सारांश
- यह विस्तृत एवं रणनीतिक विश्लेषण 1991 से लेकर वर्तमान तक भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा नीतियों, कूटनीतिक दृष्टिकोण और आंतरिक सुरक्षा प्रणालियों का एक गहन तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है।
- यह आलेख उजागर करता है कि कैसे UPA शासनकाल के दौरान विदेशी NGO फंडिंग, ‘डीप स्टेट’ (Deep State) के हस्तक्षेप, कमजोर आतंकवाद-विरोधी कानूनों की वापसी, संदिग्ध अंतरराष्ट्रीय बैठकों और ‘सद्भावना’ के नाम पर खूंखार आतंकवादियों की रिहाई जैसे फैसलों ने भारत की सुरक्षा एजेंसियों के हाथ बाँधे और देश को पठानकोट जैसे गंभीर आतंकी हमलों के मुहाने पर खड़ा किया।
- इसके विपरीत, 2014 के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में भारतीय सुरक्षा नीति में आए ऐतिहासिक बदलावों का विवरण दिया गया है। ‘डोजियर कूटनीति’ के स्थान पर आक्रामक-निवारक सैन्य कार्रवाई (सर्जिकल व बालाकोट स्ट्राइक), FCRA संशोधनों के जरिए अवैध विदेशी फंडिंग की रीढ़ तोड़ना, अनुच्छेद 370 का उन्मूलन और ‘ज़ीरो टॉलरेंस ऑन टेरर’ के तहत निर्मित अभेद्य सुरक्षा ढाँचे का संपूर्ण खाका प्रस्तुत किया गया है।
डीप स्टेट’ साठगांठ बनाम मोदी युग का अभेद्य ‘राष्ट्र-प्रथम’ सुरक्षा मॉडल
1. राजीव गांधी फाउंडेशन, जॉर्ज सोरोस और विदेशी NGO नेटवर्क का उदय
1991 में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की दुखद हत्या के ठीक एक महीने बाद (21 जून 1991) ‘राजीव गांधी फाउंडेशन’ (RGF) का गठन किया गया, जिसकी बाद की अंतरराष्ट्रीय गतिविधियाँ भारत की नीतिगत प्राथमिकताओं पर कई सवाल खड़े करती हैं।
- अंतरराष्ट्रीय शाखाएँ और संदिग्ध टाइमिंग: वर्ष 1993 में ब्रिटेन में RGF की अंतरराष्ट्रीय शाखा खोली गई। ठीक उसी दौरान अमेरिकी दौरों के बीच न्यू यॉर्क में जॉर्ज सोरोस द्वारा ‘ओपन सोसाइटी फाउंडेशन’ की स्थापना की गई।
- FDL-AP और ‘स्वतंत्र कश्मीर‘ का एजेंडा: दिसंबर 1994 में ‘फोरम ऑफ डेमोक्रेटिक लीडर्स इन द एशिया-पैसिफिक’ (FDL-AP) नामक संस्था का गठन हुआ, जिसका एक मुख्य उद्देश्य ‘स्वतंत्र कश्मीर’ के विमर्श को बढ़ावा देना था। सोनिया गांधी RGF की अध्यक्ष के रूप में इस फोरम की सह-अध्यक्ष थीं। इस संस्था को मुख्य रूप से जॉर्ज सोरोस के फाउंडेशन द्वारा भारी वित्तीय सहायता प्राप्त थी।
- NAC और अर्बन नक्सल नेटवर्क का हस्तक्षेप: UPA शासनकाल के दौरान राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (NAC) का गठन कर नीति-निर्माण की चाबी ऐसे हाथों में सौंपी गई जो ‘डीप स्टेट’ और सोरोस नेटवर्क से सीधे जुड़े थे। HRLN जैसे NGOs का RGF के साथ मिलकर काम करना यह दर्शाता है कि कैसे विदेश-फंडेड तंत्र भारत के प्रशासनिक और कानूनी ढाँचे को अंदर से प्रभावित कर रहा था।
2. कंधार अपहरण कांड, अमेरिकी हित और जैश-ए-मोहम्मद की स्थापना
1999 का कंधार विमान अपहरण (IC-814) भारत की कूटनीतिक और आंतरिक सुरक्षा का एक अत्यंत संवेदनशील और जटिल अध्याय रहा है, जिसकी कड़ियाँ बाद के वर्षों में उजागर हुईं।
- UAE में कूटनीतिक विफलता और अमेरिकी दखल: ईंधन भरने के लिए यूएई में रुके विमान तक भारतीय राजदूत के स्थान पर अमेरिकी राजदूत को सीधी पहुँच दी गई, जिसे लेकर सुरक्षा गलियारों में लंबे समय तक चिंता जताई गई।
- मसूद अजहर और FBI की संदिग्ध रुचि: आतंकियों ने 36 उग्रवादियों की रिहाई की मांग की थी, लेकिन सौदेबाजी के बाद मसूद अजहर समेत 3 आतंकियों को छोड़ा गया। 1995 से 1998 के बीच भारतीय जेल में बंद रहने के दौरान FBI द्वारा मसूद अजहर का बार-बार साक्षात्कार लिया जाना अमेरिकी एजेंसियों की विशेष रुचि को दर्शाता है।
- ‘लतीफ‘ का न छूटना और जैश का गठन: 1999 में 36 आतंकियों की सूची में शामिल खूंखार आतंकी ‘शाहिद लतीफ’ को रिहा नहीं किया गया था। रिहाई के बाद मसूद अजहर ने पाकिस्तान पहुँचकर ‘जैश-ए-मोहम्मद’ नामक आतंकी संगठन खड़ा किया।
3. 2001 के संदिग्ध विदेश दौरे, संसद हमला और POTA की समाप्ति
2001 से 2004 के मध्य घटित राजनीतिक घटनाक्रमों ने भारत की आतंकवाद-विरोधी रक्षा पंक्तियों को अभूतपूर्व नुकसान पहुँचाया।
- गोपनीय अमेरिकी दौरे और किसिंजर से मुलाकात: जून 2001 में सोनिया गांधी ने अपने प्रमुख सहयोगियों के साथ टैक्स हेवन देशों से होते हुए अमेरिका का दौरा किया, जहाँ ‘काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस’ और हेनरी किसिंजर के साथ बंद कमरे में उच्चस्तरीय बैठकें की गईं।
- संसद हमला और प्रस्थान का घटनाक्रम: इन गोपनीय विदेश दौरों के कुछ ही महीनों बाद 13 दिसंबर 2001 को जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों ने भारतीय संसद पर हमला किया। हमले से ठीक पहले सोनिया गांधी का संसद परिसर से निकलना आज भी राजनीतिक चर्चाओं का केंद्र बनता है।
- POTA की समाप्ति से पंगु बनता सुरक्षा तंत्र: 2004 में सत्ता सँभालते ही UPA सरकार ने पहला बड़ा फैसला आतंकवाद-विरोधी कड़े कानून POTA को पूरी तरह निरस्त करने का लिया, जिससे देश की जांच और सुरक्षा एजेंसियों के हाथ पूरी तरह बँध गए।
4. UPA का ‘गुडविल’ फैसला, गायब रिकॉर्ड्स और पठानकोट हमला
UPA शासनकाल की गोपनीयता, कमजोर नीतियों और तुष्टिकरण के निर्णयों ने सीधे तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डाला।
- 25 आतंकवादियों की आत्मघाती रिहाई: 28 मई 2010 को UPA सरकार ने पाकिस्तान के साथ तथाकथित ‘सद्भावना’ (Goodwill) के नाम पर 25 खूंखार आतंकवादियों को जेल से रिहा कर दिया।
- शाहिद लतीफ की रिहाई का रहस्य: UPA द्वारा रिहा किए गए 25 आतंकियों की सूची में सबसे चौंकाने वाला नाम जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी ‘शाहिद लतीफ’ का था—वही लतीफ जिसे 1999 के कंधार कांड के समय भारतीय एजेंसियों ने छोड़ने से मना कर दिया था।
- विदेश यात्राओं की गोपनीयता और पठानकोट का दंश: RTI रिपोर्टों के अनुसार, 2004 से 2014 के बीच सोनिया गांधी की विदेश यात्राओं का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड सार्वजनिक नहीं हुआ। 30 नवंबर 2015 को सोनिया गांधी की अमेरिका यात्रा के तुरंत बाद 2 जनवरी 2016 को पठानकोट वायुसेना स्टेशन पर भीषण आतंकी हमला हुआ। जांच में साबित हुआ कि इस हमले का मुख्य मास्टरमाइंड वही आतंकी शाहिद लतीफ था, जिसे 2010 में UPA सरकार ने ‘सद्भावना’ में रिहा किया था।
5. FCRA संशोधन: ‘डीप स्टेट’ और अवैध फंडिंग पर अमित शाह का ऐतिहासिक प्रहार
2014 के बाद मोदी सरकार ने आंतरिक सुरक्षा को दीमक की तरह चाटने वाले विदेशी पैसों के काले नेटवर्क और मिशनरी फंडिंग पर कानूनी शिकंजा कसा।
- एक ही केंद्रीय प्रवेश द्वार (SBI नई दिल्ली): अब विदेश से आने वाला हर एक रुपया केवल और केवल नई दिल्ली स्थित भारतीय स्टेट बैंक (SBI) की मुख्य शाखा के निर्दिष्ट खाते के माध्यम से ही भारत आ सकता है, जिससे गुप्त खातों और समानांतर रास्तों से पैसा भेजना नामुमकिन हो गया।
- प्रशासनिक फिजूलखर्ची पर नकेल: NGOs द्वारा विदेश से आए फंड का इस्तेमाल अपने निजी ऐशो-आराम, फाइव-स्टार सम्मेलनों और प्रशासनिक खर्चों के नाम पर करने की सीमा को 50% से घटाकर आक्रामक रूप से 20% कर दिया गया।
- अवैध संपत्तियों की जब्ती और सरकारी ट्रस्ट: फर्जीवाड़े, धर्मांतरण के रैकेट या देशविरोधी गतिविधियों के चलते जिस भी NGO का लाइसेंस रद्द होगा, उसकी संपूर्ण चल-अचल संपत्ति सरकार द्वारा गठित विशेष ट्रस्ट के अधीन हस्तांतरित कर दी जाएगी। इससे पश्चिमी ‘डीप स्टेट’ के समानांतर फंडिंग नेटवर्क की रीढ़ टूट गई।
6. मोदी युग की सुरक्षा क्रांति: डोजियर राजनीति का अंत और सर्जिकल-बालाकोट प्रहार
2014 के बाद भारत की विदेश और रक्षा नीति में मौलिक परिवर्तन आया, जहाँ प्रतिक्रियात्मक दृष्टिकोण (Reactive Approach) को समाप्त कर आक्रामक-निवारक (Offensive-Deterrent) मॉडल अपनाया गया।
- 2016 उड़ी हमले के बाद सर्जिकल स्ट्राइक: उड़ी हमले के बाद भारत ने डोजियर भेजने की पुरानी परंपरा को खारिज करते हुए नियंत्रण रेखा (LoC) के पार जाकर आतंकी लॉन्च पैड्स को पूरी तरह तबाह कर दिया।
- 2019 पुलवामा के बाद बालाकोट एयरस्ट्राइक: पुलवामा हमले का जवाब देते हुए भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के संप्रभु हवाई क्षेत्र में गहराई तक प्रवेश कर बालाकोट में जैश-ए-मोहम्मद के मुख्य आतंकी प्रशिक्षण शिविर को ध्वस्त किया। इसने पाकिस्तान की परमाणु ब्लैकमेलिंग की रणनीति को सदा के लिए खत्म कर दिया।
- ‘ज़ीरो टॉलरेंस ऑन टेरर‘ की नीति: सुरक्षा बलों और मैदानी कमांडरों को सीमा पार से होने वाली किसी भी उकसावे की कार्रवाई का तत्काल और विनाशकारी जवाब देने की पूर्ण स्वायत्तता प्रदान की गई।
7. अनुच्छेद 370 का उन्मूलन, UAPA कड़ा कानून और आंतरिक एकीकरण
सुरक्षा के मोर्चे पर कानूनी और भौगोलिक एकीकरण करके आतंकवाद के समूचे इकोसिस्टम का सफाया किया गया।
- अनुच्छेद 370 का निरसन (2019): जम्मू-कश्मीर से विशेष दर्जे वाले अनुच्छेद 370 को हटाकर राज्य को पूरी तरह भारत के मुख्यधारा के कानून के तहत लाया गया, जिससे अलगाववाद के राजनीतिक पोषकों का अंत हुआ।
- आतंकी इकोसिस्टम का पूर्ण खात्मा: केवल हथियारबंद आतंकियों को ही नहीं, बल्कि पत्थरबाज़ों, ओवर-ग्राउंड वर्कर्स (OGWs) और हवाला कारोबारियों के नेटवर्क को एनआईए (NIA) के कड़े अभियानों के जरिए बेनकाब और ध्वस्त किया गया।
- UAPA में संशोधन और कानूनी सख्ती: Unlawful Activities (Prevention) Act में संशोधन कर सरकार को संस्थाओं के साथ-साथ सीधे आतंकवादियों (व्यक्तियों) को भी नामांकित और उनकी संपत्तियों को ज़ब्त करने का अधिकार दिया गया।
- CDS और एकीकृत कमान: तीनों सैन्य अंगों (थल, जल और नभ) में बेहतर तालमेल और त्वरित निर्णय क्षमता के लिए ‘चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ’ (CDS) के पद का सृजन किया गया।
8. ‘राष्ट्रहित सर्वोपरि’ ही अखंड भारत का आधार
- UPA और मोदी युग के सुरक्षा मॉडलों का यह विस्तृत अध्ययन यह स्पष्ट रूप से रेखांकित करता है कि जब राजनीति में राष्ट्रहित के स्थान पर तुष्टिकरण, ‘डीप स्टेट’ के एजेंडे और विदेशी आकाओं की मंशा को प्राथमिकता दी जाती है, तो देश को पठानकोट और संसद हमलों जैसी भारी कीमत चुकानी पड़ती है।
- आज का नया भारत किसी विदेशी NGO, वैश्विक दबाव समूह या तुष्टिकरणवादी लॉबी के आगे नहीं झुकता। ‘राष्ट्रहित सर्वोपरि’ का संकल्प, कठोर FCRA नियम, सख्त आतंकवाद-विरोधी ढाँचा और भारतीय सेना की निर्णायक छूट यह सुनिश्चित करती है कि भारत की सीमाओं, संप्रभुता और सांस्कृतिक अखंडता की रक्षा अब पूरी तरह अभेद्य है।
🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳
Read our previous blogs 👉 Click here
Join us on Arattai 👉 Click here
👉Join Our Channels👈
