सारांश
- यह विस्तृत आलेख आधुनिक भारतीय राजनीति में राष्ट्रवादी विमर्श, बहुसंख्यक समाज की बदलती प्राथमिकताओं और सवर्ण व हिंदू वर्ग के राजनीतिक व्यवहार का एक गहरा और निर्भीक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
- आलेख यह रेखांकित करता है कि कैसे तात्कालिक असंतोष और वर्ग-विशेष के हितों (जैसे आरक्षण विरोध) के कारण आज वह समाज भी नरेंद्र मोदी के विरोध में खड़ा हो रहा है, जिसके लिए मोदी सरकार ने बीते एक दशक में अभूतपूर्व सांस्कृतिक, रणनीतिक और आर्थिक निर्णय लिए।
- 2024 के लोकसभा चुनावों के झटकों (विशेषकर उत्तर प्रदेश और अयोध्या के नतीजों) की पृष्ठभूमि में यह आलेख चेतावनी देता है कि यदि समाज ने अपनी एकता को खंडित होने दिया, तो आने वाला समय सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत आत्मघाती सिद्ध होगा।
भारत के राजनीतिक भविष्य पर स्वार्थ का बढ़ता प्रभाव
1. कृतघ्नता का नया राजनीतिक अध्याय और स्वार्थ का द्वंद्व
भारतीय राजनीति के इतिहास में एक समय वह था जब नरेंद्र मोदी को सत्ता से बेदखल करने का सपना केवल विपक्षी दल, वामपंथी तंत्र और एक विशेष तुष्टीकरण-संचालित वोट-बैंक देखा करता था। किंतु आज की कड़वी सच्चाई यह है कि देश का एक बड़ा हिंदू और सवर्ण वर्ग भी उसी भाषा का प्रयोग करने लगा है। यह स्थिति किसी नीतिगत मतभेद से अधिक उस सभ्यतागत भूल को दर्शाती है जहाँ तात्कालिक व्यक्तिगत या जातीय स्वार्थ, राष्ट्र के दीर्घकालिक हितों पर हावी होने लगते हैं:
- राष्ट्र और धर्म से विमुखता: आज किसी को इस बात से अंतर नहीं पड़ता कि देश किस दिशा में जा रहा है या आने वाली पीढ़ियों के लिए क्या सुरक्षित छोड़ा जा रहा है। हर वर्ग केवल अपने तात्कालिक लाभ और व्यक्तिगत अधिकारों के चश्मे से सरकार के काम को आंक रहा है।
- क्षणिक लाभ की राजनीति: जब किसी समाज का दृष्टिकोण केवल ‘मुझे क्या मिला’ तक सीमित हो जाता है, तो वह समाज अपने ही सांस्कृतिक व राष्ट्रीय संरक्षकों की बलि चढ़ाने में संकोच नहीं करता।
- राजनीतिक अदूरदर्शिता: इतिहास गवाह है कि जब-जब बहुसंख्यक समाज अपने अस्तित्वगत और सांस्कृतिक मुद्दों को भूलकर सूक्ष्म आंतरिक मतभेदों में उलझा है, तब-तब राष्ट्रीय संप्रभुता को भारी क्षति पहुँची है।
2. एक दशक का अभूतपूर्व कार्य और समाज की उपेक्षा
पिछले एक दशक से अधिक समय में देश ने जिन युगांतरकारी परिवर्तनों को देखा है, उन्हें आज केवल इसलिए खारिज या अनदेखा किया जा रहा है क्योंकि वे कुछ व्यक्तिगत आकांक्षाओं की तात्कालिक तुष्टि नहीं करते। यदि निष्पक्षता से समीक्षा की जाए, तो मोदी सरकार के निर्णय किसी एक वर्ग के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण राष्ट्र की नींव मजबूत करने वाले रहे हैं:
- सभ्यतागत और धार्मिक पुनर्जागरण:
- 500 वर्षों के लंबे संघर्ष और न्यायिक लड़ाई के बाद अयोध्या में भव्य श्री राम जन्मभूमि मंदिर का निर्माण और प्राण-प्रतिष्ठा।
- काशी विश्वनाथ धाम, उज्जैन के महाकाल लोक, और केदारनाथ-बद्रीनाथ का कायाकल्प, जिसने भारत की सांस्कृतिक आत्मा को पुनः स्थापित किया।
- राष्ट्रीय सुरक्षा और संवैधानिक सुधार:
- जम्मू-कश्मीर से धारा 370 और 35A का ऐतिहासिक उन्मूलन, जिससे देश की क्षेत्रीय व संवैधानिक अखंडता पूर्ण रूप से स्थापित हुई।
- सर्जिकल और एअर स्ट्राइक के माध्यम से सीमा पार आतंकवाद को सीधा कड़ा संदेश और देश के भीतर जिहादी नेटवर्क पर नकेल।
- सैन्य सशक्तीकरण और वैश्विक साख:
- ‘मेक इन इंडिया‘ के तहत स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देकर सेना को आधुनिक हथियारों, लड़ाकू विमानों और नौसैनिक पोतों से लैस करना।
- अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत की छवि को एक याचक से बदलकर एक ‘वैश्विक शक्ति’ (Global Power) के रूप में स्थापित करना।
- आर्थिक व सामाजिक समावेशन:
- करोड़ों गरीबों को पक्के मकान, स्वच्छ शौचालय, उज्जवला गैस कनेक्शन और हर घर जल योजना का सीधा लाभ।
- जनधन खातों के माध्यम से देश के हर नागरिक को सीधे बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ना और भ्रष्टाचार पर तकनीक (Direct Benefit Transfer) से करारा प्रहार।
- कोरोना जैसी वैश्विक महामारी के दौरान 140 करोड़ नागरिकों का मुफ्त टीकाकरण और दुनिया का सबसे बड़ा मुफ्त अन्न सुरक्षा कार्यक्रम चलाना।
3. जंतर-मंतर से आरक्षण तक: विरोधाभास और ऐतिहासिक बेरुखी
आज जो विरोधाभास सवर्ण और हिंदू समाज के एक वर्ग में दिखाई दे रहा है, वह राजनीतिक रूप से अत्यंत अदूरदर्शी है:
- आरक्षण का भ्रामक नैरेटिव: आज जो लोग जंतर-मंतर या सोशल मीडिया पर मोदी का विरोध केवल इसलिए कर रहे हैं कि आरक्षण खत्म नहीं किया गया, वे इस ऐतिहासिक तथ्य को भूल रहे हैं कि आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था नरेंद्र मोदी ने लागू नहीं की थी।
- विरोधी ताकतों से हाथ मिलाने का जोखिम: आरक्षण के विरोध में मोदी का विकल्प तलाशने वाला यही सवर्ण समाज आज जाने-अनजाने उस राजनीतिक कुनबे की ओर आकर्षित हो रहा है, जिसका पूरा राजनीतिक दर्शन ही जातिगत जनगणना, आरक्षण की सीमा बढ़ाने और तुष्टीकरण पर आधारित है।
- राजनैतिक गणित का सत्य: यदि कोई यह सोचता है कि सरकार आरक्षण समाप्त कर दे, तो क्या इस बात की कोई गारंटी है कि देश का विशाल दलित और आदिवासी समाज चुप रहेगा? और यदि वह वर्ग विपरीत दिशा में जाता है, तो क्या आज का असंतुष्ट सवर्ण समाज मोदी के पीछे एक चट्टान की तरह खड़ा रहेगा?
4. 2024 के चुनाव परिणाम: एक गंभीर चेतावनी
2024 के लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की सीटें 303 से घटकर 240 होना केवल एक राजनीतिक फेरबदल नहीं है, बल्कि यह हिंदू समाज के भीतर आए बिखराव की ओर संकेत करता है:
- अयोध्या का झटका: जिस अयोध्या नगरी के लिए सदियों तक पीढ़ियों ने बलिदान दिए, उसी अयोध्या संसदीय क्षेत्र में राष्ट्रवादियों की पराजय ने पूरी दुनिया को एक हैरान करने वाला संदेश दिया।
- उत्तर प्रदेश का जनमत: एक तपस्वी, कठोर प्रशासक और हिंदुत्व के प्रखर प्रतीक योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाले राज्य में सीटों का नुकसान यह साबित करता है कि स्थानीय जातीय समीकरण और तात्कालिक असंतोष राष्ट्रीय व सांस्कृतिक चेतना पर भारी पड़ गए।
- आंतरिक फूट का लाभ: जब राष्ट्रवादी शक्तियाँ आपस में बँटती हैं, तब देश-विरोधी और कट्टरपंथी ताकतें संगठित होकर उसका पूर्ण राजनीतिक लाभ उठाती हैं।
5. 76 वर्ष की आयु में राष्ट्र साधना और सामाजिक निष्ठुरता
76 वर्ष की आयु में, बिना एक भी दिन का अवकाश लिए, दिन-रात देश की सेवा में लगे एक जननेता के प्रति समाज का यह रवैया उसकी सांस्कृतिक निष्ठुरता को दर्शाता है:
- आज हर छोटा-बड़ा व्यक्ति, राजनीतिक विश्लेषक और सोशल मीडिया यूजर उन्हें अपशब्द कहता है।
- उनके व्यक्तिगत जीवन, यहाँ तक कि उनकी दिवंगत माँ को लेकर अत्यंत निम्नस्तरीय और आपत्तिजनक टिप्पणियाँ की जाती हैं।
- इसके बावजूद वे सब कुछ सहकर मौन रहते हैं और कठोर निर्णय लेते हैं, क्योंकि उन्हें यह विश्वास रहा है कि इस देश का राष्ट्रवादी और हिंदू समाज उनके साथ खड़ा है।
लेकिन शायद अब यह स्पष्ट हो चुका है कि राजनीति में जब हर वर्ग केवल अपने व्यक्तिगत स्वार्थ को सर्वोपरि रखने लगे, तो नेता का व्यक्तिगत समर्पण भी समाज की सोई हुई चेतना को आसानी से नहीं जगा पाता।
6. भविष्य की चेतावनी: ‘मोदी के बाद का भारत?’
हर दूरदर्शी नागरिक को इस बात पर गहराई से विचार करना चाहिए कि जिस दिन नरेंद्र मोदी सत्ता से बाहर होंगे, उस दिन भारत की राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था किस रूप में होगी:
- जातिगत सुरक्षा का भ्रम: आपकी जाति, आपका सवर्ण होना या आपका हिंदू होना अपने आप में आपकी सुरक्षा की गारंटी नहीं रहेगा।
- तुष्टीकरण का पुनः आगमन: मोदी के बाद सत्ता का संतुलन जिन हाथों में जाने की संभावना है, उनका अतीत यह साबित करता है कि उनकी नीतियाँ पूरी तरह से एकतरफा मजहबी तुष्टीकरण, हिंदू प्रतीकों के दमन और जातीय विभाजन पर आधारित होंगी।
- आंतरिक सुरक्षा पर संकट: तुष्टीकरण की वापसी के साथ ही देश में कट्टरपंथी और राष्ट्र-विरोधी ताकतों को पुनः सिर उठाने का अवसर मिलेगा, जिसका पहला शिकार वही समाज बनेगा जो आज तात्कालिक कारणों से असंतुष्ट है।
- आज का समय अपनी व्यक्तिगत शिकायतों या वर्ग-विशेष के असंतोष को लेकर फैसले लेने का नहीं है।
- इतिहास हमेशा उन समाजों को क्षमा नहीं करता जो सभ्यतागत संकट के समय छोटे-मोटे स्वार्थों के कारण अपने ही रक्षकों को कमजोर कर देते हैं।
- निर्णय केवल आज के असंतोष को देखकर नहीं, बल्कि राष्ट्र की अखंडता, आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा और अपनी सांस्कृतिक अस्मिता को ध्यान में रखकर करना होगा।
🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳
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