यक्तिगत विरोध या सामाजिक द्वेष नहीं है।
- कट्टरपंथी विचारधाराओं का विरोध: हमारा वास्तविक और स्पष्ट संघर्ष उन कट्टरपंथी विचारधाराओं, मानसिकता और कृत्यों के खिलाफ है, जिन्हें धर्मांतरण, जिहाद, आतंकवाद और खिलाफती नीतियों की आड़ में अंजाम दिया जाता है।
- राष्ट्र विरोधी गतिविधियों पर आपत्ति: जब-जब इन कुत्सित एजेंडों और विध्वंसकारी गतिविधियों के माध्यम से समाज की शांति, भाईचारे और राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डाला जाएगा, तब-तब सनातन समाज उसका कड़ा वैचारिक और व्यावहारिक विरोध करेगा।
6. प्रवासी भारतीयों के लिए मार्गदर्शन और वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व
- कर्मभूमि और जन्मभूमि का संतुलन: अमेरिका और अन्य विदेशों में रह रहे भारतीयों को संबोधित करते हुए डॉक्टर भागवत ने कहा कि जिस देश में वे कमाते और बसते हैं, वह उनकी ‘कर्मभूमि’ है जिसके प्रति उन्हें पूरी तरह प्रामाणिक रहना चाहिए, और अपनी जन्मभूमि के मूल मूल्यों को अपनी कर्मभूमि में जीवनंत रखना चाहिए।
- शताब्दियों का राजनीतिक अभाव: सदियों तक भारत पर शासन करने वाले पूर्ववर्ती शासकों और सरकारों में वह दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति, सांस्कृतिक गौरव और निर्णायक क्षमता पूरी तरह गायब थी, जो राष्ट्रहित में कड़े और ऐतिहासिक कदम उठाने के लिए आवश्यक होती है।
- वर्ष 2014 के बाद ऐतिहासिक परिवर्तन: वर्ष 2014 के बाद देश में पहली बार ऐसा सशक्त नेतृत्व और सरकार आई है, जिसके पास राष्ट्रीय सुरक्षा, सांस्कृतिक पुनरुत्थान, आर्थिक सुदृढ़ीकरण और देश की संप्रभुता की रक्षा के लिए आवश्यक राजनीतिक इच्छाशक्ति और क्षमता दोनों प्रचुर मात्रा में मौजूद हैं।
🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳
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