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स्वतंत्रता का दुरुपयोग

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग, और हिंदू समाज की विडंबना

सारांश

  • यह व्यापक और गहन आलेख समकालीन भारत में सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के नाम पर चल रहे कुत्सित खेल का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
  • राहुल गांधी सहित कांग्रेस, ‘ठगबंधन’ और अन्य राष्ट्र-विरोधी ताकतों द्वारा हिंदू आस्था, सनातन संस्कृति और राष्ट्रीय प्रतीकों पर लगातार झूठे आख्यान और नफरत भरे भाषण (Hate Speech) परोसे जा रहे हैं।
  • एक तरफ जहां इन विध्वंसक तत्वों के पास आतंकवादियों और असामाजिक तत्वों का बचाव करने के लिए महंगे और पेशेवर वकीलों की पूरी फौज हमेशा तैयार रहती है, वहीं दूसरी तरफ न्यायपालिका द्वारा स्वतः संज्ञान (Suo Motu) न लिए जाने और हिंदू समाज की अपनी ‘एकता की कमी’ व “सरकार सब संभाल लेगी” वाले भ्रम के कारण वह लगातार उत्पीड़न झेल रहा है।
  • इस लेख में भारतीय न्याय संहिता (BNS) के उन विशिष्ट और प्रासंगिक कानूनी प्रावधानों—जैसे धारा 196, धारा 299 और धारा 353—को विस्तार से रेखांकित किया गया है, जिनके माध्यम से इन राष्ट्र-विरोधी और हिंदू-द्वेषी बयानों के खिलाफ एक निर्णायक और मजबूत कानूनी मोर्चेबंदी की जा सकती है।

BNS के प्रासंगिक प्रावधानों के तहत निर्णायक कानूनी संघर्ष का आह्वान

1. डिजिटल युग और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का घोर दुरुपयोग

आज का डिजिटल युग इस बात का गंभीर गवाह बन चुका है कि कैसे ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के पवित्र संवैधानिक अधिकार को एक वैचारिक और राजनीतिक हथकंडे में बदल दिया गया है।

  • हिन्दू आस्था और राष्ट्र पर सुनियोजित प्रहार: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर न केवल मुख्य विपक्षी नेताओं, बल्कि कांग्रेस और ‘ठगबंधन’ के तमाम प्रवक्ताओं द्वारा खुलेआम हिंदू धर्म, सनातन आस्था, परंपराओं और देश की व्यवस्था के खिलाफ झूठे आख्यान (Fake Narratives) और अभद्र भाषा का प्रसार किया जा रहा है।
  • बढ़ती राजनीतिक आक्रामकता: यह सब इतनी बेबाकी और सुनियोजित तरीके से किया जा रहा है कि मानो बहुसंख्यक समाज की भावनाओं को आहत करना एक राजनीतिक फैशन या एजेंडा बन गया हो। लेकिन इसकी सबसे बड़ी विडंबना यह है कि न तो न्यायपालिका इस पर स्वतः संज्ञान (Suo Motu Action) लेती दिखती है और न ही समाज की तरफ से कोई त्वरित और संगठित प्रतिवाद सामने आता है।

2. ‘ठगबंधन’ का मजबूत इकोसिस्टम: आतंकवादियों से लेकर नफरत फैलाने वालों तक का रक्षा-कवच

इस पूरे परिदृश्य का सबसे दुखद और आँखें खोल देने वाला पहलू यह है कि वैचारिक रूप से विध्वंसक और देशविरोधी ताकतों के पास संसाधनों और कानूनी सुरक्षा की कभी कोई कमी नहीं होती।

  • वकीलों की महंगी फौज (Battery of Lawyers): कांग्रेस, ‘ठगबंधन’ और अन्य राष्ट्र-विरोधी ताकतों के पीछे देश के सबसे महंगे, वरिष्ठ और दिग्गज वकीलों का एक पूरा सुव्यवस्थित इकोसिस्टम खड़ा रहता है।
  • असामाजिक तत्वों का संरक्षण: देश ने बार-बार यह देखा है कि जब भी किसी आतंकवादी, देशविरोधी या हिंदू-द्वेषी तत्व पर कानून का शिकंजा कसने की कोशिश होती है, तो यही वकीलों की फौज रातों-रात सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के दरवाजे खटखटाकर उनके बचाव में ढाल बनकर खड़ी हो जाती है। वे अपने राजनीतिक और वैचारिक एजेंडे को सुरक्षित रखने के लिए हरसंभव कानूनी दांव-पेंच का उपयोग करते हैं।

3. हिंदू समाज की सबसे बड़ी कमजोरी: एकता का अभाव और “सरकार पर निर्भरता”

इसके ठीक विपरीत, राष्ट्रवादी ताकतों और हिंदू समाज की ज़मीनी स्थिति इसके बिल्कुल उलट है, जो उनके लगातार पिछड़ने और वैचारिक आघात सहने का मुख्य कारण बन रही है।

  • संगठन और इच्छाशक्ति की कमी: जो समाज संख्या बल और सांस्कृतिक आधार पर सबसे बड़ा है, वही वैचारिक और कानूनी स्तर पर सबसे अधिक बिखरा हुआ नजर आता है। हिंदू समाज में सामूहिक रूप से खड़े होने और अपने अधिकारों के लिए डटकर कानूनी लड़ाई लड़ने की प्रवृत्ति का भारी अभाव है।
  • “सरकार सब कर लेगी” का घातक भ्रम: बहुसंख्यक समाज की सबसे बड़ी और आत्मघाती कमजोरी यह मान लेना है कि चूंकि केंद्र या राज्यों में राष्ट्रवादी सरकारें हैं, इसलिए सरकार ही सब कुछ संभाल लेगी। इस अकर्मण्यता, उदासीनता और सरकार पर पूर्ण निर्भरता के कारण समाज वर्षों से लगातार मानसिक, वैचारिक और सांस्कृतिक उत्पीड़न चुपचाप झेल रहा है।
  • पीढ़ी-दर-पीढ़ी भुगतना: जब तक समाज यह नहीं समझेगा कि राजनीतिक नेतृत्व अपनी संवैधानिक और प्रशासनिक सीमाओं में कार्य करता है, लेकिन वैचारिक और कानूनी लड़ाई खुद समाज को ही लड़नी पड़ती है, तब तक यह उत्पीड़न रुकने वाला नहीं है।

4. कानूनी मोर्चेबंदी: भारतीय न्याय संहिता (BNS) के प्रासंगिक प्रावधान

इन विभाजनकारी और हिंदू-द्वेषी ताकतों को रोकने के लिए केवल सोशल मीडिया पर दुख या गुस्सा जताने से कोई समाधान नहीं निकलेगा। इसके लिए भारतीय न्याय संहिता (BNS) के निम्नलिखित प्रासंगिक और कड़े कानूनी प्रावधानों के तहत ठोस आपराधिक शिकायतें (Criminal Complaints) और जनहित याचिकाएं (PIL) दर्ज कराई जानी चाहिए:

क) BNS की धारा 196 (समूहों के बीच शत्रुता और वैमनस्य फैलाना)

  • विधिक दायरा: यह प्रावधान धर्म, जाति, भाषा, जन्म स्थान या समुदाय के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता, घृणा (Hatred) या वैमनस्य की भावना को बढ़ावा देने या प्रज्वलित करने वाले कृत्यों को गंभीर अपराध मानता है।
  • दंड का प्रावधान: इसमें बोले गए या लिखे गए शब्दों, संकेतों, इलेक्ट्रॉनिक संचार या किसी भी दृश्य प्रतिनिधित्व (Visual Representation) के माध्यम से सामाजिक सद्भाव बिगाड़ने पर ३ साल तक की कैद या जुर्माना या दोनों का प्रावधान है। यदि ऐसा कृत्य किसी धार्मिक स्थल या समारोह में किया जाए, तो सजा ५ साल तक बढ़ सकती है।

ख) BNS की धारा 299 (धार्मिक भावनाओं को आहत करना)

  • विधिक दायरा: यह धारा किसी भी वर्ग के नागरिकों की धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण (Malicious) तरीके से आहत करने या उनकी धार्मिक मान्यताओं का अपमान करने के लिए किए गए कृत्यों को लक्षित करती है।
  • कार्रवाई का आधार: सनातन आस्था, देवी-देवताओं और हिंदू प्रतीकों पर लगातार होने वाले वैचारिक प्रहारों और दुर्भावनापूर्ण झूठे आख्यानों के खिलाफ इस धारा के तहत कड़ा कानूनी शिकंजा कसा जा सकता है।

ग) BNS की धारा 353 (झूठी खबरें और भ्रामक आख्यान फैलाना)

  • विधिक दायरा: यह धारा झूठी खबरों, अफवाहों या ऐसे बयानों को गढ़ने, प्रकाशित करने या प्रसारित करने से संबंधित है जो जनता में भय पैदा करते हैं, विभिन्न समुदायों के बीच द्वेष फैलाते हैं या सार्वजनिक शांति (Public Tranquility) को भंग करते हैं।
  • कार्रवाई का आधार: सोशल मीडिया पर राष्ट्र-विरोधी तत्वों द्वारा फैलाए जा रहे भ्रामक नैरेटिव्स के खिलाफ यह एक अचूक कानूनी हथियार है, जिससे समाज में अराजकता फैलाने वालों पर नकेल कसी जा सकती है।

5. निर्णायक संघर्ष का समय

  • अब समय आ गया है कि हिंदू समाज और राष्ट्रवादी विचारक गहरी नींद से बाहर निकलें। यदि विरोधी ताकतें अपने विध्वंसक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए वकीलों और अदालतों की फौज का इस्तेमाल कर सकती हैं, तो राष्ट्र और धर्म के प्रेमियों को भी BNS की इन सुसंगत धाराओं का उपयोग करते हुए संविधान और कानून के दायरे में रहकर आक्रामक और संगठित रुख अपनाना होगा।
  • जब तक कानून का कड़ा डर इन असामाजिक और विभाजनकारी तत्वों को नहीं दिखाया जाएगा, तब तक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में सनातन आस्था और राष्ट्र की एकता पर हो रहे ये प्रहार बंद नहीं होंगे। समाज को अपनी निर्भरता छोड़कर खुद आगे आना होगा, तभी न्याय की स्थापना संभव है।

🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳

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