सारांश:
- यह विमर्श उत्तर प्रदेश में पूर्ववर्ती समाजवादी पार्टी (सपा) शासनकाल के दौरान कानून-व्यवस्था की स्थिति और समाज के वंचित वर्गों, विशेषकर दलितों एवं अति-पिछड़ों पर हुए कथित अत्याचारों का एक विस्तृत और गंभीर विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
- हाल ही में कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश राजभर द्वारा सोशल मीडिया पर शुरू की गई ‘सपा का आतंकराज’ श्रृंखला के माध्यम से सीतापुर जिले की ऐतिहासिक घटनाओं को सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में लाया गया है।
- 2012 के विधानसभा चुनाव और 2015 के पंचायत चुनाव के नतीजों के ठीक बाद दलित बस्तियों में की गई भीषण आगजनी, जिसमें दो मासूम बच्चों की जिंदा जलने से मौत हो गई थी, यह दर्शाती है कि कैसे चुनावी प्राथमिकताओं के कारण कमजोर वर्गों को संगठित हिंसा का शिकार होना पड़ा।
- यह लेख राजनीतिक बयानबाजी से ऊपर उठकर, लोकतांत्रिक जवाबदेही, प्रशासनिक शिथिलता और कानून के शासन (Rule of Law) के सिद्धांतों के आधार पर अतीत के इन काले अध्यायों का विस्तृत विश्लेषण खंडों और बिंदुओं के माध्यम से प्रस्तुत करता है।
सत्ता का संरक्षण, दलित उत्पीड़न और जवाबदेही की मांग
I. चुनावी प्रतिशोध और सत्ता का उन्माद: 2012 की रेवसा (सीतापुर) घटना
राजनीति में वैचारिक मतभेद और हार-जीत एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, परंतु जब चुनावी नतीजों को व्यक्तिगत या सामुदायिक प्रतिशोध का हथियार बना लिया जाए, तो वह लोकतंत्र के पतन का सूचक बन जाता है।
- जनादेश मिलते ही हिंसा का सूत्रपात: मार्च 2012 के विधानसभा चुनाव में जैसे ही समाजवादी पार्टी को पूर्ण बहुमत का जनादेश मिला, राज्य के कई हिस्सों से राजनीतिक हिंसा की खबरें सामने आने लगीं। मंत्री ओमप्रकाश राजभर का यह आरोप कि “अभी सरकार भी नहीं बनी थी, सिर्फ जीते थे तभी से आतंक शुरू हो गया,” उस प्रशासनिक शून्यता (Administrative Vacuum) को रेखांकित करता है जो चुनाव नतीजों और नई सरकार के गठन के बीच के संक्रमण काल में उत्पन्न होती है।
- रेवसा के बिंबिया गाँव की आगजनी: आरोपों के अनुसार, 8 मार्च 2012 को सीतापुर जिले के रेवसा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले बिंबिया गाँव में दलित समुदाय के 13 घरों को आग के हवाले कर दिया गया। इस वीभत्स कृत्य के पीछे एकमात्र कारण यह बताया गया कि उस बस्ती के नागरिकों ने अपने संवैधानिक अधिकार का प्रयोग करते हुए सत्ताधारी दल के पक्ष में मतदान नहीं किया था।
- कमजोर वर्गों को भयभीत करने की रणनीति: यह घटना केवल एक तात्कालिक झगड़ा नहीं थी, बल्कि नए शासक वर्ग के स्थानीय रसूखदारों द्वारा यह संदेश देने की सोची-समझी कोशिश थी कि सत्ता में उनके आने के बाद कानून की सीमाएं बदल चुकी हैं। दलितों और अति-पिछड़ों की बस्तियों को निशाना बनाकर पूरे क्षेत्र में एक भू-राजनीतिक वर्चस्व स्थापित करने का प्रयास किया गया।
II. 2015 का लहरपुर कांड: सत्ता संरक्षित अपराध और मानवीय संवेदनाओं का अंत
सीतापुर जिले के ही लहरपुर थाना क्षेत्र के अंतर्गत पट्टी देहलिया गाँव में 21 दिसंबर 2015 को घटित हुई घटना उत्तर प्रदेश के कानून-व्यवस्था के इतिहास के सबसे क्रूर और काले अध्यायों में से एक मानी जाती है।
- त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव का प्रतिशोध: ग्रामीण भारत में प्रधानी (पंचायत) का चुनाव अत्यधिक व्यक्तिगत और गुटीय होता है। पट्टी देहलिया गाँव में आरोप है कि दलित समुदाय ने समाजवादी पार्टी समर्थित प्रत्याशी के पक्ष में मतदान नहीं किया। इसी राजनीतिक खुन्नस के कारण चुनाव संपन्न होते ही पूरी दलित बस्ती पर एक संगठित हमला बोला गया।
- 35 घरों का खाक होना और दो मासूमों की मौत: इस हमले में उपद्रवियों ने पूरी दलित बस्ती के लगभग 35 घरों को एक साथ फूंक दिया। इस भीषण आगजनी में दो मासूम दलित बच्चे जिंदा जल गए, जिससे उनकी तड़प-तड़प कर मौत हो गई। यह घटना दर्शाती है कि अपराधियों के भीतर कानून का भय किस कदर समाप्त हो चुका था कि वे निर्दोष बच्चों की जान लेने से भी नहीं हिचकिचाए।
- सार्वजनिक प्रतिनिधियों की प्रत्यक्ष संलिप्तता: राजभर की पोस्ट में लगाए गए आरोपों के अनुसार, तत्कालीन सपाई ग्राम प्रधान स्वयं अपने हाथों से इन घरों में आग लगाने और भीड़ को उकसाने में शामिल था। जब समाज की रक्षा करने और न्याय सुनिश्चित करने का दायित्व उठाने वाले निर्वाचित प्रतिनिधि ही उपद्रवियों के अगुआ बन जाएं, तो आम नागरिक की सुरक्षा पूरी तरह भगवान भरोसे रह जाती है। पीड़ितों के परिवार रोते-गिड़गिड़ाते रहे, परंतु राजनीतिक संरक्षण प्राप्त उन गुंडों का दिल नहीं पसीजा।
III. प्रशासनिक शिथिलता और ‘मौन सहमति’ का मनोवैज्ञानिक प्रभाव
किसी भी राज्य में अपराध का होना जितना चिंताजनक है, उससे कहीं अधिक खतरनाक होता है अपराध होने के बाद शासन तंत्र की निष्क्रियता और अपराधियों को मिलने वाला परोक्ष राजनीतिक संरक्षण।
- सिस्टम की रहस्यमयी चुप्पी: इन घटनाओं के दौरान और उनके बाद भी तत्कालीन प्रशासनिक अमला और पुलिस तंत्र मूकदर्शक बना रहा। जब अपराधियों को यह विश्वास हो जाता है कि सत्ता में बैठे उनके आका पुलिस के हाथ बांध देंगे, तो उनका दुस्साहस सातवें आसमान पर पहुँच जाता है। इसी को राजभर ने “मुगलिया बर्बरता” का नाम दिया है, जहाँ कानून की नहीं, बल्कि लाठी की लाठी और सत्ता की मर्जी चलती थी।
- हाशिए के समाजों में गहराता डर: जब दलितों और अति-पिछड़ों को यह दिखने लगता है कि अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं के कारण उन्हें अपनी जान और संपत्ति से हाथ धोना पड़ सकता है, तो वे लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से विमुख होने लगते हैं। पूर्ववर्ती सरकार में हुई इन घटनाओं ने बहुजन समाज के भीतर एक गहरा मनोवैज्ञानिक भय पैदा कर दिया था, जिससे वे अपने ही गांवों में असुरक्षित महसूस करने लगे थे।
- वोट देने की ‘सजा‘ का सिद्धांत: इस पूरे तंत्र ने एक खतरनाक परिपाटी को जन्म दिया था—”यदि आप हमारे साथ नहीं हैं, तो आप हमारे दुश्मन हैं।” स्वतंत्र भारत में मतदान की स्वतंत्रता को इस प्रकार बंधक बनाना और असहमति की आवाज को जिंदा जलाकर दबा देना, एक तानाशाही सोच का प्रदर्शन था।
IV. अतीत के पन्नों से जवाबदेही की मांग: वर्तमान राजनीति पर प्रभाव
लोकतंत्र में राजनीतिक दलों का मूल्यांकन केवल उनकी वर्तमान घोषणाओं से नहीं, बल्कि उनके पिछले शासनकालों के दौरान किए गए कार्यों और कानून-व्यवस्था के ट्रैक रिकॉर्ड से भी होता है।
- इतिहास का हिसाब-किताब: ओमप्रकाश राजभर द्वारा शुरू की गई ‘सपा का आतंकराज’ श्रृंखला उत्तर प्रदेश के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में एक अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ है। उनका यह बयान कि “तैयार रहिए, एक-एक जिले का बराबर हिसाब लूंगा,” यह स्पष्ट करता है कि अब आगामी चुनावों में केवल विकास के वादों पर बात नहीं होगी, बल्कि अतीत में किए गए सामाजिक अन्यायों पर भी तीखे सवाल पूछे जाएंगे।
- अखिलेश यादव के लिए रणनीतिक चुनौती: समाजवादी पार्टी के वर्तमान नेतृत्व के लिए इन आरोपों का सामना करना एक बड़ी चुनौती है। जब तक वे अपने पिछले शासनकाल के दौरान हुए इन ‘अंधेरे अध्यायों’ और कार्यकर्ताओं की गुंडागर्दी पर एक स्पष्ट और कठोर रुख नहीं अपनाते, तब तक बहुजन समाज और अति-पिछड़े वर्ग का विश्वास पूरी तरह जीत पाना उनके लिए कठिन रहेगा।
- सामाजिक चेतना का पुनरुत्थान: यह अभियान दलितों और अति-पिछड़ों को यह याद दिलाने का काम कर रहा है कि सत्ता के असंतुलन का खामियाजा सबसे पहले और सबसे ज्यादा किसे भुगतना पड़ता है। यह सामाजिक चेतना उन्हें अपने राजनीतिक विकल्पों को चुनते समय अधिक सतर्क और जागरूक बनाएगी।
V. कानून का शासन (Rule of Law) और भावी दिशा
उत्तर प्रदेश ने पिछले कुछ वर्षों में कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर एक बड़ा नीतिगत बदलाव देखा है, जहाँ अपराधियों के खिलाफ ‘जीरो-टॉलरेंस’ की नीति अपनाई जा रही है।
- अपराधियों की राजनीतिक संबद्धता का अंत: वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था में यह संदेश देने का प्रयास किया गया है कि अपराधी का कोई दल, जाति या मजहब नहीं होता। यदि किसी ने अपराध किया है, तो उसके घर पर कानून का डंडा निश्चित रूप से चलेगा, चाहे उसका राजनीतिक रसूख कुछ भी हो।
- पीड़ितों के लिए न्याय और पुनर्वास: कानून का शासन यह मांग करता है कि सीतापुर जैसी घटनाओं के पीड़ितों को न केवल न्याय मिले, बल्कि उन्हें ऐसा सुरक्षात्मक वातावरण भी प्रदान किया जाए जहाँ वे बिना किसी डर के रह सकें। यदि कोई पीड़ित परिवार समाज की मुख्यधारा में वापस आना चाहता है, तो उसे भावनात्मक, नैतिक और कानूनी रूप से पूरा समर्थन मिलना चाहिए।
- भविष्य के लिए सबक: उत्तर प्रदेश की राजनीति का यह काला अध्याय सभी राजनीतिक दलों के लिए एक सबक है कि सत्ता का उपयोग समाज को जोड़ने और कमजोरों को सुरक्षा देने के लिए होना चाहिए, न कि अपने ही नागरिकों पर अत्याचार करने वाले गुंडों को पालने के लिए।
अंतिम संदेश: उत्तर प्रदेश की जनता ने वह दौर देखा है जब बस्तियां सिर्फ इसलिए राख कर दी जाती थीं क्योंकि वहां के निवासियों ने अपनी मर्जी से मतदान किया था। ओमप्रकाश राजभर द्वारा सीतापुर की इन घटनाओं को सामने लाना राजनीति में ऐतिहासिक जवाबदेही की एक नई शुरुआत है। जब तक समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति को अपनी मर्जी से जीने और वोट देने की पूर्ण सुरक्षा नहीं मिलती, तब तक लोकतंत्र अधूरा है। अतीत के इन घावों को याद रखना इसलिए आवश्यक है ताकि भविष्य में कोई भी सत्ताधारी दल फिर से ऐसा दुस्साहस करने की हिम्मत न कर सके।
न्याय की जीत हो, अपराधियों का नाश हो!
🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳
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