सारांश:
- यह विस्तृत वैचारिक और खोजी आख्यान राजीव गांधी की हत्या के बाद से लेकर 2016 के पठानकोट एयरबेस हमले तक के ढाई दशकों का गहन विश्लेषण करता है।
- यह लेख अंतरराष्ट्रीय एनजीओ नेटवर्क (जैसे जॉर्ज सोरोस की ओपन सोसाइटी फाउंडेशन), विदेशी थिंक टैंकों, और भारत के भीतर समानांतर सत्ता चलाने वाली संस्थाओं (जैसे राष्ट्रीय सलाहकार परिषद – NAC) के बीच बने संदिग्ध संबंधों के पैटर्न को उजागर करता है।
- किस प्रकार आतंकवाद-विरोधी कानूनों (POTA) का निरसन, आतंकवादियों की ‘सद्भावना’ रिहाई, कंधार विमान अपहरण में अंतरराष्ट्रीय पेचीदगियां और उच्च-स्तरीय संदिग्ध विदेश यात्राएं देश की आंतरिक सुरक्षा और संप्रभुता के खिलाफ एक सुनियोजित ‘नैरेटिव वॉरफेयर’ और वैचारिक सबोटैज का हिस्सा रही हैं—यह आलेख इसी विमर्श को गहराई से रेखांकित करता है।
वैश्विक गठजोड़ और समानांतर सत्ता के कथित प्रभाव: 1991–2016 के बीच भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा की चुनौतियाँ
1. राजीव गांधी फाउंडेशन और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का उभार (1991-1994)
21 मई 1991 को पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की नृशंस हत्या के ठीक एक महीने बाद, 21 जून 1991 को ‘राजीव गांधी फाउंडेशन’ (RGF) का गठन किया गया। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसके नेटवर्क का तेजी से विस्तार देखा गया, जिसने कई नीतिगत और वैचारिक सवाल खड़े किए:
- फाउंडेशन का त्वरित गठन और संस्थागत स्वरूप:
- राजीव गांधी की दुखद हत्या के मात्र 30 दिनों के भीतर एक विशाल एनजीओ का ढांचा तैयार किया गया, जिसे आने वाले वर्षों में भारी नीतिगत अधिकार और कॉर्पोरेट व विदेशी वित्तीय सहायता प्राप्त हुई।
- भारत के राजनीतिक और नीति-निर्माण इतिहास में किसी राजनीतिक परिवार द्वारा संचालित एनजीओ का इस गति से स्थापित होना और सरकारी तंत्र के समानांतर काम करना एक अभूतपूर्व घटना थी।
- विदेशी शाखाएं और उच्च-स्तरीय यात्राएं (1993):
- वर्ष 1993 में सोनिया गांधी ने ब्रिटेन का दौरा किया, जहाँ उन्होंने राजीव गांधी फाउंडेशन की ब्रिटिश शाखा का आधिकारिक शुभारंभ किया। ब्रिटिश संसद और सरकार के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में इसके संबंध में विशेष प्रस्ताव पारित किए गए।
- उसी वर्ष (1993) सोनिया गांधी अमेरिका की यात्रा पर भी गईं। इत्तेफाक से, इसी वर्ष 1993 में अमेरिकी अरबपति जॉर्ज सोरोस ने न्यूयॉर्क में ‘ओपन सोसाइटी फाउंडेशन’ (OSF) की स्थापना की, जिसने आगे चलकर वैश्विक राजनीति और वामपंथी नैरेटिव को प्रभावित करने में केंद्रीय भूमिका निभाई।
- ‘फ्री कश्मीर‘ का एजेंडा और FDL-AP मंच:
- दिसंबर 1994 में ‘फोरम ऑफ डेमोक्रेटिक लीडर्स इन द एशिया-पैसिफिक’ (FDL-AP) नामक एक अंतरराष्ट्रीय एनजीओ का गठन किया गया। इस मंच का एक अघोषित और प्रमुख उद्देश्य ‘स्वतंत्र कश्मीर’ (Free Kashmir) के नैरेटिव को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बढ़ावा देना था।
- RGF की अध्यक्ष के रूप में सोनिया गांधी इस फोरम की सह-अध्यक्ष (Co-Chair) बनीं।
- FDL-AP के अधिकांश सदस्य पश्चिमी और अमेरिका-समर्थक गुटों से जुड़े थे, और इस संगठन को मुख्य रूप से जॉर्ज सोरोस की ओपन सोसाइटी फाउंडेशन द्वारा भारी वित्तीय सहायता (Funding) प्रदान की जा रही थी। एक ऐसे मंच पर भारतीय राजनीतिक नेतृत्व की शीर्ष भागीदारी, जो भारत की क्षेत्रीय अखंडता पर सवाल उठाता था, एक गंभीर रणनीतिक विसंगति थी।
2. कंधार विमान अपहरण (1999) और मसूद अजहर का अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क
दिसंबर 1999 में इंडियन एयरलाइंस के विमान IC-814 का अपहरण आधुनिक भारत के इतिहास में सुरक्षा बलों और कूटनीति के लिए एक अत्यंत चुनौतीपूर्ण और विवादास्पद मोड़ था।
- अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का विरोधाभास:
- काठमांडू से उड़ान भरने के बाद जब अपहृत विमान ईंधन भरने के लिए संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के अल-ऐन एयरपोर्ट पर उतरा, तो एक विचित्र स्थिति उत्पन्न हुई।
- यूएई अधिकारियों ने अमेरिकी राजदूत को तुरंत हवाई अड्डे के भीतर प्रवेश करने और स्थिति पर नजर रखने की अनुमति दी, लेकिन भारतीय राजदूत और कूटनीतिक प्रतिनिधियों को अंदर जाने से रोक दिया गया। यह घटना उस दौर में भारतीय कूटनीतिक लाचारी और पश्चिमी शक्तियों के अत्यधिक प्रभाव को दर्शाती है।
- तालिबान, अमेरिका और एफबीआई (FBI) का रहस्यमयी कोण:
- विमान को अंततः अफगानिस्तान के कंधार ले जाया गया, जो उस समय तालिबान के नियंत्रण में था। उस दौर में अमेरिका सोवियत संघ के प्रभाव को समाप्त करने के बाद तालिबान और अफगान मुजाहिदीन के साथ पर्दे के पीछे से संपर्क बनाए हुए था।
- आतंकियों ने शुरुआत में भारतीय जेलों में बंद 36 कट्टरपंथी उग्रवादियों की रिहाई और 110 मिलियन डॉलर की मांग की थी।
- इन 36 आतंकियों की सूची में शामिल मौलाना मसूद अजहर पर अमेरिकी जांच एजेंसी FBI की विशेष रुचि थी। 1995 से 1998 के बीच जब मसूद अजहर भारतीय जेल में बंद था, तब FBI के अधिकारियों ने उससे कई बार सीधे साक्षात्कार (Interviews) किए थे।
- जैश-ए-मोहम्मद का गठन और ‘लतीफ‘ की पहेली:
- गहन सौदेबाजी के बाद केवल 3 आतंकियों (मसूद अजहर, उमर शेख, और मुश्ताक जरगर) की रिहाई पर सहमति बनी। 36 आतंकियों की उस मूल सूची में शामिल एक खतरनाक आतंकी ‘शाहिद लतीफ’ को उस समय रिहा नहीं किया गया।
- रिहाई के तुरंत बाद मसूद अजहर पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI के संरक्षण में कराची पहुँचा और उसने ‘जैश-ए-मोहम्मद’ (JeM) नामक खूंखार आतंकी संगठन की नींव रखी, जिसका घोषित उद्देश्य भारत में जिहाद फैलाना और कश्मीर को भारत से अलग करना था।
3. संदिग्ध विदेश यात्राएं, बंद कमरे की बैठकें और संसद पर हमला (2001)
जून 2001 में सोनिया गांधी अपने शीर्ष राजनीतिक सहयोगियों (मनमोहन सिंह, नटवर सिंह, मुरली देवड़ा, जयराम रमेश) के साथ 5-दिवसीय अमेरिकी यात्रा पर गईं। इस यात्रा के मार्ग और बैठकों ने कई रणनीतिक सवाल खड़े किए।
- टैक्स हैवन्स (Tax Havens) का मार्ग:
- अमेरिका पहुँचने से पहले इस प्रतिनिधिमंडल ने ब्रिटेन और आइसलैंड का दौरा किया। ये दोनों ही क्षेत्र वैश्विक वित्तीय तंत्र में ‘टैक्स हैवन’ और ऑफशोर बैंकिंग के लिए जाने जाते हैं।
- काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस और किसिंजर से गुप्त बैठकें:
- अमेरिका पहुँचने पर सोनिया गांधी ने ‘काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस’ (CFR) के प्रतिनिधियों और पूर्व अमेरिकी विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर के साथ बंद कमरे में (Closed-door) दौर की बैठकें कीं।
- इस प्रतिनिधिमंडल के सदस्य और वरिष्ठ कांग्रेस नेता नटवर सिंह ने बाद में स्वीकार किया था कि इस यात्रा के दौरान सोनिया गांधी को कुछ अत्यंत प्रभावशाली ‘खास लोगों’ से मिलने की उम्मीद थी, हालांकि उन्होंने कभी उन व्यक्तियों के नामों का खुलासा नहीं किया।
- 13 दिसंबर 2001 का संसद हमला:
- इस उच्च-स्तरीय अमेरिकी यात्रा और बंद कमरे की बैठकों के कुछ ही महीनों बाद, 13 दिसंबर 2001 को जैश-ए-मोहम्मद के पाकिस्तान प्रायोजित आतंकियों ने भारतीय संसद पर आत्मघाती हमला कर दिया।
- इस हमले का मुख्य उद्देश्य भारत के शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व को खत्म करना और देश में अस्थिरता पैदा करना था। इत्तेफाक से, हमले से ठीक कुछ मिनट पहले ही सोनिया गांधी और कई प्रमुख नेता संसद परिसर से बाहर निकले थे।
4. NAC का गठन, पोटा का निरसन और शहरी उग्रवाद का पोषण (2004-2010)
2004 में UPA सरकार के सत्ता में आते ही ऐसे कई नीतिगत फैसले लिए गए, जिन्होंने देश के आंतरिक सुरक्षा तंत्र को बुनियादी रूप से कमजोर कर दिया और वामपंथी व अलगाववादी तत्वों को संस्थागत संरक्षण प्रदान किया।
- राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (NAC) – सुपर-कैबिनेट का उदय:
- सत्ता संभालने के बाद सोनिया गांधी की अध्यक्षता में ‘राष्ट्रीय सलाहकार परिषद’ (NAC) का गठन किया गया। इस संस्था को निर्वाचित कैबिनेट से भी अधिक शक्तियां दी गईं।
- NAC में हर्ष मंदर, अरुंधति रॉय और ज्यां द्रेज जैसे अति-वामपंथी विचारकों को शामिल किया गया। ये वही चेहरे थे जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जॉर्ज सोरोस समर्थित संस्थाओं, वामपंथी थिंक टैंकों और विदेशी एनजीओ से गहराई से जुड़े हुए थे।
- POTA का निरसन (2004):
- 2004 में UPA सरकार का पहला बड़ा नीतिगत निर्णय कठोर आतंकवाद-विरोधी कानून ‘पोटा’ (POTA) को पूरी तरह से रद्द करना था।
- इस कानून के निरसन से जांच एजेंसियों के हाथ बंध गए, जिसके परिणामस्वरूप 2004 से 2014 के बीच भारत के प्रमुख शहरों (मुंबई, दिल्ली, जयपुर, अहमदाबाद, वाराणसी) में सिमी (SIMI) और इंडियन मुजाहिद्दीन के स्लीपर सेल्स ने क्रमिक बम धमाकों की शृंखला खड़ी कर दी।
- शहरी नक्सलियों को विधिक संरक्षण (HRLN का खेल):
- ‘ह्यूमन राइट्स लॉयर्स नेटवर्क’ (HRLN) जैसे एनजीओ राजीव गांधी फाउंडेशन और विदेशी दाताओं (जॉर्ज सोरोस और अमेरिकी फाउंडेशनों) से वित्तीय सहायता प्राप्त कर रहे थे।
- इस नेटवर्क का मुख्य काम अदालतों में गिरफ्तार किए गए नक्सलियों, अलगाववादियों और आतंकियों को मुफ्त विधिक सहायता देना और मानवाधिकारों की आड़ में सुरक्षा बलों की कार्रवाई को रोकना था।
- ‘सद्भावना‘ रिहाई और आतंकी ‘लतीफ‘ का छूटना (2010):
- 28 मई 2010 को UPA सरकार ने एक विवादित निर्णय लेते हुए ‘सद्भावना संकेत’ (Goodwill Gesture) के तहत 25 कट्टरपंथी आतंकियों और उग्रवादियों को जेल से रिहा कर दिया।
- इस रिहाई में सबसे चौंकाने वाला नाम ‘शाहिद लतीफ’ का था—वही लतीफ जो 1999 के कंधार विमान अपहरण के समय मसूद अजहर के साथ 36 आतंकियों की सूची में शामिल था और जिसे उस समय भारतीय एजेंसियों ने छोड़ने से मना कर दिया था। UPA सरकार ने उसे 2010 में शांति प्रस्ताव के नाम पर पाकिस्तान वापस भेज दिया।
5. बिना रिकॉर्ड की यात्राएं और पठानकोट एयरबेस हमला (2011-2016)
2004 से 2014 के बीच देश के शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व की विदेश यात्राओं को लेकर अपारदर्शिता का दौर रहा, जिससे सुरक्षा एजेंसियों के भीतर भी गहरी चिंताएं उपजीं।
- आरटीआई (RTI) में आधिकारिक रिकॉर्ड की अनुपस्थिति:
- सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मांगी गई जानकारियों से यह खुलासा हुआ कि केंद्र सरकार के पास 2004 से 2014 के बीच सोनिया गांधी की कई व्यक्तिगत विदेश यात्राओं का कोई आधिकारिक सरकारी रिकॉर्ड, खर्चा विवरण या बैठकों का ब्योरा दर्ज नहीं था।
- मेडिकल चेकअप के नाम पर अघोषित दौरे:
- 2011 के बाद ‘मेडिकल इलाज’ के नाम पर अमेरिका के कई गोपनीय दौरे किए गए। इन यात्राओं की जानकारी अक्सर उनके भारत से रवाना होने के बाद केवल प्रेस प्रवक्ताओं द्वारा अनौपचारिक रूप से दी जाती थी।
- इसी क्रम में, 30 नवंबर 2015 को वह पुनः 3 दिनों के लिए एक गोपनीय दौरे पर अमेरिका गईं।
- पठानकोट एयरबेस हमला (2 जनवरी 2016):
- इस यात्रा के ठीक एक महीने बाद, 2 जनवरी 2016 को पंजाब के रणनीतिक रूप से अति-संवेदनशील पठानकोट एयरबेस पर जैश-ए-मोहम्मद के भारी हथियारों से लैस आतंकियों ने फिदायीन हमला किया।
- भारतीय जांच एजेंसियों (NIA) की जांच में यह सच सामने आया कि पठानकोट हमले का मुख्य मास्टरमाइंड, साजिशकर्ता और जैश-ए-मोहम्मद का मुख्य हैंडलर कोई और नहीं, बल्कि वही ‘शाहिद लतीफ’ था, जिसे 2010 में UPA सरकार ने ‘सद्भावना’ के नाम पर जेल से रिहा करके पाकिस्तान भेजा था।
6. निष्कर्ष: राष्ट्रीय बोध, वैचारिक स्पष्टता और संवैधानिक सतर्कता
21 मई 1991 को RGF के गठन से लेकर 2016 के पठानकोट हमले तक का यह पूरा इतिहास केवल आकस्मिक घटनाओं या संयोग (Coincidence) की शृंखला नहीं हो सकता। यह इस बात का सीधा प्रमाण है कि जब किसी देश की नीतियां, कानून और सुरक्षा ढांचा विदेशी फंडिंग, वामपंथी एनजीओ सिंडिकेट और तुष्टीकरण की राजनीति के प्रभाव में आ जाते हैं, तो उसकी भारी कीमत राष्ट्र को अपने नागरिकों और सैनिकों के रक्त से चुकानी पड़ती है।
- सुरक्षा तंत्र का कायाकल्प (2014-2026):
- पिछले एक दशक में भारत ने अपनी आंतरिक सुरक्षा नीति को पूरी तरह बदलते हुए ‘जीरो टॉलरेंस’ (Zero Tolerance) की नीति अपनाई है। UAPA जैसे कानूनों को सख्त बनाया गया है, FCRA नियमों के माध्यम से संदिग्ध विदेशी एनजीओ फंडिंग पर कठोर प्रहार किया गया है और लुटियंस दिल्ली के समानांतर एनजीओ सिंडिकेट को पूरी तरह उखाड़ फेंका गया है।
- वैचारिक सतर्कता का आह्वान:
- भारत को एक सुरक्षित, समृद्ध और स्वाभिमानी राष्ट्र बनाए रखने के लिए नागरिकों को केवल सीमावर्ती सुरक्षा तक सीमित नहीं रहना होगा। समाज को ‘शहरी नक्सलियों’ (Urban Naxals), विदेशी टूलकिट और भारत को भीतर से कमजोर करने वाले अदृश्य नेटवर्कों के वैचारिक सबोटैज को पहचानना होगा। जब तक राष्ट्रीय हित और सनातन नीतियां सर्वोपरि नहीं होंगी, तब तक भारत की संप्रभुता पर मंडराते इन ऐतिहासिक खतरों का स्थायी उन्मूलन संभव नहीं है।
🇮🇳जय भारत, वन्देमातरम 🇮
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