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भारत का बढ़ता कद

वैश्विक मंच पर भारत का बढ़ता कद: ‘नई दिल्ली घोषणापत्र’, ब्रिक्स सम्मेलन और कूटनीतिक विजय का संपूर्ण विश्लेषण

सारांश

  • यह आलेख नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन की ऐतिहासिक, रणनीतिक और बहुआयामी सफलता का एक विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
  • युद्ध, वैचारिक ध्रुवीकरण, आर्थिक अनिश्चितताओं और अमेरिकी व पश्चिमी दबाव के इस दौर में भारत ने दुनिया की 45% आबादी, 40% जीडीपी, 36% भू-भाग और 25% वैश्विक व्यापार का प्रतिनिधित्व करने वाले 11 देशों को एक मंच पर लाकर अपनी स्वतंत्र ‘India First’ नीति का लोहा मनवाया है।
  • आलेख में ब्रिक्स के विकास, भू-राजनीतिक संतुलन, भारत-चीन वार्ता, 140 अनुच्छेदों वाले ऐतिहासिक ‘नई दिल्ली घोषणापत्र’ की मुख्य बातों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भारत की सराहना का गहन विवरण है।
  • इसके साथ ही, यह आलेख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा भारतीय शाकाहारी परंपरा व निर्यात संवर्धन के प्रयासों और देश के भीतर विपक्ष द्वारा भोजन के मेन्यू (Non-Veg) पर खड़े किए गए अनर्गल व हताशापूर्ण राजनीतिक विवाद के अंतर को भी स्पष्ट रूप से रेखांकित करता है।

वैश्विक मंच पर भारत का बढ़ता कद

१. ब्रिक्स (BRICS) की ऐतिहासिक यात्रा और बदलती वैश्विक शक्ति संतुलन

ब्रिक्स का विचार मूलतः एक आर्थिक पूर्वानुमान से शुरू होकर आज विश्व का सबसे प्रभावशाली बहुपक्षीय संगठन बन चुका है।

  • इतिहास और विकास क्रम: 2001 में गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्री जिम ओ’नील ने चार उभरती अर्थव्यवस्थाओं—ब्राजील, रूस, भारत और चीन—के पहले अक्षरों को मिलाकर ‘BRIC’ शब्द गढ़ा था। 2009 में यह एक औपचारिक राजनीतिक समूह बना और 2011 में दक्षिण अफ्रीका के जुड़ने से यह ‘BRICS’ बन गया।
  • ऐतिहासिक विस्तार (BRICS+): 2024 और 2025 में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, यूएई और इंडोनेशिया के पूर्ण सदस्य बनने से इस समूह का अभूतपूर्व विस्तार हुआ। इसके साथ ही, सऊदी अरब और मलेशिया जैसे प्रमुख इस्लामिक व तेल-उत्पादक देश भी इस मंच से मजबूती से जुड़े।
  • पश्चिम के प्रभुत्व को चुनौती: ब्रिक्स सम्मेलन ने यह साबित कर दिया है कि दुनिया अब केवल ‘G7’ या पश्चिमी देशों के निर्देशों पर नहीं चलेगी। ‘ग्लोबल साउथ’ (Global South) की आवाज के रूप में भारत ने इस संगठन का ऐसा नेतृत्व किया है, जिससे पश्चिमी मीडिया और वैश्विक थिंक-टैंक अचरज में हैं।

२. भारत का अभूतपूर्व भू-राजनीतिक संतुलन (Diplomacy Pro Max)

आज जब दुनिया स्पष्ट रूप से दो या तीन गुटों (Camps) में बंट रही है, तब भारत ने किसी भी खेमे का पिछलग्गू बनने के बजाय स्वतंत्र और संप्रभु कूटनीति की नई मिसाल कायम की है।

  • विभिन्न खेमों के साथ समानांतर संबंध: भारत एक तरफ QUAD और अमेरिका के साथ रणनीतिक व रक्षा साझेदारी मजबूत रख रहा है, वहीं दूसरी ओर रूस से पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद सस्ता कच्चा तेल और रक्षा तंत्र खरीद रहा है।
  • पश्चिम एशिया और चीन के साथ संतुलन: भारत ने ईरान में चाबहार बंदरगाह के निर्माण को गति दी, इजराइल के साथ रक्षा सहयोग बनाए रखा, और साथ ही चीन व रूस के नेतृत्व वाले SCO तथा ब्रिक्स में अपनी केंद्रीय भूमिका निभाई।
  • एक ही मंच पर परस्पर विरोधी शक्तियां: अमेरिका के कड़े निर्देशों—”Choose a Side”—को नकारते हुए भारत ने अपनी शर्त पर कूटनीति की। यही कारण रहा कि नई दिल्ली में ईरान के राष्ट्रपति, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग, यूएई के क्राउन प्रिंस, सऊदी अरब के विदेश मंत्री और संयुक्त राष्ट्र महासचिव (UN Secretary-General) एक साथ एक ही टेबल पर नजर आए।

३. भारत-चीन वार्ता और द्विपक्षीय उपलब्धियां

ब्रिक्स सम्मेलन का सबसे बड़ा कूटनीतिक मोड़ भारत और चीन के शीर्ष नेतृत्व के बीच हुआ सीधा संवाद रहा, जिसने वैश्विक कूटनीति की दिशा बदल दी।

  • 50 मिनट की ऐतिहासिक वार्ता: 1962 के युद्ध और हालिया सीमा तनावों के बाद दिल्ली की धरती पर यह पहली बार हुआ जब दुनिया के दो सबसे शक्तिशाली पड़ोसियों के प्रमुखों (मोदी और शी जिनपिंग) के बीच 50 मिनट तक द्विपक्षीय संबंधों को सामान्य बनाने पर सीधी बात हुई।
  • मोदीजिनपिंगपुतिन की केमिस्ट्री: तीनों नेताओं की मुलाकात और ‘हैंडशेक’ की तस्वीरों ने पूरे पश्चिमी जगत को चिंतित कर दिया। सात वर्षों में पहली बार शी जिनपिंग का भारत आना और पुतिन का यूक्रेन युद्ध के बाद किसी बहुपक्षीय सम्मेलन में भाग लेना भारत के कूटनीतिक प्रभाव को दर्शाता है।
  • चीन का चार सूत्रीय फॉर्मूला (Four-Point Formula): वार्ता के दौरान चीन ने चार मुख्य बिंदुओं पर सहमति जताई—रणनीतिक समझ (एक-दूसरे को प्रतिद्वंद्वी नहीं, विकास का अवसर मानना), परस्पर लाभ वाला सहयोग, सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति व पारस्परिक सम्मान, और यूएन, एससीओ व जी-20 जैसे बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग।
  • रणनीतिक सतर्कता: यद्यपि चीन की चालबाज़ियों पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं किया जा सकता, लेकिन टकराव के स्थान पर कूटनीतिक संवाद का मार्ग प्रशस्त होना भारत के लिए एक बड़ी जीत है।

४. ‘नई दिल्ली घोषणापत्र’ की मुख्य उपलब्धियां

140 अनुच्छेदों वाले ‘नई दिल्ली घोषणापत्र’ (New Delhi Declaration) पर सभी 11 सदस्य देशों की सर्वसम्मति बनाना भारत की एक महान कूटनीतिक विजय है, क्योंकि इससे ठीक पहले हुई विदेश मंत्रियों की बैठक में कोई साझा बयान जारी नहीं हो सका था।

  • संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता: घोषणापत्र में संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों के अनुसार सभी देशों की संप्रभुता, territorial integrity और बातचीत के जरिए विवादों के समाधान पर बल दिया गया।
  • स्थानीय मुद्राओं (Local Currencies) में व्यापार: ब्रिक्स देशों ने द्विपक्षीय व्यापार में अमेरिकी डॉलर की निर्भरता को धीरे-धीरे कम करने और स्थानीय मुद्राओं के उपयोग को बढ़ावा देने का संकल्प लिया।
  • वैश्विक वित्तीय सामाजिक सुरक्षा: संगठित साइबर फ्रॉड, डार्क वेब, अवैध धन (Money Laundering) के खिलाफ संयुक्त अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई और एआई (Artificial Intelligence) से जुड़े जोखिमों को नियंत्रित करने पर सहमति बनी।
  • विदेशी मीडिया में प्रशंसा: ‘द वाशिंगटन पोस्ट’, ‘ग्लोबल टाइम्स’, ‘अल जजीरा’ और ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों ने भारत की प्रशंसा करते हुए इसे ‘ग्लोबल साउथ’ की ऐतिहासिक सफलता बताया।

५. वैश्विक गौरव बनाम ‘नाराज फूफाइयों’ की क्षुद्र राजनीति

एक तरफ जहां देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अंतरराष्ट्रीय मेहमानों के सामने भारत की समृद्ध शाकाहारी संस्कृति, खान-पान और हस्तशिल्प को बढ़ावा दे रहे थे—ताकि भारतीय संस्कृति का निर्यात (Exports) बढ़े और हस्तशिल्प व कृषि क्षेत्र को वैश्विक बाजार मिले—वहीं देश का विपक्ष एक हास्यास्पद और शर्मनाक भूमिका में नजर आया।

  • शाही भोज में नॉनवेज़ का बचकाना विवाद: भारत की इस ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय विजय को पचा न पाने के कारण देश के तथाकथित ‘नाराज फूफाओं’ (विपक्ष) ने अपनी हताशा निकालने के लिए यह गिल्टी (गलती) ढूंढ निकाली कि भारत मंडपम के रात्रिभोज में मांसाहारी भोजन (मुर्गा/बकरा) क्यों नहीं परोसा गया!
  • निमंत्रण मिलने की खीझ: मजे की बात यह है कि अंतरराष्ट्रीय प्रोटोकॉल के तहत आयोजित इस भव्य आधिकारिक भोज में इन नेताओं को बुलाया ही नहीं गया था। जिन्हें आमंत्रित ही नहीं किया गया, वे बाहर बैठकर मेन्यू (Menu) पर छाती पीट रहे थे।
  • विरोधाभासी और दिशाहीन राजनीति: 80% मांसाहारी आबादी का तर्क देकर शाकाहारी भोजन को राष्ट्रीय अपमान बताने वाले नेताओं की सोच में गहरा विरोधाभास है। जब हिंदू समाज या सामान्य वर्ग के खिलाफ भड़काना हो, तो ये दलितों-पिछड़ों को ‘बहुजन’ बताकर ठेकेदार बनते हैं; लेकिन जब राष्ट्रीय पहचान की बात आए, तो तुष्टिकरण के लिए अल्पसंख्यकों के रक्षक बन जाते हैं।
  • आर्थिक कूटनीतिक समझ का अभाव: इन ‘नाराज फूफाइयों’ के पास इतनी बुद्धि ही नहीं है कि वे मोदी जी की उस कूटनीतिक रणनीति को समझ सकें, जो भारतीय संस्कृति को ब्रांड बनाकर विदेशी बाजार पर कब्जा जमाना चाहती है। सत्ता में रहते हुए केवल लूट, घोटालों, कमीशनखोरी और कटबैक्स (Cutbacks on Imports) पर निर्भर रहने वाली राजनीति से इससे अधिक समझ की उम्मीद भी नहीं की जा सकती।

६. निष्कर्ष

  • ईरान, सऊदी अरब, ब्राजील, रूस, चीन और यूएई जैसे परस्पर विरोधी और जटिल हितों वाले देशों को एक साथ लाकर सर्वसम्मत ‘नई दिल्ली घोषणापत्र’ पारित कराना यह साबित करता है कि भारत अब केवल एक दर्शक नहीं है।
  • भारत आज विश्व राजनीति का नया केंद्र बिंदु (Diplomatic Powerhost) बन चुका है। जी-20 के बाद ब्रिक्स सम्मेलन की यह अभूतपूर्व सफलता भारत के सशक्त, स्वाभिमानी और स्वर्णिम कूटनीतिक युग का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳

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